राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की निरंतरता पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब तक समाज में विषमता और भेदभाव मौजूद रहेगा, तब तक आरक्षण का प्रावधान कायम रहना चाहिए। मुंबई स्थित नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित आई.आई.एम.यू.एन. (I.I.M.U.N.) कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक व्यवस्था पर अपने विचार विस्तार से साझा किए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आरक्षण का मूल उद्देश्य भारतीय समाज में एकता और समरसता स्थापित करना है।
अंबेडकर के विचारों को अपनाने की सलाह
संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आरक्षण के पूरे सिद्धांत और उसके स्वरूप को सही संदर्भ में समझने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर के दृष्टिकोण का निष्पक्ष अध्ययन करना अनिवार्य है। बाबासाहेब ने जिस सामाजिक ताने-बाने की कल्पना की थी, उसमें आरक्षण का उद्देश्य समाज के पिछड़े और शोषित तबकों को मुख्यधारा में लाना था। डॉ. भागवत के अनुसार, आरक्षण कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे बिना किसी वजह के जारी रखा गया हो, बल्कि यह सामाजिक भेदभाव से उत्पन्न विषमताओं को दूर करने का एक संवैधानिक साधन है। उन्होंने कहा, "जब तक सामाजिक भेदभाव है तब तक आरक्षण चलेगा।" इसलिए जब तक यह सामाजिक अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण की उपयोगिता बनी रहेगी।
सबल वर्गों से अवसरों के त्याग का आह्वान
अपने संबोधन के दौरान डॉ. मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू पर रोशनी डालते हुए कहा कि जिन परिवारों या वर्गों ने आरक्षण की मदद से सामाजिक और आर्थिक स्तर पर तरक्की हासिल कर ली है, उन्हें अब बड़ा दिल दिखाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे सक्षम लोगों को आगे बढ़कर समाज के उन सदस्यों के लिए रास्ते बनाने चाहिए जो अब भी मूलभूत सुविधाओं और अवसरों से वंचित हैं। संघ प्रमुख ने उल्लेख किया कि स्वयं आरक्षित वर्गों के भीतर से भी ऐसी आवाजें बुलंद हो रही हैं कि लाभान्वित लोगों को पीछे हटकर अधिक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी वैचारिक मंथन के कारण कई राज्यों में उप-वर्गीकरण की मांग उठी है, जिस पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणियां दी हैं।
आरक्षण पर संघ का रुख और भावी निर्णय
यह पहली बार नहीं है जब आरएसएस प्रमुख ने आरक्षण के पक्ष में अपनी राय जाहिर की है। इससे पहले भी विभिन्न मंचों से संघ का स्टैंड साफ करते हुए उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण व्यवस्था का हमेशा पूर्ण समर्थन करता रहा है। उनके मुताबिक समस्या आरक्षण की नीति में नहीं है, बल्कि आरक्षण के नाम पर की जाने वाली राजनीति में है। समाज से कलंक मिटाने के लिए बनाई गई इस व्यवस्था की समयसीमा तय करने का अधिकार भी उन्हीं लोगों के पास होना चाहिए जिनके लिए इसे लागू किया गया है। जब लाभान्वित समुदाय खुद महसूस करेगा कि अब उन्हें इस सहारा प्रणाली की आवश्यकता नहीं है, तब वे स्वयं इसे समाप्त करने का निर्णय ले सकते हैं।


















