झारखंड के पलामू जिले में पारंपरिक फसलों से अलग हटकर खेती करने का एक नया प्रयोग देखने को मिला है। बसना गांव के रहने वाले किसान सतीश दुबे ने अपनी जमीन पर चंदन की खेती शुरू की है। उन्होंने खेत में कुल 50 चंदन के पौधे लगाए हैं, जिन्हें वे आने वाले वर्षों के लिए एक ठोस और सुरक्षित आर्थिक निवेश मान रहे हैं। सामान्य खेती के मुकाबले चंदन तैयार होने में काफी वक्त लेता है, लेकिन बाजार में इसकी लकड़ी और सुगंध की भारी मांग किसानों को इस दिशा में आकर्षित कर रही है।
नागपुर से मंगाए गए पौधे और शुरुआती विकास
सतीश दुबे ने करीब तीन वर्ष पहले महाराष्ट्र के नागपुर से ये पौधे मंगवाए थे। उस समय प्रत्येक पौधे की खरीद लागत लगभग 100 रुपये आई थी। खेत में रोपे जाने के बाद से इन पौधों की देखरेख नियमित रूप से की जा रही है। पिछले तीन वर्षों के दौरान पेड़ों की बढ़वार काफी संतोषजनक रही है और कई पेड़ अब 8 से 10 फीट की ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। किसान ने पारंपरिक फसलों के साथ ही चंदन को भी अपने कृषि रकबे में जगह दी है, ताकि नियमित खेती प्रभावित हुए बिना दीर्घकालिक लाभ हासिल किया जा सके।
सुगंध और परिपक्वता का समय चक्र
चंदन के पेड़ की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी भीनी और टिकाऊ खुशबू मानी जाती है। पेड़ जैसे-जैसे विकसित होता है, उसके भीतरी तने में सुगंध का निर्माण शुरू होता है। सतीश दुबे के अनुसार, रोपण के करीब 8 से 10 वर्ष बीत जाने के बाद इन पेड़ों में प्राकृतिक सुगंध आने की उम्मीद है। हालांकि, व्यावसायिक दृष्टिकोण से लकड़ी को पूरी तरह परिपक्व होने में कम से कम 10 से 15 वर्ष अथवा उससे भी अधिक का लंबा समय लग सकता है। इसी वजह से यह मॉडल तुरंत पैसे देने के बजाय एक सुनियोजित भविष्य निधि की तरह काम करता है।
दीर्घकालिक योजना से 50 लाख रुपये की कमाई की उम्मीद
बाजार में चंदन की लकड़ी की कीमतें हमेशा ऊंची रहती हैं और विभिन्न उद्योगों में इसकी निरंतर खपत बनी रहती है। इसी आर्थिक मजबूती को ध्यान में रखते हुए किसान ने इन 50 पेड़ों को खेत में लंबे समय तक सहेजकर रखने का फैसला किया है। उनका अंतिम लक्ष्य करीब 15 से 20 वर्षों के अंतराल के बाद इन परिपक्व पेड़ों से बड़ा आर्थिक लाभ कमाना है। सतीश दुबे को पूरा भरोसा है कि अगर बाजार में पेड़ों की बिक्री सही मूल्य पर हुई, तो इन 50 पेड़ों से उन्हें लगभग 50 लाख रुपये तक की आमदनी प्राप्त हो सकती है।























