बॉलीवुड अभिनेत्री तमन्ना भाटिया अपनी आने वाली फिल्म द वन को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं, जिसमें वह अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ पहली बार बड़े पर्दे पर नजर आने वाली हैं। बिहार की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी इस कहानी में छठ पर्व के एक विशेष गीत को भी भव्य तरीके से शामिल किया गया है। फिल्म के प्रचार अभियान की शुरुआत करते हुए अभिनेत्री ने एक ऐसा पारंपरिक परिधान चुना, जिसने सीधे तौर पर बिहार की लोककला और छठ के आध्यात्मिक महत्व को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।
मिथिला पेंटिंग और चार कलाकारों की हस्तकला का संगम
राधा अष्टमी के पावन अवसर पर अभिनेत्री ने नीले और पीले रंगों के विशेष संयोजन वाली एक खूबसूरत साड़ी और शॉल धारण की। इस परिधान की सबसे अनूठी विशेषता इसका पल्लू रहा, जिस पर बिहार की विश्वप्रसिद्ध मधुबनी कला को हाथ से उकेरा गया था। इस बारीक और जीवंत कलाकृति को तैयार करने में कुल 4 स्थानीय कलाकारों का योगदान रहा, जिन्होंने कई पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा को कपड़े पर जीवंत रूप दिया। साड़ी के केंद्र में भगवान राधा और कृष्ण की युगल जोड़ी के चित्र को पारंपरिक मिथिला शैली और प्रतीकों के साथ दर्शाया गया, जिसका हर रेखांकन अपने आप में गहरा सांस्कृतिक संदेश समेटे हुए है।
उगते और डूबते सूर्य के रंगों से जुड़ा परिधान का चयन
तमन्ना भाटिया ने अपने इस लुक के पीछे की वैचारिक सोच को साझा करते हुए स्पष्ट किया कि छठ महापर्व की मूल भावना उगते और डूबते दोनों सूर्यों के प्रति समान कृतज्ञता व्यक्त करने की है। इसी प्रतीकात्मक बदलाव और प्राकृतिक प्रकाश के संतुलन को दिखाने के लिए उन्होंने चमकीले पीले रंग के साथ गहरे नीले रंग का मेल चुना। पीला रंग सुबह की पहली धूप और ऊर्जा का प्रतीक बनता है, जबकि गहरा नीला रंग संध्या अर्घ्य और आसमान के गहरे विस्तार को दर्शाता है। इस प्रकार उनका पहनावा केवल एक फैशन पसंद न होकर, सीधे तौर पर फिल्म की मूल कहानी और स्थानीय लोकाचार से जुड़ गया।
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन
इस ठेठ पारंपरिक हस्तशिल्प साड़ी के साथ अभिनेत्री ने अपने आभूषणों में एक समकालीन स्पर्श जोड़ा। उन्होंने कानों में हीरों से जड़े आधुनिक डायमंड चैंडेलियर इयरिंग्स पहने, जिनमें नाजुक लटकन और हीरों की चमक का खूबसूरत काम था। यह आधुनिक आभूषण प्राचीन लोककला की सादगी के साथ सहज रूप से घुलमिल गया। सोशल मीडिया पर उनके इस लुक को प्रशंसकों द्वारा खूब सराहा गया और कई लोगों ने सांस्कृतिक विरासत को इतने सम्मानजनक ढंग से पेश करने के लिए इसे पूरे अंक दिए।



















