घर के गमलों या किचन गार्डन में ताजी और खुशबूदार धनिया उगाना हर बागवानी प्रेमी की पहली पसंद होती है, लेकिन कई बार सही तरीका न अपनाने से बीजों का अंकुरण बहुत धीमा रहता है या फिर आधे बीज उग ही नहीं पाते। बागवानी में अपनाई जाने वाली एक बेहद आसान और कारगर कृषि तकनीक के जरिए न केवल सौ फीसदी जमाव हासिल किया जा सकता है, बल्कि पौधों को बिना किसी अतिरिक्त रासायनिक खाद के तेजी से बड़ा भी किया जा सकता है। इस पूरे तरीके में धनिया के सख्त बीजों को दो हिस्सों में विभाजित करने और मिट्टी पर धान की पराली बिछाने की प्रक्रिया सबसे अहम भूमिका निभाती है।
बुवाई से पहले बीजों को दो टुकड़ों में विभाजित करना क्यों है जरूरी
धनिया का प्रत्येक बीज असल में दो हिस्सों से मिलकर बना होता है और इसका बाहरी आवरण काफी कड़ा होता है। प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह ने इस प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि धनिया के बीज का ऊपरी हिस्सा सख्त होता है, जिस वजह से नमी को अंदर तक पहुंचने में सामान्य से अधिक समय लग जाता है। जब आप बुवाई से पहले बीजों को किसी भारी वस्तु से हल्के दबाव के साथ रगड़ते या दबाते हैं, तो वे आसानी से दो अलग-अलग हिस्सों में टूट जाते हैं। ऐसा करने से बीज की सुप्त अवस्था तत्काल टूट जाती है और अंकुरण की स्वाभाविक प्रक्रिया सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना तेज हो जाती है।
किचन गार्डन या गमलों में बुवाई करने के लिए हमेशा उच्च गुणवत्ता वाले और स्वस्थ बीजों का ही चुनाव करना चाहिए। बीजों को हल्के हाथ से दो टुकड़ों में अलग करने के बाद, बुवाई के लिए भुरभुरी और हल्की नमी वाली उपजाऊ मिट्टी तैयार की जाती है। इन विभाजित बीजों को मिट्टी की सतह पर बराबर दूरी रखते हुए एक समान रूप से बिखेर दिया जाता है, जिससे आगे चलकर पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती रहे और कोई पौधा दूसरे पौधे के विकास में बाधा न बने।
धान की पराली से मल्चिंग और नमी का दीर्घकालिक संरक्षण
बीज बिखेरने के फौरन बाद उस पूरी क्यारी या सतह को धान की पराली की एक समान परत से अच्छी तरह ढक दिया जाता है। आधुनिक कृषि विज्ञान में मिट्टी की सतह को ढकने की इस तकनीक को मल्चिंग के नाम से जाना जाता है। जब क्यारी पर पराली बिछा दी जाती है, तो मिट्टी के भीतर मौजूद प्राकृतिक नमी धूप के संपर्क में आकर वाष्प बनकर नहीं उड़ती। इससे बीजों के चारों ओर लगातार एक समान नमी और हल्की गर्माहट का अनुकूल माहौल बना रहता है, जो सौ फीसदी जमाव सुनिश्चित करने में पूरी तरह मददगार साबित होता है।
पराली की यह सुरक्षात्मक परत बीजों को तेज और तीखी धूप के दुष्प्रभावों से भी सुरक्षित रखती है। इसके अलावा खुले बीजों को अक्सर चिड़िया या अन्य पक्षी चुनकर खा जाते हैं, जिससे फसल का घनत्व कम हो जाता है। पराली से ढके होने के कारण पक्षी बीजों तक सीधे नहीं पहुंच पाते और सारे बीज अपनी जगह पर सुरक्षित रहकर तेजी से अंकुरित होने लगते हैं।
खरपतवार की रोकथाम और जैविक खाद का दोहरा फायदा
किचन गार्डन में सामान्य रूप से धनिया बोने पर उसके साथ अनचाही जंगली घास और खरपतवार भी उग आते हैं, जो मिट्टी के सारे जरूरी पोषक तत्व सोख लेते हैं और धनिया के पौधों की बढ़वार रुक जाती है। जब मिट्टी की ऊपरी सतह पर पराली की सघन परत बिछाई जाती है, तो खरपतवार के बीजों तक सूर्य की सीधी रोशनी बिल्कुल नहीं पहुंच पाती। रोशनी और खुली हवा के अभाव में खरपतवार जमीन से बाहर निकल ही नहीं पाते हैं, जिससे बागवानों को बार-बार निराई और गुड़ाई करने के कठिन श्रम से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है।
पराली बिछाने का लाभ केवल नमी बचाने और अवांछित घास रोकने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाती है। जैसे-जैसे धनिया की नियमित हल्की सिंचाई की जाती है, वैसे-वैसे भीगी हुई धान की पराली धीरे-धीरे स्वतः सड़ने और गलने लगती है। कुछ ही दिनों के भीतर यह पूरी पराली विघटित होकर बेहतरीन प्राकृतिक जैविक खाद में तब्दील हो जाती है। यह सड़ी हुई पराली धनिया के नन्हे पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व लगातार उपलब्ध कराती रहती है, जिससे बाजार से कोई भी रासायनिक उर्वरक या अलग से खाद खरीदने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
















