उत्तराखंड के सरोवर नगरी नैनीताल में बुधवार को 124वें मां नंदा-सुनंदा महोत्सव का समापन बेहद भावुक माहौल में हुआ। दोपहर 12 बजे मां नयना देवी मंदिर प्रांगण से मां नंदा और मां सुनंदा का भव्य डोला नगर भ्रमण के लिए रवाना किया गया। जैसे ही डोला मंदिर से बाहर निकला, पूरा क्षेत्र देवी के जयकारों से गूंज उठा। तड़के से ही स्थानीय नागरिकों के साथ दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की कतारें मां के अंतिम दर्शन और विदाई अनुष्ठान में भाग लेने के लिए लगने लगी थीं।
श्रद्धा के साथ बदला विदाई का पारंपरिक स्वरूप
मां नंदा-सुनंदा की डोला यात्रा नैनीताल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान की रीढ़ मानी जाती है। इलाके के वरिष्ठ नागरिकों के मुताबिक, शुरुआती दौर में यह विदाई बेहद सादगी के साथ संपन्न कराई जाती थी। उस समय स्थानीय मजदूर मां की पवित्र प्रतिमाओं को अपने कंधों पर उठाकर पूरे नगर में परिक्रमा करवाते थे। दशकों के सफर में इस आयोजन का स्वरूप लगातार विशाल होता गया और अब यह सामूहिक आस्था और भव्यता के विराट प्रतीक में बदल चुका है।
रिमझिम फुहारों के बीच अटूट रहा श्रद्धालुओं का उत्साह
डोला यात्रा के दौरान शहर में हल्की बारिश का दौर चलता रहा, लेकिन मौसम का यह मिजाज श्रद्धालुओं के कदमों को नहीं डिगा सका। महिलाएं, छोटे बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी एक साथ मां के डोले के पीछे भक्ति भाव से चलते रहे। रास्ते भर लोग दोनों हाथ जोड़कर देवी प्रतिमाओं की एक झलक पाने को आतुर दिखे। रिमझिम फुहारों के बीच वातावरण मां के उद्घोषों से गुंजायमान रहा और श्रद्धालुओं की अडिग आस्था ने मौसम की बाधा को पूरी तरह बेअसर कर दिया।
नगर भ्रमण मार्ग पर पुष्पवर्षा और पारंपारिक स्वागत
मां नयना देवी मंदिर से प्रस्थान करने के बाद डोला निर्धारित मार्गों की ओर बढ़ा। पूरे रास्ते में भक्तों ने छतों और रास्तों से पुष्पवर्षा कर मां का वंदन किया। यह शोभायात्रा डीएसए मैदान, मस्जिद, शारदा संघ और माल रोड से होकर गुजरी। सड़क के दोनों किनारों पर घंटों पहले से डटे श्रद्धालु हाथ जोड़कर नमन करते रहे। कई पड़ावों पर श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से देवी की पूजा-अर्चना कर अपने परिवार के लिए सुख-शांति का वरदान मांगा।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकनृत्यों की प्रस्तुति
इस शोभायात्रा में उत्तराखंड की लोक कला का अनूठा संगम देखने को मिला। ढोल-दमाऊं, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और बैंड-बाजों की थाप ने पूरे माहौल को भक्ति रस से सराबोर कर दिया। अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंची सांस्कृतिक मंडलियों और छोलिया नृत्य दलों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। डोले के चारों तरफ चल रहे भक्त निरंतर मां नंदा और सुनंदा के जयकारे लगाते रहे, जिससे पहाड़ों की वादियां देर तक गूंजती रहीं।
जगह-जगह भंडारे और निःस्वार्थ सेवा
नगर भ्रमण के दौरान आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए शहर में विभिन्न स्थानों पर भंडारों की व्यवस्था की गई थी। स्थानीय स्वयंसेवकों ने जगह-जगह हलवा-पूरी, शीतल जल, फ्रूटी और विशेष प्रसाद का वितरण किया। बारिश जारी रहने के बाद भी सेवादारों का उत्साह कम नहीं हुआ और वे लगातार लोगों की मदद में जुटे रहे। यह निस्वार्थ सेवा भाव इस पारंपरिक उत्सव की सामाजिक एकजुटता को बयां कर रहा था।
शोर घाटी के लखिया भूत ने मोहा मन
महोत्सव के दौरान पिथौरागढ़ की शोर घाटी से पहुंचे लोक कलाकारों के दल ने पारंपरिक लखिया भूत का मंचन किया। चटख रंगों वाली वेशभूषा, कुमाऊंनी लोकधुनों और विशिष्ट नृत्य मुद्राओं ने पर्यटकों और स्थानीय लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मनमोहक प्रस्तुति को निहारने के लिए भारी भीड़ जुटी। लखिया भूत के इस पारंपरिक प्रदर्शन ने उत्सव में कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया।
पहाड़ से मैदान तक पहुंचे हजारों श्रद्धालु
देवी के इस विदाई समारोह में भागीदारी दर्ज कराने के लिए केवल नैनीताल ही नहीं, बल्कि पर्वतीय गांवों और मैदानी शहरों से भी जनसैलाब उमड़ा। हल्द्वानी, रामनगर, काशीपुर और रुद्रपुर जैसे प्रमुख मैदानी इलाकों से हजारों लोग सुबह ही सरोवर नगरी पहुंच चुके थे। मंदिर से लेकर विसर्जन मार्ग तक हर कोना भक्तों की श्रद्धा से भरा हुआ नजर आया।
सख्त सुरक्षा व्यवस्था और विसर्जन के साथ विदाई
अंतिम दिन पूरे नगर का माहौल नंदा देवी की भक्ति में डूबा रहा। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं लोकगीतों पर नृत्य करते हुए आगे बढ़ रही थीं। बढ़ती भीड़ और आवागमन को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे। डोला यात्रा संपन्न होने के बाद मां नंदा और मां सुनंदा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया, जिसके साथ ही 124वां महोत्सव संपन्न हुआ। इस विदाई के साथ ही भक्तों की आंखें छलक आईं और उन्होंने अगले वर्ष मां के पुनः आगमन का संकल्प लिया।



















