हर महीने बैंक खाते में वेतन जमा होते ही अधिकतर लोगों को भरोसा होता है कि इस बार सारे वित्तीय प्रबंधन ठीक रहेंगे, लेकिन शुरुआती दिनों के भीतर ही बजट बिगड़ने लगता है। घरेलू राशन, दैनिक जरूरतें, बिजली और पानी के बिल भुगतान के साथ-साथ अचानक होने वाली ऑनलाइन खरीदारी से खाते की जमा पूंजी तेजी से घटने लगती है। अच्छी तनख्वाह मिलने के बावजूद अधिकांश नौकरीपेशा लोग महीने के अंतिम सप्ताह में नकदी की भारी तंगी महसूस करते हैं। इस वित्तीय असंतुलन से निपटने के लिए दैनिक खर्चों की कार्यप्रणाली में अनुशासन लाना बेहद आवश्यक हो जाता है। चार्टर्ड एकाउंटेंट मनमोहित सिंह ने कुछ व्यवहारिक उपाय बताए हैं, जिनसे मासिक आमदनी को सही ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है।
वेतन मिलते ही बीस प्रतिशत हिस्से की अनिवार्य बचत
अक्सर लोगों की सोच यह रहती है कि महीने भर के तमाम खर्च पूरे करने के बाद जो रकम बच जाएगी, उसे बैंक में सुरक्षित रख लिया जाएगा। यह नजरिया व्यावहारिक तौर पर कारगर साबित नहीं होता क्योंकि अंत में बचत के लिए शायद ही कुछ बचता है। इसलिए सबसे सही नियम यह है कि वेतन प्राप्त होते ही उसका न्यूनतम 20 प्रतिशत हिस्सा तुरंत अलग खाते में रख दिया जाए। इस संरक्षित पूंजी को एक आपातकालीन फंड यानी कंटिनजेंसी फंड के रूप में तैयार किया जाना चाहिए, जिससे किसी भी आकस्मिक चिकित्सा या पारिवारिक जरूरत के समय कर्ज लेने की नौबत न आए। इस बीस फीसदी हिस्से को अलग करने के उपरांत ही शेष बची अस्सी प्रतिशत राशि से घर के आवश्यक बिलों और राशन की सूची बनाकर योजना बनानी चाहिए।
डिजिटल लेनदेन और यूपीआई भुगतानों की सतत निगरानी
वर्तमान समय में यूपीआई के माध्यम से तुरंत भुगतान करने की सुविधा ने अनजाने में खर्चों को काफी बढ़ा दिया है। दिनभर में चाय, नाश्ते, स्नैक्स, तुरंत फूड डिलीवरी या मामूली सामान खरीदने के दौरान छोटी-छोटी रकम डिजिटल माध्यम से कटती रहती है, जिस पर तुरंत कोई विशेष ध्यान नहीं जाता। यही मामूली दिखने वाले रोजमर्रा के लेनदेन महीने के आखिर में मिलकर एक बड़ा वित्तीय बोझ बन जाते हैं। इस तरह के वित्तीय रिसाव को रोकने के लिए हर छोटे डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड रखना जरूरी है। महीने के पहले हफ्ते में ही अनिवार्य खर्चों और गैर-जरूरी इच्छाओं के बीच स्पष्ट अंतर रेखा खींचें और दोनों के लिए खर्च की अधिकतम सीमा तय करें।
ऑटो-डेबिट और बचत योजनाओं का सही इस्तेमाल
बचत करने के संकल्प को केवल अपनी मानसिक इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि हाथ में पैसा रहने पर वह किसी न किसी रूप में खर्च हो ही जाता है। इससे बचाव का सबसे सरल उपाय यह है कि वेतन आने की निर्धारित तारीख के ठीक अगले दिन आरडी अथवा म्यूचुअल फंड एसआईपी के लिए ऑटो-डेबिट विकल्प सक्रिय कर दिया जाए। जब निवेश की राशि बैंक खाते से सीधे कट जाती है, तो मुख्य खाते में अतिरिक्त धनराशि जमा नहीं दिखती, जिससे अनावश्यक व्यय की गुंजाइश सीमित हो जाती है। किसी भी वित्तीय योजना में नियमित निवेश शुरू करने से पहले अपनी निजी आर्थिक स्थिति और जोखिम उठाने की क्षमता का सटीक आकलन जरूर कर लेना चाहिए।
खरीदारी की आदतों और वॉलेट पर संयम
जेब में रखे बटुए में अत्यधिक नकदी या हर समय सक्रिय डेबिट कार्ड लेकर चलने से बिना सोचे-समझे खरीदारी करने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए दैनिक आवागमन के समय बटुए में केवल अत्यंत जरूरी नकद धनराशि ही रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त विभिन्न ई-कॉमर्स और ऑनलाइन शॉपिंग एप्लिकेशन्स से पहले से सहेजे गए कार्ड विवरण हटा देने चाहिए, ताकि तुरंत ऑर्डर करने की जल्दबाजी पर लगाम लग सके। महीने की शुरुआत में निर्धारित बजट का कड़ाई से पालन करके और अपनी दिनचर्या में छोटे बदलाव लाकर महीने के अंतिम दिनों की आर्थिक परेशानी से पूरी तरह बचा जा सकता है।

















