मध्य प्रदेश में हुई एक रिसर्च ने देश की अदालतों की एक कड़वी सच्चाई सामने रख दी है, जेल में बंद हर 100 कैदियों में से 77 ऐसे हैं जिन्हें अब तक ना तो दोषी ठहराया गया है और ना ही बरी किया गया है. यानी बरसों गुजर जाने के बाद भी इन विचाराधीन कैदियों के हाथ हर बार सिर्फ अगली सुनवाई की तारीख ही लगती है.
चार साल की रिसर्च में सामने आई वजहें
यह अध्ययन सागर की डॉक्टर हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रहे वैभव सिंह यादव ने किया है. उनके रिसर्च का विषय था रिस्ट्रक्चर ट्रायल सिस्टम इन इंडियाज क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम. चार साल तक चली इस पड़ताल में वैभव इस नतीजे पर पहुंचे कि देश में न्याय देने की जो पूरी प्रक्रिया चल रही है वह काफी पुरानी पड़ चुकी है और अब उसे नए सिरे से बनाने की जरूरत है, तभी लोगों को समय पर इंसाफ मिल पाएगा. उन्होंने चार बड़ी वजहें गिनाईं, कैदियों और उनके परिवार को अपने मामले की सही जानकारी ना होना, गरीबी के चलते अपील और कागजी कार्रवाई तक ना कर पाना, भाषा की दीवार जिसकी वजह से लोग अदालत की कार्यवाही समझ ही नहीं पाते, और जजों की भारी कमी. वैभव बताते हैं कि कुछ क्रिमिनल मामलों में तो 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं आया है.
निचली अदालतों में करीब 5 करोड़ मामले अटके
नेशनल ज्यूडिशरी डाटा के हवाले से वैभव बताते हैं कि देशभर की निचली अदालतों में लगभग 5 करोड़ मामले पेंडिंग पड़े हैं, इनमें से 3.8 करोड़ मामले क्रिमिनल हैं. अकेले मध्य प्रदेश में 1 लाख 61 हजार मामले लंबित हैं, जिनमें से 1 लाख 33 हजार से ज्यादा क्रिमिनल केस हैं. वैभव इस पेंडेंसी को सीधे जेलों की ओवरक्राउडिंग से जोड़ते हैं, ट्रायल जितना लंबा खिंचता है, विचाराधीन कैदी उतनी ही देर जेल में बने रहते हैं, जिससे भीड़ बढ़ती जाती है. उनका कहना है कि इस ओवरक्राउड सिस्टम को चलाने में ही सरकार का करीब डेढ़ से दो प्रतिशत जीडीपी खर्च हो रहा है, यह वह रकम है जो मामलों को जल्दी निपटाने की बजाय सिर्फ कैदियों को बंद रखने पर लग रही है.
हर 10 लाख लोगों पर सिर्फ 15 जज
इस पूरे संकट की जड़ में जजों की कमी भी है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 10 लाख लोगों पर मात्र 15 जज हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 150 का है यानी भारत से दस गुना ज्यादा, और यूरोप में यह 220 तक पहुंच जाता है, लगभग पंद्रह गुना. वैभव साफ कहते हैं कि अगर भारत को पेंडिंग मामलों का बोझ वाकई कम करना है तो हर लाख लोगों पर कम से कम 50 जज होने चाहिए, यानी मौजूदा संख्या से तीन गुना से भी ज्यादा. अगर जजों की संख्या नहीं बढ़ाई गई तो हर साल दर्ज होने वाले नए मामले पुराने मामलों के निपटारे की रफ्तार से हमेशा आगे ही रहेंगे.
खुरई के व्यक्ति को 4 साल 7 महीने अतिरिक्त जेल में रहना पड़ा
गरीबी, अज्ञानता और भाषा की यही दिक्कतें सागर में एक असली मामले में साफ नजर आईं. खुरई के रहने वाले एक व्यक्ति को 14 साल की सजा सुनाई गई थी. बाद में हाई कोर्ट ने उसकी सजा घटाकर 7 साल कर दी, लेकिन यह जानकारी ना तो उसके परिवार तक पहुंची और ना ही जेल प्रशासन तक. नतीजा यह हुआ कि उसे 7 साल की बजाय पूरे 11 साल 7 महीने जेल में गुजारने पड़े, यानी तय सजा से 4 साल 7 महीने ज्यादा. इस चूक को सुधारने के लिए हाई कोर्ट ने आर्टिकल 21 के तहत मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि सोहन नाम के इस व्यक्ति को 25 लाख रुपए हर्जाने के तौर पर दिए जाएं, ताकि आगे किसी और के साथ ऐसी गलती दोबारा ना हो.
टेक्नोलॉजी, ज्यादा जज और क्षेत्रीय भाषा से आ सकती है रफ्तार
वैभव की रिसर्च सिर्फ समस्या गिनाकर नहीं रुकती, वे समाधान भी सुझाते हैं. उनका कहना है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल किया जाए तो मामले की स्थिति ट्रैक करने से लेकर सजा घटने जैसी जानकारी परिवार तक पहुंचाने में लगने वाली देरी को काफी हद तक खत्म किया जा सकता है. दूसरा कदम है जजों की संख्या बढ़ाना, क्योंकि सिर्फ डिजिटल सिस्टम लगा देने से अदालतों में सुनवाई करने वाले लोगों की कमी पूरी नहीं होगी. तीसरा सुझाव है भाषा की दीवार को खत्म करना, अदालती कार्यवाही और उससे जुड़ी जानकारी को क्षेत्रीय भाषा में भी उपलब्ध कराया जाए, ताकि हर आरोपी और उसका परिवार खुद अपने मामले को समझ सके, किसी और के भरोसे ना रहे. आखिर में वैभव समन, वारंट और सरकारी आदेश भेजने की प्रक्रिया में लचीलापन और तेजी लाने की बात कहते हैं, क्योंकि इस बुनियादी प्रशासनिक कदम में होने वाली देरी आगे चलकर महीनों और सालों की देरी में बदल जाती है. वैभव मानते हैं कि अगर ट्रायल तेज हों और जानकारी सही वक्त पर लोगों तक पहुंचे, तो ना सिर्फ पेंडेंसी घटेगी बल्कि लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा भी और मजबूत होगा.


















