नेपाल के उत्तरी, मध्य और पूर्वी इलाकों में हिमनद फटने के बाद आई भीषण बाढ़ और मलबे के बहाव ने तबाही की एक ऐसी दास्तान लिख दी है, जिसने पूरे हिमालयी क्षेत्र को दहलाकर रख दिया है। 26 अगस्त को आई इस कुदरती आफत के एक हफ्ते बाद भी हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। कई दूरदराज के पर्वतीय इलाकों से संपर्क टूट चुका है और सुरक्षा बल मलबे के बीच जिंदगी की तलाश में लगातार अभियान चला रहे हैं। देश के आठ प्रमुख जिलों से नए शव बरामद होने के बाद मृतकों का आधिकारिक आंकड़ा 1,050 के पार पहुंच गया है, जबकि 4,000 से अधिक लोग अब भी लापता दर्ज हैं। आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लापता लोगों में 583 विदेशी पर्यटक और 83 सुरक्षा कर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, कठिन मौसम के बावजूद सेना और आपदा राहत दलों ने अब तक लगभग 12,000 लोगों को सुरक्षित बचाकर राहत शिविरों तक पहुंचाया है।
हिमालयी नदियों के उफान और निचले इलाकों में जलप्रलय का बड़ा खतरा
जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग ने देश की प्रमुख नदियों के जलस्तर को लेकर नया रेड अलर्ट जारी किया है। लगातार हो रही रुक-रुक कर बारिश के कारण नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बचाव कार्यों में लगे दस्तों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, सिंधुली जिले में बहने वाली सुन कोशी नदी, गोरखा की बूढ़ी गंडकी नदी और डडेलधुरा की महाकाली नदी खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही हैं।
इसके अलावा, लमजुंग जिले की मर्स्यांगदी नदी का जलस्तर भुकुंडेबेसी जल स्तर निगरानी केंद्र पर खतरे की सीमा को लांघ गया है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) ने नदी तटों के समीप रहने वाले सभी नागरिकों से तुरंत सुरक्षित और ऊंचे स्थानों की ओर जाने का आग्रह किया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि बारिश का दौर इसी तरह जारी रहा, तो निचले मैदानी इलाकों में पानी का बहाव और अधिक विध्वंसकारी रूप धारण कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी और वैश्विक कार्रवाई की पुकार
इस भीषण त्रासदी के बीच नेपाल के शीर्ष नेतृत्व और मंत्रियों ने इस आपदा को सीधे तौर पर वैश्विक जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम करार दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के रास्ते आई तबाही पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में औसत तापमान में 1.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की पुष्टि हो चुकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह त्रासदी किसी स्थानीय लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु बदलाव का सीधा असर है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि जब यह संकट वैश्विक है, तो इसका मुकाबला करने और पुनर्निर्माण के प्रयासों में सहयोग देने की जिम्मेदारी भी पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बनती है।
वहीं, नेपाल के विदेश मंत्री शीशिर खनाल ने कहा कि बर्फ, पत्थरों और ठंडे पानी के इस भीषण हमले को एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों से विकासशील और पर्वतीय देशों के लिए जलवायु न्याय और अनुकूलन कोष में तेजी से सहयोग की अपील की। इसके साथ ही, वन एवं पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी ने देश के भीतर पर्यावरण संरक्षण और जलवायु नीति को राष्ट्रीय प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखने की वकालत की। उन्होंने कहा कि नेपाल को अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में अपने अधिकारों और क्षतिपूर्ति के दावों को पूरी मुखरता से पेश करना होगा।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: भविष्य में और भयावह हो सकती हैं हिमनद बाढ़
नेपाल की इस तबाही पर संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी गहरा संज्ञान लिया है। संयुक्त राष्ट्र की सहायक महासचिव कन्नी विग्नराजा ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि आने वाले समय में संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों के टूटने (GLOF) की घटनाओं में भारी वृद्धि हो सकती है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और झील फटने की स्थिति में आधुनिक तकनीक भी इतनी सक्षम नहीं है कि वह विशाल नदियों के बहाव को रोक सके।
संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने चिंता जताई कि इस क्षेत्र में स्थित बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं न केवल पूरी तरह तबाह होने के कगार पर हैं, बल्कि इन नदी घाटियों के किनारे बसे करोड़ों लोगों का जीवन और उनका आवास अनिश्चितकाल के लिए असुरक्षित हो गया है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कई समृद्ध पर्वतीय बस्तियां हमेशा के लिए रहने लायक नहीं रहेंगी।
भारत का त्वरित राहत अभियान और टनल रेस्क्यू टीम की जांबाजी
आपदा की खबर मिलते ही भारत ने नेपाल को हर संभव सहायता देने के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जानकारी दी कि भारत ने राहत सामग्री और विशेषज्ञ कर्मियों से भरा अपना पांचवां विशेष विमान काठमांडू रवाना किया है। इस खेप में 11 सदस्यीय विशिष्ट बचाव दल के साथ-साथ 5.5 टन अत्यंत आवश्यक जीवनरक्षक दवाएं और आधुनिक उपकरण भेजे गए हैं।
नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव के अनुसार, भारतीय दल नेपाली सेना के साथ चौबीसों घंटे समन्वय बनाकर अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम कर रहा है। काठमांडू में रविवार से तैनात 19 सदस्यीय फोरेंसिक और टनल रेस्क्यू टीम ने जलविद्युत स्थलों पर महत्वपूर्ण प्रगति की है। चिलिमे जलविद्युत परियोजना की सुरंग के भीतर गहरे मलबे और कीचड़ के बीच रास्ता बनाया गया है, जबकि लांगटांग जलविद्युत स्थल पर 185 मीटर गहराई तक तलाशी अभियान पूरा कर लिया गया है। इस दौरान बेहद संकरे रास्तों और दलदली धरातल के कारण भारी मशीनों के उपयोग में भारी बाधाएं आ रही हैं, फिर भी भारतीय बचावकर्मी जोखिम उठाकर फंसे लोगों तक पहुंचने में जुटे हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारत अब तक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से 163 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालकर स्वदेश ला चुका है।
सुरंग में हफ्ते भर से फंसे 46 कर्मचारियों के जीवित होने की आस
बाढ़ के बाद सबसे राहत भरी खबर रसुवागढ़ी जलविद्युत संयंत्र से सामने आई है, जहां सुरंग के भीतर पिछले सात दिनों से फंसे दर्जनों कर्मचारियों के सुरक्षित होने की उम्मीदें जग गई हैं। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के बोर्ड सदस्य अम्सु किरण शाही ने बताया कि भूमिगत सुरंग के एक कमरे जैसे सुरक्षित हिस्से में लगभग 46 कर्मचारी फंसे हुए हैं।
उन्होंने बताया कि सात दिन बीत जाने के बाद भी उनके जीवित मिलने की पूरी संभावना इसलिए है, क्योंकि जिस हिस्से में वे बंद हैं, वहां पर्याप्त मात्रा में पीने का पानी और खाद्य सामग्री उपलब्ध है। बचाव दल सुरंग से पानी और मलबा हटाने का काम तेजी से कर रहे हैं ताकि उन तक हवा और राहत की राह खोली जा सके।
अरबपति बिनोद चौधरी का बयान: बुनियादी ढांचे को पहुंचा अपूरणीय क्षति
नेपाल के एकमात्र अरबपति उद्योगपति और समाजसेवी बिनोद चौधरी ने इस तबाही पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की ओर से मिली तत्काल मदद की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस आपदा का पैमाना इतना विशाल है कि इसकी पूर्व कल्पना करना भी असंभव था। हालांकि पिछले वर्षों में भी क्षेत्र में बाढ़ आई थी, लेकिन इस बार का नुकसान उसकी तुलना में कहीं अधिक भयावह है।
बिनोद चौधरी ने बताया कि बाढ़ के प्रचंड वेग में पूरे के पूरे गांव, व्यस्त बाजार, स्कूल और रणनीतिक पुल बह गए हैं। देश की ऊर्जा रीढ़ को करारा झटका लगा है और 500 मेगावाट से अधिक जलविद्युत उत्पादन क्षमता पूरी तरह ठप हो गई है। उन्होंने कहा कि नेपाल के सामने पुनर्निर्माण की जो चुनौती खड़ी है, वह अत्यंत विकराल है और इसके लिए दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय सहायता की आवश्यकता होगी।
उत्तर प्रदेश की गंडक नदी में मिले 5 नेपालियों के शव, सीमा पर सुपुर्दगी
नेपाल की नदियों में आया सैलाब सीमा पार भारत के उत्तर प्रदेश तक तबाही के निशान छोड़ रहा है। कुशीनगर जिले के बरवा पट्टी और खड्डा थाना क्षेत्रों से बहने वाली गंडक नदी से उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच नेपाली नागरिकों के शव बरामद किए। इनमें दो महिलाओं और तीन पुरुषों के शव शामिल हैं, जो नेपाल से आई तेज धार में बहकर भारतीय सीमा में आ गए थे।
मंगलवार शाम लगभग 4 बजे इन शवों को भारत-नेपाल की सोनाली सीमा पर लाया गया, जहां कागजी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद नेपाल के बेलहिया थाने के प्रभारी उप-निरीक्षक हरिराम डांगी को सौंप दिया गया। पुलिस प्रशासन ने शवों को बुटवल भेज दिया है, जहां फॉरेंसिक जांच और शिनाख्त की प्रक्रिया पूरी कर उन्हें उनके रोते-बिलखते परिजनों के हवाले किया जाएगा।
बिहार सरकार का अलर्ट: बाढ़ के पानी से आई अपरिचित मछलियां न खाएं
नेपाल की सीमा से सटे बिहार के जिलों में बाढ़ के पानी के साथ एक नया स्वास्थ्य संकट खड़ा हो गया है। बिहार के डेयरी, मत्स्य पालन और पशु संसाधन विभाग ने मंगलवार को एक विशेष जनहित एडवाइजरी जारी कर नागरिकों को सख्त चेतावनी दी है। पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, बगहा और सारण जिलों में स्थानीय ग्रामीणों ने नेपाल से आ रहे जलभराव में असामान्य और अजीब दिखने वाली बड़ी मछलियां पकड़ने का दावा किया है।
विभाग ने खुलासा किया कि इन गैर-पारंपरिक मछलियों को पकाने और खाने के बाद कई लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ गए हैं। स्थानीय मछुआरों ने यह भी रिपोर्ट दी है कि बाढ़ के पानी में इंसानों और मवेशियों के सड़ते हुए शव बहते देखे गए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि दूषित पानी, खुले नालों और सड़ती सामग्री के संपर्क में रहने के कारण इन मछलियों में खतरनाक बैक्टीरिया, वायरस और फंगस का संक्रमण फैल चुका है। अतः किसी भी अनजान प्रजाति की मछली का सेवन करना जानलेवा साबित हो सकता है।
लापता विदेशी सैलानी और टेक्सास के भारतीय मूल के नागरिकों का संकट
नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, आपदा के एक सप्ताह बाद तक 324 विदेशी पर्यटकों को सुरक्षित बचा लिया गया है, लेकिन 39 देशों के 590 नागरिक अब भी लापता हैं। हालांकि, नेपाल पर्यटन बोर्ड के प्रवक्ता सुनील शर्मा ने थोड़ी राहत देते हुए बताया कि पूर्व में लापता सूची में दर्ज कम से कम पांच विदेशी नागरिकों ने फोन और ईमेल के जरिए अपनी सुरक्षा की सूचना दी है।
दूसरी ओर, अमेरिका के टेक्सास राज्य के चार भारतीय मूल के नागरिक माउंट कैलाश की धार्मिक यात्रा से लौटते समय चीन-नेपाल सीमा पर गिरोंग पोर्ट के पास से लापता हो गए हैं। इनमें उत्तरी टेक्सास के 60 वर्षीय व्यवसायी दीपक आहूजा और उनकी 57 वर्षीय पत्नी मधु आहूजा शामिल हैं। संचार नेटवर्क पूरी तरह ठप होने के कारण उनसे संपर्क टूट गया है। इस संकट को देखते हुए गैर-लाभकारी संगठन सेवा इंटरनेशनल USA ने लापता व्यक्तियों के लिए एक ऑनलाइन ट्रैकिंग पोर्टल शुरू किया है और 1,00,000 डॉलर का आपातकालीन फंड जारी किया है। संस्था ने मात्र 24 घंटे के भीतर 55,000 डॉलर से अधिक का दान भी जुटा लिया है।
चीन ने खोला गिरोंग मार्ग और भेजे फॉरेंसिक व डीएनए विशेषज्ञ
आपदा के केंद्र तिब्बत सीमा पर चीन ने एक हफ़्ते से बंद पड़ी गिरोंग क्रॉसिंग को जोड़ने वाली एकमात्र मुख्य सड़क को पूरी तरह से खोल दिया है। सड़क मार्ग बहाल होने से पहली बार तबाही वाले इलाके तक भारी मशीनरी और एक्स्ट्रावेटर पहुंच पाए हैं। इससे पहले चीनी सैनिकों को जान बचाने वाले छोटे उपकरणों और हवाई आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ रहा था।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने बताया कि चीन सरकार नेपाल को आपातकालीन बेली ब्रिज, शव गृह के लिए प्रशीतक (रेफ्रिजरेटर), संचार उपकरण और डीएनए पहचान विशेषज्ञों का विशेष दल भेज रही है। चीनी बचाव दल स्निफर डॉग्स और लाइफ-डिटेक्टर की मदद से मलबे, खड्डों और क्षतिग्रस्त इमारतों में अपने नागरिकों की खोज कर रहे हैं। हालांकि, झील फटने का तात्कालिक खतरा कम हुआ है, लेकिन ढलानों पर भूस्खलन का जोखिम अभी भी बना हुआ है।



















