अमेरिकी सेना ने पश्चिम एशिया में जारी महायुद्ध को और भी भयानक मोड़ देते हुए, लगातार 11वीं रात ईरान के अहम सैन्य ठिकानों पर विनाशकारी हवाई हमले किए हैं। इन हमलों ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया है कि अमेरिकी सैन्य अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि आने वाले दिनों में यह और भी ज़्यादा आक्रामक रूप ले सकता है। इस लंबी और विनाशकारी सैन्य कार्रवाई ने पूरे मध्य पूर्व में खलबली मचा दी है। पाकिस्तान में एक अंतरिम संघर्ष-विराम समझौते को बचाने के लिए जो कूटनीतिक कोशिशें चल रही थीं, इस युद्ध के कारण उन पर भी पूरी तरह से पानी फिर गया है। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए हैं कि यह युद्ध अब आस-पास के देशों को भी अपनी चपेट में ले सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है और पूरे क्षेत्र का कूटनीतिक भूगोल हमेशा के लिए बदल सकता है।
रणनीतिक लक्ष्य और जलडमरूमध्य की चुनौती
अमेरिकी सेंट्रल कमांड द्वारा जारी की गई विस्तृत सैन्य जानकारी के अनुसार, ताज़ा हवाई हमलों की योजना बेहद बारीकी से बनाई गई थी। इन रात्रिकालीन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान की हवाई ताकत को पूरी तरह से पंगु बनाना था। बमबारी के निशाने पर मुख्य रूप से बड़े ड्रोन भंडारण केंद्र और विमानों के वे हैंगर शामिल थे, जिनकी मदद से तेहरान अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करता है और जवाबी कार्रवाई को अंजाम देता है। हालांकि, पिछले डेढ़ हफ्ते से आसमान से बरस रहे इन अचूक बमों के बावजूद, पेंटागन को ज़मीनी स्तर पर कई बड़ी रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी नाकामी यह रही है कि अमेरिका की लगातार बमबारी होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की मज़बूत पकड़ को कमज़ोर करने में पूरी तरह से विफल रही है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि युद्ध शुरू होने से पहले, दुनिया भर के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुज़रता था। इस बेहद अहम जलमार्ग को सुरक्षित न कर पाना वॉशिंगटन की युद्ध रणनीति की सबसे बड़ी खामी साबित हो रही है। इसकी वजह से दुनिया भर के ऊर्जा बाज़ार खौफ में हैं और व्यापारिक जहाजों पर किसी भी वक्त बड़े हमले का खतरा मंडरा रहा है।
बढ़ता आर्थिक बोझ और घरेलू स्तर पर विरोध
इस तेज़ी से फैलते युद्ध का असर अब अमेरिका के भीतर भी गहराई से महसूस किया जा रहा है। वॉशिंगटन में इस युद्ध के खिलाफ राजनीतिक विरोध और जनता का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है। मंगलवार को रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें एक तरफ सांसदों के तीखे सवालों के जवाब देने पड़े, तो दूसरी तरफ युद्ध की आक्रामक नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोगों के गुस्से को भी झेलना पड़ा। इन गर्मागर्म बहसों के बीच, हेगसेथ ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि केवल ईरान के खिलाफ छेड़े गए इस युद्ध में अमेरिका अब तक 37.5 अरब डॉलर की भारी-भरकम रकम फूंक चुका है। खजाने पर पड़ा यह भारी बोझ ऐसे वक्त में सामने आया है जब रिपब्लिकन सांसद सेना के खर्चों और व्हाइट हाउस की अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 95 अरब डॉलर का एक नया पैकेज तैयार कर रहे हैं। हेगसेथ ने इतने बड़े खर्च को सही ठहराते हुए कहा कि युद्ध के लिए यह पूरक बजट वैश्विक स्तर पर अमेरिका की धाक बनाए रखने के लिए एक बहुत ही ज़रूरी और अहम निवेश है। इसके अलावा, उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 1.5 ट्रिलियन डॉलर के विशाल रक्षा बजट का भी ज़ोरदार समर्थन किया और इसे अमेरिकी सेना को आधुनिक बनाने वाला एक युगांतकारी कदम बताया।
युद्ध का दायरा और बढ़ता तनाव
मंगलवार को जब ईरान की ज़मीन पर अमेरिकी बमबारी जारी थी, उसी दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आक्रामक रुख को और भी कड़ा कर लिया। उन्होंने सरेआम चेतावनी दी कि अमेरिका किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटेगा और तेहरान के खिलाफ उसकी दंडात्मक कार्रवाई अभी खत्म नहीं हुई है। ट्रंप के इन कड़े शब्दों के साथ ही मध्य पूर्व में युद्ध का दायरा भी तेज़ी से फैल रहा है। अमेरिका के लगातार हमलों के जवाब में, ईरान ने भी अपनी आक्रामक रणनीति का विस्तार कर दिया है। तेहरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अपने समर्थित गुटों को अमेरिका के सहयोगी देशों पर हमला करने की खुली छूट दे दी है। हालात तब और बिगड़ गए जब ईरान के करीबी हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के प्रमुख बंदरगाहों की पूरी तरह से नाकेबंदी करने की गंभीर धमकी दे डाली। पिछले दो हफ्तों से चले आ रहे इस भयानक संघर्ष ने ईरान के बुनियादी ढांचे को जो भारी नुकसान पहुंचाया है, उस पर बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने दुश्मन देश के भविष्य को लेकर एक खौफनाक तस्वीर पेश की। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "अगर हम इस वक्त पीछे हट जाते हैं, तो ईरान को दोबारा सब कुछ ठीक करने में 20 से 25 साल लग जाएंगे।" उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अमेरिकी सेना अपनी कार्रवाई रोकने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
डोवर एयर बेस पर शहीदों को श्रद्धांजलि
एक तरफ जहां कूटनीतिक बयानबाज़ी और सैन्य रणनीतियां चरम पर हैं, वहीं दूसरी तरफ इस युद्ध की भयानक मानवीय कीमत आज देश के सामने होगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज डोवर एयर फोर्स बेस पहुंचेंगे, जहां युद्ध में मारे गए सैनिकों के पार्थिव अवशेषों को पूरे सम्मान के साथ उनके परिवारों को सौंपा जाएगा। पश्चिम एशिया के इस खूनी संघर्ष में जान गंवाने वाले चार अमेरिकी सैनिकों के पार्थिव शरीरों को अंतिम विदाई देने के लिए ट्रंप खुद वहां मौजूद रहेंगे। व्हाइट हाउस ने ट्रंप के इस कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि की है और इसे सर्वोच्च सेनापति के सबसे गंभीर और हृदय विदारक कर्तव्यों में से एक बताया है। गौरतलब है कि इस साल फरवरी में ईरान के खिलाफ युद्ध का आगाज़ करने के बाद से यह तीसरा मौका है जब ट्रंप को डोवर बेस की इस शोकपूर्ण यात्रा पर जाना पड़ रहा है। यह लगातार बढ़ती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इस लंबे और जानलेवा युद्ध में अमेरिका को भारी जानी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक चेतावनी
मध्य पूर्व में भड़के इस युद्ध के आर्थिक और सुरक्षा संबंधी झटके पूरी दुनिया में महसूस किए जा रहे हैं। इसे देखते हुए विदेशों में तैनात शीर्ष अमेरिकी राजनयिकों ने गंभीर चेतावनियां जारी करना शुरू कर दिया है। मनीला में आसियान देशों के विदेश मंत्रियों के साथ एक उच्च स्तरीय कूटनीतिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेते हुए, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बिगड़ते अंतरराष्ट्रीय हालात पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने दुनिया भर के देशों को आगाह किया कि अगर ईरान को होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना कब्ज़ा बनाए रखने दिया गया, तो यह दुनिया के लिए एक बेहद खतरनाक नज़ीर बन जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके विनाशकारी आर्थिक परिणाम केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे। रूबियो का यह बयान बहुत ही सोचे-समझे वक्त पर आया, ठीक उसी समय जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान पर लगातार 11वीं रात बमबारी करने की पुष्टि की थी। इस बमबारी का मुख्य उद्देश्य इस अहम समुद्री रास्ते में व्यापारिक जहाजों को डराने की तेहरान की ताकत को कुचलना था। रूबियो ने वहां मौजूद एशियाई दूतों को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर कोई देश किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर काबिज होकर जहाजों को तबाह करता है, तो यह दुनिया के लिए एक बेहद खतरनाक मिसाल होगी।" उन्होंने यह भी चेताया कि अगर आज इस मनमानी को बर्दाश्त किया गया, तो भविष्य में दुनिया के अन्य अहम समुद्री रास्तों पर भी ऐसी ही नाकेबंदी देखने को मिल सकती है।
लेबनान की अपनी ज़मीन वापस पाने की जद्दोज़हद
जहां एक तरफ अमेरिका और ईरान का महायुद्ध दुनिया भर की सुर्खियों में छाया हुआ है, वहीं दूसरी तरफ इसी अशांत क्षेत्र में लेबनान अपनी ज़मीन पर शांति बहाल करने की एक अलग ही लड़ाई लड़ रहा है। लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम अपने देश की संप्रभुता वापस पाने और सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए लगातार कूटनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं। मंगलवार को एक अहम दौरे पर निकले प्रधानमंत्री ने देश की जनता को भरोसा दिलाया कि बेरूत की सरकार उन सभी दक्षिणी इलाकों से इज़रायली सेना की पूर्ण और बिना शर्त वापसी सुनिश्चित करने के लिए दिन-रात काम कर रही है, जो अभी भी इज़रायल के कब्ज़े में हैं। अपने इस राष्ट्रव्यापी दौरे के दौरान वह ज़वतर अल-ग़रबिया भी पहुंचे। यह एक विशेष पायलट ज़ोन है जिसे हाल ही में यह साबित करने के लिए बनाया गया है कि लेबनानी राष्ट्रीय सेना सीमावर्ती इलाकों से हेज़बुल्लाह के लड़ाकों को निहत्था करने और उन्हें वहां से हटाने में पूरी तरह सक्षम है। वॉशिंगटन की मध्यस्थता से इज़रायल के साथ हुए एक जटिल कूटनीतिक समझौते में इन विशेष सुरक्षा ज़ोन को एक अहम हिस्सा माना गया है। इस समझौते का मुख्य लक्ष्य उत्तरी सीमा पर एक नया युद्ध भड़कने से रोकना है। सलाम ने वहां मौजूद लोगों से वादा करते हुए कहा, "हम दक्षिण से इज़रायल की पूरी वापसी सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर अपने प्रयास जारी रखेंगे।" चारों तरफ भड़की क्षेत्रीय आग के बीच, उनका यह बयान लेबनान की शांति के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।



















