महाराष्ट्र के पुणे में वर्ष 2009 के दौरान शिवसेना नेता अजय भोसले की जान लेने की कोशिश के चर्चित मामले में एक विशेष सीबीआई अदालत ने फैसला सुनाया है। अदालत ने गैंगस्टर छोटा राजन और चार अन्य सह आरोपियों को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। जिन धाराओं से इन सभी को राहत मिली है, उनमें हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश रचने और आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज गंभीर अपराध शामिल हैं। इस निर्णय से 15 साल से अधिक पुराने मामले में आरोपियों को कानूनी राहत मिली है।
अदालत से राहत पाने वाले अन्य चार लोगों में पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी सुरेंद्रकुमार अग्रवाल, विजय तांबट, मोहम्मद खान और राजेश यादव के नाम शामिल हैं। विशेष अदालत का विस्तृत फैसला अभी औपचारिक रूप से जारी नहीं हुआ है, जिसमें बरी किए जाने के कानूनी और साक्ष्य संबंधी आधार स्पष्ट होंगे।
तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुआ राजन
सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए 70 वर्षीय छोटा राजन ने राष्ट्रीय राजधानी की तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में भाग लिया। राजन वर्तमान में इसी जेल परिसर में बंद है। यद्यपि भोसले पर हमले से जुड़े इस विशिष्ट मुकदमे में उसे पिछले साल ही जमानत मिल चुकी थी, फिर भी उसकी जेल से रिहाई नहीं होगी। वह वर्ष 2011 में मुंबई में हुई वरिष्ठ पत्रकार जे डे की हत्या के मामले में अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा काट रहा है।
11 अक्टूबर 2009 को हुई थी फायरिंग की वारदात
यह पूरा विवाद 11 अक्टूबर 2009 का है, जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के प्रचार दौर के दौरान पुणे में अजय भोसले के वाहन को निशाना बनाकर गोलियां चलाई गई थीं। उस हमले में भोसले बाल-बाल बच गए थे और उन्हें कोई शारीरिक चोट नहीं आई थी, परंतु वाहन चला रहा उनका ड्राइवर गोली लगने से घायल हो गया था।
सरकारी पक्ष के अनुसार, इस खूनी हमले की जड़ें पुणे स्थित सुरेंद्रकुमार अग्रवाल, आर के अग्रवाल और वी के अग्रवाल नामक पक्षकारों के बीच चल रहे एक गहरे संपत्ति विवाद में उलझी हुई थीं। जांच एजेंसियों का दावा था कि पारिवारिक व कारोबारी संपत्ति में अपना हिस्सा हासिल करने तथा विवाद को अपने पक्ष में सुलझाने के इरादे से सुरेंद्रकुमार अग्रवाल ने विजय तांबट से संपर्क साधा था। तांबट के बारे में अभियोजन का आरोप था कि उसके संबंध छोटा राजन के आपराधिक गिरोह से जुड़े थे।
धमकियों और 50 से अधिक फोन कॉल्स का दावा
मुकदमे के दौरान सरकारी वकील ने आरोप लगाया था कि संपत्ति के निपटारे को लेकर राजन ने आर के अग्रवाल को टेलीफोन पर सीधी धमकियां दी थीं। इसके अलावा अभियोजन का यह भी दावा था कि मार्च 2009 से मई 2009 की अवधि के दौरान अजय भोसले को राजन की ओर से 50 से ज्यादा फोन कॉल्स आए थे।
अभियोजन की थ्योरी के मुताबिक, राजन को यह संदेह था कि भोसले पक्षों के बीच होने वाले समझौते में बाधा बन रहे हैं, जिसके चलते उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश रची गई। गोलीबारी की वारदात से पूर्व, 1 मई 2009 को पुणे के रेजीडेंसी क्लब में राजन के कथित सहयोगियों ने आर के अग्रवाल का घेराव किया था और संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए उन पर भारी दबाव बनाया था।
स्थानीय पुलिस से सीआईडी और फिर सीबीआई तक जांच का सफर
हमले के फौरन बाद यह आपराधिक मामला सबसे पहले पुणे के बंड गार्डन पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने बाद में इसकी जांच महाराष्ट्र सीआईडी को सौंप दी थी। वर्ष 2015 में जब इंडोनेशिया के बाली से छोटा राजन का भारत प्रत्यर्पण हुआ, तब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने राजन पर दर्ज 70 अन्य मुकदमों के साथ इस केस की फाइल भी अपने हाथ में ले ली थी।
अदालती सुनवाई के दौरान सरकारी अभियोजक ने राजन को एक संगठित अपराध गिरोह के सरगना के तौर पर पेश किया और उसके लंबे आपराधिक रिकॉर्ड का ब्योरा सामने रखा। दूसरी ओर, बचाव पक्ष के वकीलों ने जोरदार दलील दी कि अभियोजन पक्ष भोसले पर हमले की साजिश या इसमें राजन की वास्तविक संलिप्तता का कोई भी पुख्ता और ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। सबूतों के अभाव के चलते अदालत ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।
























