भोजन की जब भी बात चलती है, तो हर इलाके की अपनी एक खास पहचान सामने आती है। इसी कड़ी में मिथिलांचल की रसोई का जिक्र होते ही सबसे पहला ख्याल चूड़ा-दही का आता है। मैथिल समाज में दही का स्थान केवल एक व्यंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दैनिक जीवन और आतिथ्य सत्कार की बुनियाद है। यहां के लोग सुबह के नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और रात के भोजन तक में बड़े चाव से चूड़ा-दही शामिल करते हैं। जब घर में कोई खास पकवान बनाने का समय न हो या कुछ हल्का और तृप्त करने वाला खाना हो, तब भी लोग सुबह और शाम इसी पारंपरिक मेल को प्राथमिकता देते हैं।
मिथिलांचल की थाली में दही का विशेष स्थान
मिथिला के बाशिंदों के लिए दही सबसे प्रिय खाद्य पदार्थों में गिनी जाती है। भोजन के अंत में थोड़ा दही खाना सेहत के लिए भी मुफीद माना गया है क्योंकि यह पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मददगार होता है। इसके अलावा भारतीय परंपरा में इसे शुभता का प्रतीक भी माना गया है। घरों में अक्सर यह शिकायत रहती है कि दही जमाने पर वह पतली रह जाती है या बहुत ज्यादा पानी छोड़ देती है। मिथिलांचल के गांवों और कस्बों में अपनाई जाने वाली पारंपरिक तकनीक इस समस्या को पूरी तरह हल कर देती है, जिससे दही थक्केदार और बेहद स्वादिष्ट बनती है।
मिट्टी के बर्तन की तैयारी और सोंधी महक का राज
दही को एकदम गाढ़ा जमाने के लिए यहां सबसे पहले मिट्टी के बर्तन का चुनाव किया जाता है। बर्तन को इस्तेमाल में लाने से पूर्व पानी से बहुत अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की हांडी को हल्की आंच पर थोड़ी देर सेका जाता है। आंच पर तपाने की यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से दही के भीतर मिट्टी की एक अनोखी सोंधी खुशबू और लाजवाब स्वाद समा जाता है।
दूध का सही तापमान और जामन लगाने का तरीका
दही जमाने के अगले चरण में दूध को अच्छी तरह उबाला जाता है। जब दूध पूरी तरह उबल जाए, तब उसे तैयार किए गए मिट्टी के बर्तन में पलट दिया जाता है। इसके बाद दूध के तापमान की नियमित निगरानी की जाती है। दूध को बार-बार उंगली डुबोकर परखा जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह जरूरत से ज्यादा गर्म न हो। जब दूध सिर्फ गुनगुना रह जाए और उसमें उंगली डालने पर तेज गर्मी का अहसास न हो, ठीक उसी समय जामन डाला जाता है। लगभग आधा चम्मच ताजी दही का जामन इस गुनगुने दूध में अच्छी तरह मिलाया जाता है।
तापमान संतुलन के लिए अनाज के डिब्बों का उपयोग
जामन मिलाने के बाद उस मिट्टी के बर्तन को किसी स्थिर और गर्म स्थान पर रखना जरूरी होता है। मिथिलांचल में महिलाएं इस बर्तन को गेहूं के आटे वाले बड़े पीपे या चावल के भंडारण वाले पात्र के अंदर दबाकर रख देती हैं। अनाज के भीतर प्राकृतिक रूप से गर्माहट बनी रहती है, जिससे दूध का तापमान गिरता नहीं है और किण्वन की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। इस तरीके से दही बिना हिले-डुले बेहद शानदार और गाढ़ी जम जाती है।
हरी मिर्च और चीनी के वैकल्पिक नुस्खे
परंपरागत जामन के अलावा यहां के कई घरों में दही जमाने के लिए एक और अनोखी तरकीब अपनाई जाती है। कुछ लोग हल्के गुनगुने दूध में डंठल वाली साबुत हरी मिर्च डाल देते हैं। इसके साथ ही कुछ लोग इसमें चुटकी भर चीनी भी मिलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि हरी मिर्च और चीनी दूध को तेजी से थक्केदार बनाने और जमने में सहायता करते हैं। अगली सुबह जब बर्तन खोला जाता है, तो मिट्टी की भीनी खुशबू से महकती हुई गाढ़ी दही मिलती है। इस विधि से तैयार दही में पानी बिल्कुल अलग नहीं होता और इसका स्वाद साधारण बर्तनों में जमी दही से कहीं ज्यादा समृद्ध होता है।


















