हिंदू परिवारों में तुलसी का पौधा सिर्फ एक वनस्पति नहीं बल्कि आस्था का अहम केंद्र माना जाता है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह घर के आंगन की शोभा भी बढ़ाता है, लेकिन ठंड के मौसम में इस पौधे की सेहत अक्सर बिगड़ने लगती है। सर्दियों की शुरुआत होते ही पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं, पत्ते मुड़ने लगते हैं और कई बार पूरा पौधा सूखने के कगार पर पहुंच जाता है। अत्यधिक ठंड, गिरता पाला और गमले में जरूरत से ज्यादा नमी तुलसी को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। बोकारो स्थित ठाकुर नर्सरी के विशेषज्ञ अभिषेक ने इस मौसम में पौधे की सही देखरेख के तरीके साझा किए हैं।
सर्दियों में पानी देने का सही नियम और जलनिकासी
नर्सरी विशेषज्ञ अभिषेक के अनुसार, वर्ष के बाकी महीनों की तुलना में सर्दियों में तुलसी को सबसे ज्यादा मानवीय देखभाल की आवश्यकता होती है। कड़ाके की ठंड और ओस की बूंदों के सीधे संपर्क में आने से पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं और झड़ने लगती हैं। इसके साथ ही एक बड़ी गलती अत्यधिक सिंचाई की होती है। यदि गमले में जलनिकासी की उचित व्यवस्था नहीं है और बार-बार पानी डाला जा रहा है, तो जड़ों के पास दलदल जैसी स्थिति बन जाती है। इससे जड़ें गलने लगती हैं और पौधे में सड़न पैदा हो जाती है। इस जोखिम को टालने के लिए तुलसी को सदैव ऐसे गमले में रोपना चाहिए जिसमें तलहटी पर पर्याप्त निकासी छेद हों, ताकि अतिरिक्त पानी मिट्टी में ठहरे बिना बाहर निकल सके।
जैविक पोषण और ऊपरी मिट्टी का नवीनीकरण
तुलसी के पोषण के लिए बाजार में मिलने वाले रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। अभिषेक का सुझाव है कि पौधे को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल गाय के गोबर की सड़ी हुई देसी खाद का प्रयोग करना सर्वोत्तम रहता है। रासायनिक तत्व पौधे की कोमलता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गमले की मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और पौधे के विकास को गति देने के लिए समय-समय पर ऊपरी सतह की पुरानी मिट्टी को खुरचकर हटा देना चाहिए और उसकी जगह ताजी, भुरभुरी मिट्टी भर देनी चाहिए। इससे जड़ों तक हवा का संचार सुचारु रहता है और पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है।
हरे कीड़ों से पत्तियों का बचाव
सर्द मौसम में तुलसी की पत्तियों पर अक्सर लंबे, हरे रंग के कीड़े लग जाते हैं। ये कीट पत्तों के रंग से इतने मिलते-जुलते होते हैं कि आसानी से नजर नहीं आते और धीरे-धीरे पत्तियों को कुतरकर खा जाते हैं। पत्तियों के कटने से पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घटती है और उसकी बढ़वार रुक जाती है। अभिषेक बताते हैं कि रासायनिक स्प्रे करने के बजाय नियमित रूप से पौधे की पत्तियों की सूक्ष्मता से जांच करनी चाहिए। यदि कोई कीट दिखाई दे, तो उसे किसी साफ लकड़ी या हाथ की मदद से सावधानीपूर्वक चुनकर अलग कर देना चाहिए। समय रहते इन कीटों को हटाने से पौधा बड़ी क्षति से बच जाता है।
पिंचिंग तकनीक से पौधे को बनाएं घना
बहुत से घरों में तुलसी का पौधा सिर्फ ऊपर की ओर एक पतली डंडी के रूप में लंबा होता चला जाता है, जबकि उसमें किनारे से नई शाखाएं और घनी पत्तियां नहीं निकलतीं। पौधे को झाड़ीदार और घना रूप देने के लिए पिंचिंग सबसे प्रभावी तरीका है। इस प्रक्रिया में पौधे की शाखा के सबसे ऊपरी, कोमल बढ़ते हुए सिरे को उंगलियों से हल्का सा तोड़ दिया जाता है। इस छंटाई से पौधा ऊपर बढ़ने के बजाय नई पार्श्व शाखाएं विकसित करने लगता है। इसके साथ ही पौधे पर लगी सूखी, पीली और रोगग्रस्त पत्तियों को लगातार छांटते रहना चाहिए, जिससे पौधा ऊर्जा बचाकर सर्दियों में भी स्वस्थ और हरा-भरा बना रहता है।



















