भोपाल की एक अदालत ने अपनी सास के साथ बरसों तक अपमानजनक बर्ताव करने वाली बहू के खिलाफ सख्त फैसला सुनाते हुए 60 साल की बुजुर्ग महिला को बड़ी राहत दी है. जांच में सामने आया कि बहू अपनी सास को बार-बार जलील करती थी और उसके मुंह से यहां तक निकलता था कि यह बुढ़िया मरती क्यों नहीं. अदालत ने इसे घरेलू हिंसा मानते हुए बहू पर 20 हजार रुपये का हर्जाना ठोंका है और आगे से किसी भी तरह की प्रताड़ना न करने की सख्त हिदायत दी है. यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें सिर्फ शारीरिक मारपीट को नहीं, बल्कि लगातार मानसिक और मौखिक क्रूरता को भी घरेलू हिंसा मानकर राहत दी गई है.
बुजुर्ग सास ने कोर्ट में क्या बताया
यह मामला भोपाल के तुलसी नगर में रहने वाली 60 वर्षीय शारदा वर्मा की याचिका से जुड़ा है. शारदा वर्मा ने अदालत को बताया कि उनकी शादी के बाद से ही बहू का व्यवहार उनके और घर के बाकी सदस्यों के प्रति लगातार अपमानजनक और आक्रामक रहा है. उनके मुताबिक, उन्हें रोज-रोज गाली-गलौज, मानसिक प्रताड़ना और बेइज्जती झेलनी पड़ती थी, जिसकी वजह से उनका आम जीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया.
दो सरकारी रिपोर्टों ने खोली पोल
इस केस की सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शोभना भलावे की अदालत में हुई. फैसला सुनाने से पहले कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास विभाग की घरेलू घटना रिपोर्ट के साथ-साथ महिला थाना भोपाल की जांच रिपोर्ट को भी बारीकी से देखा. दोनों ही रिपोर्टों में यह साफ हो गया कि बहू लगातार अपनी सास के साथ दुर्व्यवहार करती रही और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती रही. अदालत ने अपने फैसले का आधार इन्हीं दो रिपोर्टों को बनाया.
कोर्ट ने कहा, मानसिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा
अपने आदेश में अदालत ने साफ किया कि घरेलू हिंसा का दायरा सिर्फ मारपीट तक सीमित नहीं है. लगातार अपमानजनक बर्ताव, मानसिक दबाव बनाना और गाली-गलौज करना भी घरेलू हिंसा में गिना जाएगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित को कानूनी संरक्षण मिलना बेहद जरूरी है, चाहे प्रताड़ना शारीरिक हो या मानसिक.
बहू को 20 हजार का जुर्माना, आगे प्रताड़ना पर पूरी रोक
अदालत ने बहू को दो टूक निर्देश दिया कि वह भविष्य में अपने ससुराल पक्ष के साथ किसी भी तरह की घरेलू हिंसा या मानसिक प्रताड़ना नहीं करेगी. साथ ही, बुजुर्ग सास को हुई मानसिक पीड़ा की भरपाई के लिए बहू को 20 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के तौर पर चुकाने का आदेश भी दिया गया.
बुजुर्गों के लिए क्यों अहम है यह फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन बुजुर्ग माता-पिता और सास-ससुर के लिए एक बड़ा संदेश है, जो परिवार के भीतर मानसिक या भावनात्मक प्रताड़ना तो झेलते हैं, लेकिन सामाजिक वजहों से शिकायत दर्ज कराने से हिचकते हैं. यह फैसला यह भी साफ करता है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत बुजुर्गों को भी उतनी ही सुरक्षा मिली हुई है, जितनी किसी और पीड़ित को. मानसिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में अब अदालतें पहले से ज्यादा सख्त रुख अपनाती दिख रही हैं.


















