मुंबई के समीप स्थित वसई रेलवे स्टेशन का एक ऐसा वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं। इस वायरल फुटेज में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति बहुत तेज गति से आ रही एक्सप्रेस ट्रेन के बिल्कुल सामने से रेलवे ट्रैक को पार करने का दुस्साहस कर रहा है। उसकी यह बेवकूफी उसे सीधे मौत के मुंह में धकेल सकती थी, लेकिन बिल्कुल आखिरी पल में वह अचानक ठिठक कर रुक गया और एक बहुत बड़े व दर्दनाक हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बच गया। यह दिल दहला देने वाली घटना महज इंटरनेट पर वायरल होने वाला कोई आम वीडियो नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की उस खतरनाक मानसिकता का जीता-जागता और भयानक सबूत है, जहां लोग अपनी घड़ी के चंद मिनट बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी को दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
फुटओवर ब्रिज की अनदेखी और जानलेवा शॉर्टकट
भारतीय रेलवे का नेटवर्क बहुत विशाल है और स्टेशनों के बीच बिछी पटरियां भारी-भरकम ट्रेनों के तेज गति से गुजरने के लिए बनाई गई हैं, न कि पैदल यात्रियों के चलने के लिए। इसके बावजूद, देश भर के तमाम छोटे-बड़े रेलवे स्टेशनों पर आज भी यह एक बेहद आम नजारा है कि लोग एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए सुरक्षित रास्तों का चुनाव करने के बजाय सीधे पटरियों के बीच से गुजरना ज्यादा आसान और सुविधाजनक समझते हैं। स्टेशनों पर यात्रियों की सुरक्षा और सहूलियत के लिए ही फुटओवर ब्रिज और सबवे का निर्माण किया जाता है, लेकिन सीढ़ियां चढ़ने के शारीरिक आलस या फिर बहुत जल्दी पहुंचने की चाहत में लोग अक्सर इनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं। पटरियां पार करते समय आमतौर पर लोगों के मन में यह खतरनाक गलतफहमी होती है कि सामने से आ रही ट्रेन अभी काफी दूर है और वे उसके पास पहुंचने से पहले ही आसानी से ट्रैक के दूसरी तरफ पहुंच जाएंगे। लेकिन रेलवे हादसों का पुराना इतिहास इस बात की गवाही देता है कि रेलवे ट्रैक पर कटकर होने वाली सबसे ज्यादा मौतें लोगों के इसी गलत अनुमान और ओवरकॉन्फिडेंस यानी अति आत्मविश्वास का सीधा नतीजा होती हैं。
भीड़भाड़ वाले स्टेशनों पर बढ़ती लापरवाही
वसई जैसे अत्यधिक व्यस्त और महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन, जहां से प्रतिदिन हजारों की संख्या में कामकाजी लोग और अन्य यात्री अपनी मंजिलों की ओर सफर करते हैं, वहां यह स्थिति और भी ज्यादा गंभीर रूप ले लेती है। ऐसी भीड़भाड़ वाली जगहों पर यात्रियों का भारी दबाव, अपनी-अपनी ट्रेनों को पकड़ने की अफरातफरी और समय की हमेशा रहने वाली कमी अक्सर लोगों को बुनियादी सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए उकसाती है। उस पल इंसान यह पूरी तरह भूल जाता है कि समय बचाने की यह अंधी और तेज दौड़ उसे हमेशा के लिए खामोश कर सकती है। यह गहराई से सोचने वाली बात है कि क्या दफ्तर पहुंचने या काम के बाद घर जाने की जल्दबाजी में बचाए गए वे कुछ मिनट इतने कीमती हो सकते हैं कि उनके बदले में कोई अपनी बहुमूल्य जान की ही बाजी लगा दे? जब भी रेलवे ट्रैक पार करते हुए कोई अप्रिय और दर्दनाक हादसा होता है, तो उसमें सिर्फ उस एक इंसान की जान नहीं जाती, बल्कि उसके पीछे छूट गया पूरा परिवार जिंदगी भर के लिए एक न खत्म होने वाले दर्द, आर्थिक संकट और गहरे सदमे में डूब जाता है।
सिर्फ जुर्माना काफी नहीं, बुनियादी ढांचे में सुधार जरूरी
इस तरह की जानलेवा घटनाओं को जड़ से रोकने के लिए स्टेशनों पर केवल चेतावनी वाले बड़े-बड़े बोर्ड लगा देना या नियम तोड़ने वाले लोगों पर आर्थिक जुर्माना बढ़ा देना ही अपने आप में काफी नहीं होगा। रेलवे प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस दिशा में कुछ और ठोस तथा व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। जिन स्टेशनों पर ट्रैक क्रॉसिंग की घटनाएं ज्यादा दर्ज की जाती हैं, वहां पटरियों के बीच और प्लेटफॉर्म के किनारों पर मजबूत बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि कोई व्यक्ति चाहकर भी उन्हें पार न कर सके। इसके अलावा, बड़े और भीड़भाड़ वाले स्टेशनों पर पर्याप्त संख्या में चौड़े फुटओवर ब्रिज और एस्केलेटर लगाए जाने चाहिए, ताकि बुजुर्गों, बीमारों और आम यात्रियों को सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी का सामना न करना पड़े और वे बिना थके सुरक्षित रास्तों का ही इस्तेमाल करें। स्टेशनों पर लगे सीसीटीवी कैमरों के नेटवर्क को भी और अधिक प्रभावी एवं सक्रिय बनाने की अत्यंत आवश्यकता है, जिससे पटरियां पार करने वालों की तुरंत पहचान की जा सके और उन पर मौके पर ही सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
स्टंट समझने की भूल और सोशल मीडिया का ट्रेंड
आजकल स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस नए दौर में एक और बेहद परेशान करने वाली प्रवृत्ति तेजी से उभरती हुई देखने को मिल रही है। इंटरनेट पर जब भी ट्रैक पार करते समय मौत को करीब से चकमा देने के इस तरह के खौफनाक वीडियो सामने आते हैं, तो कुछ युवा और नासमझ लोग इसे रोमांच या बहादुरी का काम समझ लेते हैं। पटरियों पर ट्रेन के बिल्कुल सामने से गुजरने की ऐसी घटनाओं को कई बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर स्टंट या हिम्मत के तौर पर महिमामंडित किया जाने लगता है। असलियत में देखा जाए तो यह कोई बहादुरी या साहसिक कार्य नहीं है, बल्कि यह सरासर लापरवाही और एक तरह का आत्मघाती कदम है जो दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित कर सकता है। ऐसे वीडियो को किसी भी हाल में मनोरंजन के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि इन्हें पूरे समाज के सामने एक गंभीर और कड़े चेतावनी संदेश के रूप में पेश किया जाना चाहिए ताकि लोग इनसे सबक लें और ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकत दोहराने से बचें।
जागरूकता और सुरक्षित सफर के लिए मानसिकता में बदलाव
भारतीय रेलवे रोजाना करोड़ों यात्रियों को उनके गंतव्य तक सुरक्षित रूप से पहुंचाने का एक बहुत बड़ा, महत्वपूर्ण और जटिल काम करता है। परिवहन की इस पूरी व्यवस्था को तभी पूरी तरह से सुरक्षित और हादसे-मुक्त बनाया जा सकता है जब हर एक यात्री भी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी को समझे और रेलवे के सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करे। इस दिशा में स्कूलों, कॉलेजों और अन्य सार्वजनिक मंचों के माध्यम से सुरक्षा अभियानों को तेज करने और लोगों को जागरूक करने की सख्त जरूरत है। अगर आम लोगों को लगातार यह समझाया जाए कि रेलवे ट्रैक कोई छोटा या आसान रास्ता नहीं बल्कि सीधे तौर पर मौत का बुलावा है, तो हर साल रेलवे ट्रैक पर कटकर होने वाली हजारों अनमोल मौतों को रोका जा सकता है। आखिर में हर किसी को यह अमूल्य मूल मंत्र अपनी दैनिक आदत में शुमार कर लेना चाहिए कि किसी जगह पर कुछ मिनट की देरी से पहुंचना इस बात से हमेशा और हर हाल में बेहतर होता है कि इंसान कोई शॉर्टकट लेकर अपनी जान गंवा बैठे और कभी अपनी मंजिल तक पहुंच ही न पाए।




















