पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के देहाती इलाकों में बांस के पेड़ों से जुड़ी एक पुरानी लोक परंपरा आज भी चर्चा में रहती है। बांस की गांठों पर प्राकृतिक रूप से एक भूरे रंग का, रुई जैसा मुलायम पदार्थ जमा होता है, जिसे स्थानीय ग्रामीण नोनी या कोठ के नाम से पुकारते हैं। जब बांस की गांठ के ऊपरी हिस्से को नाखून या किसी पतली चीज से खुरचा जाता है, तो यह रेशेदार चीज आसानी से बाहर निकल आती है। दशकों पहले जब आधुनिक स्वास्थ्य केंद्र और दवाएं सुदूर देहात तक नहीं पहुंची थीं, तब इस प्राकृतिक पदार्थ को प्राथमिक उपचार के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग में लाया जाता था।
पारंपरिक प्राथमिक उपचार और खून रोकने का नुस्खा
गांवों के बुजुर्गों के अनुसार पुराने दौर में जब अचानक खेत-खलिहान या घर के काम के दौरान हाथ या पैर कट जाते थे, तो तुरंत बांस के झुरमुट की ओर रुख किया जाता था। इलाके के बुजुर्ग सरल बताते हैं कि बांस की गांठ से निकलने वाली इस रुई को सीधे कटने वाली जगह पर दबा दिया जाता था। ग्रामीणों का यह पारंपरिक अनुभव रहा है कि इसे लगाने के तुरंत बाद रिसता हुआ खून थम जाता था और धीरे-धीरे जख्म सूखने की दिशा में बढ़ने लगता था। संसाधनों की कमी के उस दौर में यह प्राकृतिक रुई कई परिवारों के लिए तात्कालिक मरहम की तरह काम करती थी।
इतिहासकार का नजरिया और टांके जैसी समझ
इस देसी परंपरा पर रोशनी डालते हुए प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय बताते हैं कि पुराने जमाने में बांस की इस रुई को एक तरह के मलहम के रूप में देखा जाता था। देहाती परिवेश में त्वचा के कटने, छिलने और मामूली घावों को भरने के लिए इसे बेहद उपयोगी माना जाता रहा है। डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के मुताबिक पुराने समय में लोग चौड़े और फैले हुए कटने के निशानों पर भी नोनी को चिपका देते थे और उनका मानना था कि यह घाव को आपस में जोड़कर टांका लगाने जैसा सहारा देता है। हालांकि यह केवल उस समय की सीमित समझ और पारंपरिक अनुभव पर आधारित व्यवस्था थी।
संक्रमण का अंदेशा और डॉक्टरी सलाह की अहमियत
भले ही नोनी या कोठ का इस्तेमाल गांवों में केवल बाहरी त्वचा पर किया जाता रहा हो, लेकिन आज के चिकित्सा विज्ञान के दौर में इसे लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। गहरे, गंभीर या बहुत बड़े घाव की स्थिति में नोनी कभी भी अस्पताल के टांकों, एंटीसेप्टिक दवाओं या प्रशिक्षित डॉक्टर के इलाज की जगह नहीं ले सकता। खुले जख्म पर बिना चिकित्सकीय जांच के कोई भी अनजाना प्राकृतिक पदार्थ थोपने से बैक्टीरियल संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में समझदारी यही है कि चोट लगने पर पहले प्रभावित हिस्से को साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाए, फिर साफ कपड़े या गॉज से हल्का दबाव बनाकर खून रोका जाए और जरूरत पड़ने पर सीधे अस्पताल जाकर डॉक्टर से ही परामर्श लिया जाए।



















