महाराष्ट्र विधान परिषद के नागपुर संभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को लगातार दूसरी बार पराजय झेलनी पड़ी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के साथ-साथ यह इलाका प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। इस प्रतिष्ठित क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 6 जिलों में विधानसभा और विधान परिषद को मिलाकर महायुति गठबंधन के कुल 31 विधायक मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त राज्य के मुख्यमंत्री, वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री और कई राज्य मंत्रियों की प्रभावशाली मौजूदगी के बावजूद पार्टी इस चुनाव में अपनी पारंपरिक सीट को वापस हासिल करने में नाकाम रही। इस अप्रत्याशित नतीजे के बाद संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया है और प्रदेश पदाधिकारियों से जवाब तलब किया है। पार्टी के भीतर यह सवाल पुरजोर तरीके से उठाया जा रहा है कि जब 31 स्थानीय विधायक मौजूद थे, तो वे कब तक केवल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के कंधों पर प्रचार का जिम्मा डालते रहेंगे। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने जमीनी स्तर पर जीत सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त पसीना क्यों नहीं बहाया, इसकी अब गहन समीक्षा की जा रही है।
नागपुर स्नातक सीट पर मिली हार क्यों बनी बड़ा राजनीतिक झटका
संसदीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में अक्सर यह बात कही जाती रही है कि कांग्रेस को कोई बाहरी शक्ति नहीं बल्कि खुद उसकी अपनी अंतर्कलह ही हराती है। नागपुर स्नातक सीट के ताजा नतीजों ने इस पुरानी धारणा को भारतीय जनता पार्टी के ऊपर भी लागू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषक और पार्टी कार्यकर्ता अब यह चर्चा करने लगे हैं कि भाजपा अपनी ही गुटबाजी और अंदरूनी खींचतान के कारण चुनाव हारने लगी है। नागपुर के इस चुनाव में जिस तरह की खुली बगावत, असंतोष और खेमेबाजी सतह पर आई, उसने संगठन के पारंपरिक अनुशासन की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है।
नागपुर केवल एक सामान्य निर्वाचन क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केंद्र स्थल है। इसके साथ ही यह प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृहक्षेत्र और मजबूत राजनीतिक किला रहा है। जब पार्टी ने आधिकारिक रूप से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा की थी, उसी समय से स्थानीय संगठन कई गुटों में बंटता नजर आया। कुछ नेता बंद कमरों में अपनी नाराजगी जता रहे थे, तो कई पदाधिकारी और पूर्व जनप्रतिनिधि खुले तौर पर विरोध की मुद्रा में आ गए थे। भारतीय जनता पार्टी जिस व्यवस्थित माइक्रो प्लानिंग और डेटा आधारित प्रबंधन के लिए जानी जाती है, उसके बूते यह मजबूत दावा किया जा रहा था कि 2020 में गंवाई गई इस सीट को दोबारा अपनी झोली में डाल लिया जाएगा। हालांकि, मतगणना के दिन यह सारा दावा पूरी तरह धराशायी हो गया।
टिकट बंटवारे से उपजा असंतोष और अंदरूनी बगावत
इस चुनाव में हार की नींव दरअसल काफी पहले ही रख दी गई थी, जब मतदाता पंजीकरण अभियान संचालित हो रहा था। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव से लगभग डेढ़ साल पहले ही सुधाकर कोहले को स्नातक मतदाता पंजीकरण अभियान का प्रमुख नियुक्त किया था। उसी समय उन्हें पार्टी की तरफ से यह अनौपचारिक संकेत भी दे दिया गया था कि आगामी विधान परिषद चुनाव में वे ही अधिकृत उम्मीदवार होंगे। इस फैसले से अन्य दावेदारों में सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। जैसे ही चुनाव की औपचारिक तारीखें नजदीक आईं, टिकट की दौड़ में पूर्व विधायक अनिल सोले, सुधीर दिवे और गिरीश देशमुख जैसे प्रमुख नेता पूरी ताकत के साथ सक्रिय हो गए। उम्मीदवार के चयन को लेकर संगठन के भीतर असंतोष तेजी से भड़क उठा।
नामांकन प्रक्रिया के अंतिम दिनों में पार्टी के भीतर अभूतपूर्व बगावत देखने को मिली। असंतोष इतना गहरा था कि डैमेज कंट्रोल के लिए खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप करना पड़ा। वरिष्ठ नेताओं को नाराज खेमों को शांत करने और उन्हें एक मंच पर लाने के लिए अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ी। जमीनी स्तर पर पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं में यह भावना घर कर गई थी कि नए दौर में उनकी निष्ठा की उपेक्षा की जा रही है। उम्मीदवार सुधाकर कोहले के चयन को कार्यकर्ताओं के एक बड़े वर्ग ने राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की व्यक्तिगत जिद के रूप में देखा। इस फैसले से आहत कई अनुभवी कार्यकर्ताओं ने खुद को चुनावी गतिविधियों से पूरी तरह अलग कर लिया और घरों में बैठना पसंद किया।
सामाजिक समीकरणों में बदलाव और कोर वोटरों की नाराजगी
नागपुर स्नातक सीट के इतिहास पर नजर डालें तो जनसंघ के जमाने से लेकर भारतीय जनता पार्टी के दौर तक यहां निरंतर ब्राह्मण वर्ग के उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा जाता रहा था। जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बछराज व्यास, मुख्यमंत्री के पिता गंगाधर राव फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व विधायक अनिल सोले और पूर्व विधायक संदीप जोशी इसी सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए इस सीट से चुनकर आते रहे थे। छह दशकों तक यह सीट भाजपा और उसके विचार परिवार के लिए सबसे सुरक्षित गढ़ मानी जाती रही।
साल 2020 के पिछले चुनाव में कांग्रेस ने रणनीतिक रूप से इस स्थापित ढर्रे को तोड़ते हुए ब्राह्मण बनाम अन्य पिछड़ा वर्ग का नैरेटिव गढ़ा था। कांग्रेस ने इसी समीकरण के सहारे 58 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भाजपा के इस अजेय दुर्ग को ध्वस्त कर दिया था। इस बार भाजपा ने सामाजिक संतुलन साधने की कवायद में कुनबी समाज से आने वाले सुधाकर कोहले पर दांव लगाया। पार्टी नेतृत्व को लगा था कि कुनबी प्रत्याशी उतारने से बहुजन समाज का वोट बैंक उसके साथ आ जाएगा। लेकिन इस प्रयोग ने भाजपा के सबसे निष्ठावान पारंपरिक ब्राह्मण मतदाता वर्ग को खासा नाराज कर दिया। कोर वोटर ने महसूस किया कि दशकों पुरानी निष्ठा के बावजूद उनके सामाजिक प्रतिनिधित्व को किनारे कर दिया गया, जिससे चुनावी हवा भाजपा के खिलाफ मुड़ गई।
वरीयता मतों की रणनीति और अति आत्मविश्वास का नुकसान
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के तहत वरीयता क्रम पर आधारित होते हैं। इस जटिल चुनाव प्रणाली में द्वितीय वरीयता के मत अक्सर निर्णायक साबित होते हैं। भारतीय जनता पार्टी की पूरी चुनाव मशीनरी अति आत्मविश्वास की शिकार हो गई। पार्टी के रणनीतिकारों ने माइक्रो प्लानिंग के तहत केवल पहली वरीयता यानी प्रेफरेंस 1 के मतों पर ही पूरा जोर लगाया। प्रचार तंत्र ने मतदाताओं के बीच यह संदेश फैलाया कि भाजपा प्रत्याशी पहले राउंड की गिनती में ही जीत का आवश्यक कोटा हासिल कर लेगा।
इस अति आत्मविश्वास का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि भाजपा ने अन्य निर्दलीय अथवा छोटे दलों के उम्मीदवारों से संपर्क साधने और उनकी द्वितीय वरीयता के वोट अपने पक्ष में सुरक्षित करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत, कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने बेहद चतुर चुनावी प्रबंधन का परिचय दिया। वे उन स्नातक मतदाताओं के पास भी पहुंचे जिनकी पहली पसंद कांग्रेस पार्टी नहीं थी। कांग्रेस प्रत्याशी ने मतदाताओं को यह समझाने में सफलता हासिल की कि यदि वे किसी अन्य को अपना पहला वोट दे रहे हैं, तो दूसरा वोट कांग्रेस के पक्ष में अवश्य दर्ज करें।
इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे नितेश कराले ने मुकाबले को पूरी तरह त्रिकोणीय बना दिया। नितेश कराले को चुनाव में 26066 से अधिक मत प्राप्त हुए। कांग्रेस की चाक चौबंद योजना का सबसे बड़ा फायदा तब दिखा जब नितेश कराले के कुल द्वितीय वरीयता मतों में से लगभग 80 प्रतिशत वोट सीधे कांग्रेस के खाते में स्थानांतरित हो गए। इस भारी भरकम ट्रांसफर ने मुकाबले में पहले और दूसरे स्थान के बीच के सभी अंतर को पाट दिया और भाजपा के हाथ से जीत छीन ली। भाजपा ने बहुजन समाज और स्वतंत्र उम्मीदवारों के साथ संवाद की खिड़की बंद रखी, जबकि कांग्रेस ने इन समीकरणों को साधकर बाजी पलट दी।
9 हजार अमान्य मतपत्र और मतदान प्रक्रिया की गंभीर गड़बड़ी
मतगणना के दौरान जो आंकड़े सामने आए, वे राजनीतिक पंडितों और खुद भाजपा के लिए बेहद स्तब्ध करने वाले थे। इस चुनाव में कुल 15032 मत अवैध घोषित किए गए। स्नातक मतदाताओं के इस चुनाव में इतनी भारी तादाद में मतों का खारिज होना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन अवैध मतों में से लगभग 9000 मतपत्र ऐसे थे, जिन पर भाजपा उम्मीदवार के नाम के आगे 1 लिखने के बजाय सीधे 2 लिखा हुआ पाया गया था।
पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहरा संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि यह केवल मतदाताओं की अनजाने में हुई चूक थी या फिर किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। आम तौर पर किसी चुनाव में 10, 20 या 100 मतों में ऐसी मानवीय भूल समझी जा सकती है, लेकिन 9000 मतपत्रों पर एक समान पैटर्न दिखना गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करता है। शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी के अनुसार, मतपत्र पर भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले का नाम क्रम संख्या 2 पर छपा हुआ था। मतदान केंद्रों पर तैनात कई चुनाव कर्मियों को भी इस विशेष मतदान प्रणाली की तकनीकी बारीकियों की पूरी जानकारी नहीं थी। जब मतदाताओं ने मतदान केंद्र के भीतर पूछा कि पसंदीदा उम्मीदवार को वोट कैसे दें, तो कुछ अधिकारियों ने कह दिया कि जिस उम्मीदवार को वोट देना है, उसकी क्रम संख्या उसके नाम के आगे लिख दीजिए। इस भ्रामक सलाह के चलते हजारों कार्यकर्ताओं और मतदाताओं ने कोहले के नाम के आगे 2 लिख दिया, जिससे वे सभी मत तकनीकी आधार पर अमान्य घोषित हो गए। पार्टी स्वीकार कर रही है कि यदि उन 9000 मतों पर सही ढंग से 1 लिखा गया होता, तो चुनाव परिणाम पूरी तरह भाजपा के पक्ष में होता।
कांग्रेस की एकजुटता और मित्र परिवार का प्रभाव
नागपुर संभाग में कांग्रेस पार्टी भी ऐतिहासिक रूप से गुटबाजी और नेताओं के आपसी मनमुटाव के लिए जानी जाती रही है। लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस का व्यवहार पूरी तरह बदला हुआ नजर आया। पार्टी के सभी प्रादेशिक और स्थानीय क्षत्रपों ने अपनी पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर एकजुट होकर काम किया। अभिजीत वंजारी की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए विधायक विकास ठाकरे, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक नाना पटोले, विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे विजय वडेट्टीवार और पूर्व मंत्री विधायक नितिन राउत ने व्यक्तिगत रूप से कमान संभाली। सभी बड़े नेताओं ने अपने-अपने प्रभाव वाले इलाकों में सघन जनसंपर्क किया और पार्टी मशीनरी को सक्रिय रखा।
इसके अलावा अभिजीत वंजारी का नागपुर और विदर्भ के शैक्षणिक जगत में काफी व्यापक नेटवर्क है। वे कई प्रमुख शिक्षण संस्थाओं का संचालन करते हैं। इन शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े प्राध्यापकों, कर्मचारियों और पुराने छात्रों का एक विस्तृत मित्र परिवार पूरे संभाग में फैला हुआ है। इस मित्र परिवार में केवल कांग्रेसी ही नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रभावी और वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं। चुनाव के दौरान इस गैर राजनीतिक सामाजिक और शैक्षणिक तंत्र ने वंजारी के पक्ष में पर्दे के पीछे रहकर जबर्दस्त काम किया, जिससे उन्हें दलगत सीमाओं से परे जाकर हजारों वोट मिले।
संगठन के पदाधिकारियों ने स्वीकार की रणनीतिक चूक
चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी नेतृत्व ने इस हार के विभिन्न पहलुओं पर खुलकर बात की है। भारतीय जनता पार्टी के शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी ने संगठन की कमियों को स्वीकार करते हुए बताया कि योजना के अनुसार पार्टी ने इस चुनाव में 75 हजार वोट हासिल करने का पुख्ता लक्ष्य तय किया था, लेकिन वास्तविक गिनती में केवल 67 हजार मत ही प्राप्त हो सके। उन्होंने माना कि पार्टी के कार्यकर्ता मतदाताओं को मतदान केंद्र के बाहर सही तरीके से यह समझाने में विफल रहे कि वरीयता मत कैसे अंकित करना है।
दयाशंकर तिवारी ने कहा कि द्वितीय वरीयता के मतों की अनदेखी करना पार्टी की एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी माहौल में अन्य सभी प्रत्याशी भाजपा के विरोध में एकजुट होकर प्रचार कर रहे थे, जिसके कारण पार्टी ने यह मान लिया कि किसी अन्य प्रत्याशी के समर्थक भाजपा को अपनी दूसरी पसंद नहीं बनाएंगे। उन्होंने कहा कि आज ऐसा प्रतीत होता है कि यदि भाजपा ने दूसरी पसंद के वोटों को लक्षित किया होता, तो 3000 अतिरिक्त मत जुटाना कोई असंभव कार्य नहीं था। उन्होंने माना कि पार्टी के समग्र नियोजन में गंभीर चूक हुई और मतदाताओं को मतदान कक्ष में जाने से पूर्व तकनीकी प्रशिक्षण न देना भारी पड़ गया।
पारंपरिक मतदाताओं के छूटने का तकनीकी कारण
नागपुर पश्चिम के पूर्व विधायक और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के लंबे समय तक चुनाव प्रमुख रहे वरिष्ठ नेता सुधाकर देशमुख ने हार के एक अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू को उजागर किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 के बाद से विधान परिषद के स्नातक चुनावों के लिए निर्वाचन आयोग के नियमों के तहत हर बार बिल्कुल नई मतदाता सूची तैयार की जाती है। इस नियम के कारण पुराने मतदाता स्वतः सूची में शामिल नहीं रहते।
सुधाकर देशमुख के अनुसार, भाजपा का एक बहुत बड़ा पारंपरिक और कोर वोटर वर्ग वह है जिसने 40 या 45 वर्ष पूर्व स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। इन मतदाताओं को यह गलतफहमी थी कि उनका नाम मतदाता सूची में पहले से दर्ज होगा, जैसा कि सामान्य विधानसभा या लोकसभा चुनावों में होता है। जब पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनसे दोबारा पंजीकरण फॉर्म भरने और चार दशक पुरानी डिग्री के प्रमाण पत्र जमा करने को कहा, तो कई बुजुर्ग और वरिष्ठ स्नातकों के पास वे दस्तावेज तत्काल उपलब्ध नहीं थे या उन्होंने औपचारिकता पूरी करने में रुचि नहीं दिखाई। इस प्रशासनिक प्रक्रिया के चलते भाजपा का हजारों की संख्या में प्रतिबद्ध कैडर मतदाता सूची में अपना नाम ही दर्ज नहीं करा सका, जिसका सीधा खामियाजा पार्टी को मतदान के दिन भुगतना पड़ा।



















