यमन के दक्षिण-पश्चिमी शहर ताइज़ में हर सुबह जब बच्चे बस्ते लेकर घर से निकलते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ा इम्तिहान किसी कक्षा का नहीं बल्कि जिंदा स्कूल पहुंचने का होता है। दस साल की रफ़ीफ़ और उसका छोटा भाई सुबह छह बजे क्रीम और भूरे रंग की अपनी स्कूल ड्रेस पहनकर तैयार होते हैं। किताबों और दोस्तों से मिलने का उत्साह अपनी जगह है, लेकिन घर से स्कूल तक का सफर मौत के साए से होकर गुजरता है। जिस रास्ते पर वे कदम बढ़ाते हैं, वहां सामने से नहीं बल्कि ठीक पीछे से स्नाइपर की बंदूकें उन पर तनी होती हैं।
युद्ध के मोर्चे पर खड़ा स्कूल
रफ़ीफ़ जिस स्कूल में पढ़ती है, वह ताइज़ शहर के एक पहाड़ की चोटी पर स्थित है। यह इलाका नो मैन्स लैंड कही जाने वाली घाटी के ठीक किनारे पर है, जो यमन के गृहयुद्ध का बेहद संवेदनशील और विवादित मोर्चा बन चुका है। इस पहाड़ की एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के सुरक्षा बलों का नियंत्रण है, जिसे सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। दूसरी तरफ की पहाड़ियों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के स्नाइपर ठिकाने और बंकर मौजूद हैं। रफ़ीफ़ का घर इस पहाड़ के निचले हिस्से में है। जब भी वह स्कूल के लिए चढ़ाई चढ़ती है, उसकी पीठ सीधे तौर पर हूती स्नाइपर्स की रेंज में होती है। वह बताती है कि इस सफर में हर पल डर लगा रहता है, लेकिन पढ़ाई की ललक उसे रुकने नहीं देती।
शिक्षा और उम्मीद के लिए जोखिम
रफ़ीफ़ को गणित, अरबी और इस्लामिक स्टडीज पढ़ना बेहद पसंद है। वह अगले साल से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू करने को लेकर काफी उत्साहित है। युद्ध की विभीषिका के बीच उसके माता-पिता केवल स्कूल जाने के लिए ही उसे घर से बाहर निकलने की इजाजत देते हैं। उनका सपना है कि बेटी पढ़-लिखकर डॉक्टर बने और इस नर्क जैसी जिंदगी से बेहतर भविष्य हासिल करे। रफ़ीफ़ के लिए स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि अपने दोस्तों से मिलने का इकलौता जरिया भी है। वह अपनी कक्षा के सभी सहपाठियों के नाम गिनाते हुए कहती है कि दोस्तों से दूर रहना उसके लिए संभव नहीं है।
रफ़ीफ़ का परिवार मूल रूप से तटीय शहर हुदैदा का रहने वाला है। नौ साल पहले जब हुदैदा पर हूतियों का कब्जा हुआ था, तब वे जान बचाकर ताइज़ आ गए थे। हालांकि ताइज़ में भी खतरा कम नहीं हुआ। दो साल पहले उनके नए घर के ठीक बाहर एक मोर्टार आकर गिरा था। उस वक्त रफ़ीफ़ और उसका भाई ही घर के भीतर मौजूद थे। अचानक हुए धमाके से छर्रे दरवाजे को चीरते हुए कमरे में घुस गए। इस हमले में रफ़ीफ़ का हाथ टूट गया था और आज भी उस जख्म का निशान उसके हाथ पर मौजूद है।
संकट में घिरी लाखों मासूम जिंदगियां
यमन में बच्चों की स्थिति बेहद भयावह हो चुकी है। यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले महीने संघर्ष तेज होने से पहले ही यमन में करीब 32 लाख बच्चे स्कूल से पूरी तरह बाहर थे। साल 2014 में गृहयुद्ध की शुरुआत के बाद से अब तक हजारों बच्चे मारे जा चुके हैं या गंभीर रूप से अपंग हो चुके हैं। इसके अलावा दोनों पक्षों के सशस्त्र गुटों द्वारा हजारों बच्चों को जबरन युद्ध में झोंकने के लिए भर्ती किया गया है।
ताइज़ लंबे समय से इस विनाशकारी गृहयुद्ध का मुख्य केंद्र रहा है। साल 2015 में राजधानी सना से सरकार को बेदखल करने के बाद हूतियों ने ताइज़ पर पूरी तरह कब्जा करने की कोशिश की थी, लेकिन स्थानीय लड़ाकों ने उन्हें शहर के बड़े हिस्से से पीछे खदेड़ दिया था। रणनीतिक रूप से यदि हूती ताइज़ पर कब्जा कर लेते हैं, तो देश के पूरे उत्तरी हिस्से पर उनका एकछत्र नियंत्रण स्थापित हो जाएगा। हालिया हमलों में विद्रोही आधुनिक हथियारों के साथ-साथ ड्रोनों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं।
शहर की घेराबंदी और जमीनी हालात
हाल के दिनों में ताइज़ के आसपास लड़ाई काफी तेज हो गई है। रविवार को हूती लड़ाकों ने ताइज़ को अदन से जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण सप्लाई रूट को पूरी तरह काट दिया, जिससे ताइज़ शहर प्रभावी रूप से चारों तरफ से घिर गया है। इस सप्लाई रूट पर नियंत्रण को लेकर दोनों पक्षों के बीच लगातार टकराव चल रहा है और नियंत्रण बदलता रहता है। शहर के स्थानीय निवासी भारी दहशत में हैं कि विद्रोही कभी भी शहर में दाखिल हो सकते हैं।
दूसरी ओर, सरकारी बलों ने भी अन्य रणनीतिक मोर्चों पर बढ़त हासिल करने का दावा किया है। उन्होंने वैश्विक जहाजरानी के अहम चोकपॉइंट बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रणनीतिक ठिकानों पर फिर से नियंत्रण हासिल किया है और राजधानी सना को दोबारा अपने कब्जे में लेने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया है। ताइज़ की पहाड़ियों पर बने कई घर गोलाबारी के चलते खाली पड़े हैं क्योंकि लोग विस्थापन को मजबूर हैं। इलाके के हालात इतने नाजुक हैं कि स्नाइपर हमलों के लगातार खतरे के कारण कई बस्तियों में बाहरी लोगों का प्रवेश लगभग असंभव हो चुका है।
कक्षाओं के ऊपर स्नाइपर के ठिकाने
रफ़ीफ़ के स्कूल के 45 वर्षीय शिक्षक अब्देल रकीब अल-ओबैदी बताते हैं कि खतरे के बीच जीना अब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। स्कूल की छत से सामने की पहाड़ियों पर स्थित हूती सैन्य शिविर, बैरक और स्नाइपर मोर्चे साफ नजर आते हैं। यहां तक कि छत पर खड़े होने पर सुरक्षा सलाहकारों को तुरंत पीछे हटना पड़ता है क्योंकि स्कूल सीधे दुश्मन के निशाने पर रहता है।
शिक्षक अब्देल रकीब बताते हैं कि स्कूल पर पहले भी कई बार गोलियां चलाई जा चुकी हैं। उनका कहना है कि हालात इतने अनिश्चित हैं कि जब वे कक्षा में बैठे हों, सड़क पर चल रहे हों या घर में सो रहे हों, किसी भी पल कहीं से भी गोलाबारी हो सकती है। यहां किसी को नहीं पता कि उनका कल कैसा होगा और भविष्य क्या मोड़ लेगा।
अस्पतालों में बेगुनाहों का खून
इस जंग में आम नागरिक और मासूम बच्चे सबसे ज्यादा पिस रहे हैं। स्कूल से महज पांच मिनट की दूरी पर स्थित अल-रौदा अस्पताल में हर दिन युद्ध की दर्दनाक तस्वीरें देखने को मिलती हैं। हाल ही में शहर की एक मैकेनिक की दुकान पर अचानक गिरे मोर्टार शेल ने दो बच्चों की जिंदगी तबाह कर दी। इस हमले में तीन साल के मासूम अहमद की जान चली गई। मोर्टार का एक छर्रा बच्चे की पीठ से घुसकर सीधे उसके दिल को चीरता हुआ निकल गया।
अहमद अपने पिता के साथ मैकेनिक की दुकान पर मोटरसाइकिल के पहिए में हवा भरवाने गया था। पिता बच्चे को घर पर ही छोड़ना चाहते थे, लेकिन बच्चा रोने लगा और साथ चलने की जिद करने लगा। हमले में पिता सुरक्षित बच गए, लेकिन मासूम अहमद की मौके पर ही मौत हो गई। अस्पताल में इंटेंसिव केयर यूनिट के बाहर खून से सने रबर के छोटे सैंडल देखकर नर्स इकरामा शमसान फूट-फूट कर रो पड़ीं। अस्पताल से अपने जिगर के टुकड़े का शव ले जाते वक्त पिता के सामने यह यक्ष प्रश्न था कि वह घर जाकर बच्चे की मां को क्या जवाब देंगे।
जीवन और मौत के बीच झूलता बचपन
उसी मैकेनिक की दुकान पर काम करने वाला 11 साल का अमजद भी इस मोर्टार हमले का शिकार हुआ। अमजद और उसका भाई अपने चाचा के साथ दुकान पर काम करते थे ताकि गांव में रह रहे अपने परिवार को पैसे भेज सकें। हमले में मोर्टार के छर्रे अमजद के फेफड़े और पेट में जा घुसे। गंभीर हालत में उसे अस्पताल की आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था।
अमजद को रात करीब आठ बजे अस्पताल लाया गया था। उसके गांव से अस्पताल की दूरी आठ घंटे के सफर की थी। उसकी मां सुबह करीब छह बजे अस्पताल पहुंचीं। अपने बेटे के बिस्तर के पास बैठकर वे सिर्फ दुआएं मांगती रहीं। डॉक्टरों के अनुसार, मां की मौजूदगी से बच्चे की हृदय गति में सुधार हुआ, जिसके बाद उसे एक और जटिल सर्जरी के लिए ले जाया गया। हालांकि उसकी हालत अब भी बेहद नाजुक बनी हुई है। अस्पताल की नर्स शमसान कहती हैं कि बच्चों को इस तरह मरते और तड़पते देखना दिल दहला देने वाला है, और वे केवल शांति और सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं।



















