देश की 135 साल पुरानी ऐतिहासिक सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के स्थानांतरण प्रस्ताव को लेकर शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से सीधे सवाल किया है कि नए सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के भीतर इस प्रतिष्ठित पुस्तकालय के लिए कुल कितनी जगह तय की गई है। इस ऐतिहासिक धरोहर में 8.5 लाख से अधिक किताबों और दुर्लभ दस्तावेजों का अमूल्य संग्रह मौजूद है, लेकिन नई प्रशासनिक व्यवस्था में इसके लिए पर्याप्त स्थान न मिलने की आशंकाओं के बीच यह कानूनी हस्तक्षेप सामने आया है।
पीठ ने मांगा केंद्र सरकार से विस्तृत शपथ पत्र
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ इस मामले की समीक्षा कर रही है। अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करके स्थिति स्पष्ट करे। पीठ ने कहा कि सरकार को अपने जवाब में पुस्तकालय के लिए आवंटित किए जा रहे कुल क्षेत्रफल का पूरा ब्योरा पेश करना होगा। अदालत यह भी जानना चाहती है कि क्या यह नई जगह केवल शास्त्री भवन में रखी किताबों के लिए ही पर्याप्त होगी या फिर आरके पुरम में गत्तों और कार्टनों में बंद पड़ी करीब 2 लाख किताबों को भी वहां सुरक्षित रखा जा सकेगा।
कर्तव्य भवन में मात्र दो कमरों के आवंटन पर तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को अवगत कराया कि सेंट्रल विस्टा योजना में पुस्तकालय के लिए बाकायदा जगह आवंटित की गई है। उन्होंने यह भी बताया कि सेंट्रल विस्टा के निदेशक अदालत में मौजूद हैं और वे मौके पर ही पूरा विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं। हालांकि, अदालत ने मौखिक जानकारी के बजाय आधिकारिक शपथ पत्र पर जोर दिया।
जस्टिस कुमार ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर हम समाचार रिपोर्ट पर जाएं तो यह पुस्तकालय 1891 से है। कागज कम करने की बात अच्छी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मूल्यवान कागजात की देखभाल न करें। आप कर्तव्य भवन में सिर्फ 2 कमरे दे रहे हैं, बस इतना ही?” उन्होंने आगे सवाल उठाया, “आप आरके पुरम की 2 लाख किताबों को छोड़ रहे हैं?” मामले में अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता हरिप्रिया पद्मनाभन को न्यायमित्र यानी एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है ताकि सभी तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा की जा सके।
सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना का दायरा
सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक फैले 3 किलोमीटर के प्रशासनिक क्षेत्र का पुनर्विकास किया जा रहा है। इस पूरी योजना के तहत लोकसभा और राज्यसभा के लिए अधिक सीटों वाला एक बेहद आधुनिक और विशाल नया संसद भवन तैयार किया गया है। इसके अलावा पुराने राजपथ को अब कर्तव्य पथ के रूप में आधुनिक स्वरूप दिया गया है और उसके आसपास के परिसरों का कायाकल्प किया गया है। इस पुनर्विकास का मुख्य उद्देश्य केंद्रीय सचिवालय को नया रूप देकर विभिन्न मंत्रालयों के बिखरे हुए कार्यालयों को एक छत के नीचे एकीकृत करना है, जिसमें प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के नए आवास और कार्यालय परिसरों की योजना भी शामिल है। अब इस विशाल निर्माण के बीच 1891 से स्थापित ऐतिहासिक ज्ञान संपदा के संरक्षण पर अदालत की नजर है।



















