शहरी इलाकों और संकुचित मकानों में रहने वाले अधिकांश परिवारों की ख्वाहिश होती है कि उनकी थाली में आने वाली सब्जियां पूरी तरह ताजी और रसायन मुक्त हों। हालांकि, जमीन की कमी या पक्के आंगन के चलते बहुत से लोग बागवानी की योजना छोड़ देते हैं। इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के एक किसान ने पेश किया है, जिन्होंने सीमित जगह में गमलों और कंटेनरों की मदद से समृद्ध जैविक किचन गार्डन विकसित किया है। मौसम के अनुकूल सब्जियों का चुनाव करके वे अपने दैनिक आहार के लिए घर पर ही ताजा उपज हासिल कर रहे हैं।
बीमारी से उबरने के बाद रासायनिक खेती छोड़कर चुना जैविक रास्ता
चित्रकूट की मानिकपुर तहसील अंतर्गत बरहट गांव के निवासी किसान कोठारी सिंह पटेल पहले पारंपरिक तरीके से खेती करते थे। साल 2023 में उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से दूरी बनाकर जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ाया। स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर दिक्कतों का सामना करने के बाद उन्होंने अपनी भोजन शैली में बुनियादी बदलाव करने का निर्णय लिया। जब उन्होंने रासायनिक खादों से मुक्त जैविक अनाज और ताजी सब्जियों का सेवन शुरू किया, तो उनकी सेहत में उल्लेखनीय सुधार दर्ज हुआ। इस अनुभव ने उन्हें अपनी पूरी जीवनशैली को जैविक सिद्धांतों पर ढालने के लिए प्रेरित किया।
खेत में पारंपरिक फसलें और घर के पास सब्जियों का बगीचा
कोठारी सिंह अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों की खेती पूरी तरह जैविक पद्धति से करते हैं। इसके समानांतर, उन्होंने अपने घर के ठीक निकट एक सुव्यवस्थित किचन गार्डन तैयार किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य रसोई की दैनिक जरूरतों को पूरा करना है। इससे पूर्व वे परवल और शकरकंद जैसी फसलों की सफल पैदावार ले चुके हैं। वर्तमान समय में उनके इस घरेलू बगीचे में लौकी, बैंगन, हरी मिर्च और टमाटर की भरपूर पैदावार हो रही है, जिससे उनके परिवार को रोजमर्रा की बुनियादी सब्जियों के लिए बाजार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
रसोई के नजदीक स्थान और दैनिक उपयोग की सब्जियों का चयन
घरेलू बागवानी की सफलता के लिए कोठारी सिंह पटेल का सुझाव है कि किचन गार्डन का स्थान हमेशा रसोई घर के समीप चुना जाना चाहिए। इससे नियमित देखभाल, पानी देने और खाना बनाते समय ताजी सब्जियां सीधे तोड़ने में अत्यधिक सुविधा रहती है। इसके अतिरिक्त, शुरुआत में केवल उन्हीं सब्जियों के पौधे लगाने चाहिए जिनका रसोई में दैनिक उपयोग सर्वाधिक होता है। भले ही ऐसे छोटे बगीचों से मिलने वाली उपज का पैमाना खेतों जितना विशाल न हो, लेकिन यह एक सामान्य परिवार की रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरी तरह पूरा करने के लिए पर्याप्त साबित होता है।
पक्के फर्श और गमलों में बागवानी करने की सरल तकनीक
जिन घरों में खुली जमीन, कच्ची मिट्टी या क्यारियां बनाने की जगह उपलब्ध नहीं है, वहां भी बागवानी पूरी तरह संभव है। कोठारी सिंह के अनुसार, पक्के फर्श, बालकनी या छत पर बड़े आकार के गमलों अथवा मजबूत कंटेनरों की सहायता से पौधे रोपे जा सकते हैं। इन बर्तनों में उपजाऊ मिट्टी के साथ संतुलित मात्रा में जैविक खाद भरकर बैंगन, हरी मिर्च, टमाटर और लौकी जैसी बेल वाली सब्जियों की पौध आसानी से तैयार की जा सकती है। यह तकनीक उन लोगों के लिए बेहद मुफीद है जो सीमित आवासीय दायरे में रहकर भी शुद्ध खानपान अपनाना चाहते हैं।
सस्ती लागत, बेहतर सेहत और मानसिक सुकून का दोहरा लाभ
किचन गार्डन में किसी भी रासायनिक खाद का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होना चाहिए और सिर्फ प्राकृतिक जैविक खाद को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे न केवल जहरीले तत्वों से मुक्ति मिलती है, बल्कि बाजार से बार-बार छोटी मात्रा में महंगी सब्जियां खरीदने का खर्च भी बच जाता है। इसके अलावा, नियमित रूप से पौधों की निराई-गुड़ाई और देखभाल करने से मानसिक तनाव दूर होता है, घर का वातावरण हरा-भरा रहता है और दिनचर्या में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कोठारी सिंह का अनुभव बताता है कि उचित पोषण और नियमित देखभाल मिलने पर कुछ सब्जियां रोपाई के महज 20 दिन बाद फल देना आरंभ कर देती हैं।
‘खेती बचाओ बुंदेलखंड’ के जरिए ग्रामीणों और शहरी लोगों को कर रहे जागरूक
अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ कोठारी सिंह सामाजिक जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। वे ‘खेती बचाओ बुंदेलखंड’ नाम से एक संगठन का संचालन करते हैं। इस मंच के माध्यम से वे ग्रामीण किसानों और शहरी नागरिकों दोनों को रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से अवगत कराते हैं। वे लोगों को घर-घर जैविक किचन गार्डन लगाने और विषमुक्त प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए निरंतर प्रेरित और प्रशिक्षित कर रहे हैं, ताकि हर परिवार स्वच्छ आहार प्राप्त कर सके।

















