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महाराष्ट्र के 19 जिलों में मंडराया सूखे का संकट: 83 तालुकों में 20 दिन से थमी बारिश, खरीफ फसलों को भारी नुकसानमहाराष्ट्र
16 सित॰ 2026, 5:03 pm (32 मिनट पहले)· 0

महाराष्ट्र के 19 जिलों में मंडराया सूखे का संकट: 83 तालुकों में 20 दिन से थमी बारिश, खरीफ फसलों को भारी नुकसान

महाराष्ट्र में मॉनसून सीजन के दौरान लंबे शुष्क दौर के कारण 19 जिलों के 83 तालुकों में सूखे जैसे हालात बन गए हैं। 5 अक्टूबर के बाद नुकसान का सर्वे कराने की योजना के बीच सरकार ने प्रशासन को पानी के संरक्षण और राहत तैयारियों के निर्देश दिए हैं।

मॉनसून के अंतिम दौर में प्रवेश करते ही महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों पर सूखे का गंभीर संकट मंडराने लगा है। राज्य के 19 जिलों में आने वाले 83 तालुकों में पिछले 20 दिनों से भी अधिक समय से बारिश की एक बूंद नहीं गिरी है। बारिश के इस लंबे इंतजार ने खेतों में खड़ी खरीफ फसलों की हालत बेहद चिंताजनक बना दी है। कई इलाकों में फसलें पूरी तरह सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं, जिससे कृषि विशेषज्ञों ने आने वाले दिनों में अनाज उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका जताई है।

कैबिनेट में जताई गई चिंता और केंद्रीय नियमों की बाध्यता

राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अन्य मंत्रियों ने इस गंभीर स्थिति की समीक्षा की। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरे प्रशासनिक तंत्र को हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश जारी किए गए हैं। हालांकि, कैबिनेट बैठक के तुरंत बाद किसी राहत पैकेज की औपचारिक घोषणा नहीं की गई।

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सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) के दिशा-निर्देशों और केंद्रीय सूखा प्रबंधन नियमों के अनुसार फसलों के नुकसान का आधिकारिक पंचनामा 5 अक्टूबर के बाद ही संभव है। समय से पहले सर्वे कराने पर प्रभावित किसानों को केंद्रीय सहायता राशि मिलने में कानूनी और प्रक्रियात्मक बाधाएं आ सकती हैं। यदि निर्धारित तिथि से पहले आकलन किया जाता है तो किसानों के आधिकारिक मुआवजा पात्रता से वंचित रहने का जोखिम रहता है। कृषि विभाग के प्रस्तुतीकरण के आधार पर सरकार फिलहाल संभावित राहत उपायों की एक व्यापक कार्ययोजना तैयार कर रही है।

पेयजल को प्राथमिकता और राहत की अग्रिम तैयारियां

राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सभी जिला कलेक्टरों और मैदानी अधिकारियों को स्थिति पर पैनी नजर रखने का आदेश दिया है। शहरी तथा ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जल संकट को रोकने के लिए मौजूदा जलाशयों और बांधों के पानी को सख्त हिदायत के साथ मुख्य रूप से पीने के उपयोग के लिए सुरक्षित रखने को कहा गया है।

औपचारिक पंचनामा प्रक्रिया शुरू होने से पहले सरकार आपातकालीन राहत सूचियां तैयार कर रही है। इसमें मवेशियों के लिए चारे की उपलब्धता का आकलन करना और कृषि विभाग के माध्यम से बची हुई खरीफ फसलों को बचाने के लिए किसानों को रक्षात्मक सिंचाई की सलाह देना शामिल है।

विभिन्न जिलों में फसलों की स्थिति और नुकसान का ब्योरा

राज्य कृषि विभाग की क्षेत्र-वार रिपोर्ट के अनुसार मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के क्षेत्र सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। फसल क्षति के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बीड जिले में कुल बोए गए क्षेत्र का 37.21 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह खराब हो चुका है। वहीं जालना जिले में 27.83 प्रतिशत और छत्रपति संभाजीनगर में 7.06 प्रतिशत कृषि क्षेत्र प्रभावित हुआ है।

लातूर, धाराशिव और परभणी जिलों में हल्की मिट्टी वाली जमीनों पर बोई गई सोयाबीन, मूंग, उड़द और कपास की फसलें पानी के अभाव में मुरझा रही हैं। इसके अलावा सोयाबीन की फसल पर 'येलो मोजेक वायरस' का भारी प्रकोप देखा जा रहा है।

पश्चिमी महाराष्ट्र के बारिश पर निर्भर इलाकों जैसे सोलापुर, सतारा, सांगली और अहिल्यानगर में लंबे शुष्क दौर के कारण मूंग, उड़द, सोयाबीन, मक्का और बाजरा की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका जताई गई है।

विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र का हाल

विदर्भ क्षेत्र के अमरावती, अकोला, बुलढाणा और वाशिम जिलों के कई तालुकों में लगातार 2 से 3 हफ्तों से बारिश नहीं हुई है। सिंचाई सुविधाओं से वंचित किसानों की हल्की जमीन पर लगी सोयाबीन की फसलें सूख चुकी हैं। नागपुर, चंद्रपुर और गढ़चिरौली में कम बारिश की वजह से धान की रोपाई की प्रक्रिया में काफी देरी हुई है।

उत्तरी महाराष्ट्र के नंदुरबार और नासिक जिलों में वर्षा की कमी से मक्का और कपास का विकास थम गया है। आंकड़ों के अनुसार नंदुरबार जिले में सामान्य वर्षा का केवल 46.6 प्रतिशत हिस्सा ही दर्ज किया गया है। हालांकि, धुले और जलगांव के कुछ हिस्सों में हुई हालिया बारिश से फसलों को आंशिक राहत मिली है। कुल मिलाकर सोलापुर, कोल्हापुर, बीड, लातूर, धाराशिव, परभणी, हिंगोली, अकोला, वाशिम, अमरावती, वर्धा, नागपुर और चंद्रपुर भारी वर्षा कमी का सामना कर रहे हैं।

विपक्ष की त्वरित सूखा घोषित करने की मांग

सूखे के बिगड़ते हालात को देखते हुए विपक्षी दलों ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार, सोलापुर की सांसद प्रणति शिंदे और शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने मांग की है कि 19 जिलों और 83 से ज्यादा तहसीलों में औपचारिक समय-सीमा का इंतजार किए बिना तुरंत सूखा घोषित किया जाए। विपक्ष ने प्रभावित किसानों के लिए तत्काल आपातकालीन राहत पैकेज, फसल ऋण माफी, चारा छावनियों की स्थापना और टैंकरों के जरिए पेयजल आपूर्ति शुरू करने की मांग उठाई है।

सवाल-जवाब

महाराष्ट्र के कितने जिलों और तालुकों में सूखे जैसे हालात हैं?
महाराष्ट्र के 19 जिलों के 83 तालुकों में लगातार 20 दिनों से अधिक समय से बारिश नहीं हुई है, जिससे सूखे के हालात पैदा हो गए हैं।
सरकार तुरंत औपचारिक सूखा घोषित क्यों नहीं कर रही है?
एनडीआरएफ और केंद्रीय सूखा प्रबंधन नियमों के अनुसार फसलों के नुकसान का आधिकारिक पंचनामा 5 अक्टूबर के बाद किया जाता है, ताकि किसानों को केंद्रीय राहत पैकेज का पूरा लाभ मिल सके।
किन फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है?
सोयाबीन, मूंग, उड़द, मक्का, बाजरा और कपास की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा सोयाबीन में 'येलो मोजेक वायरस' का प्रकोप भी देखा गया है।
बीड और जालना जिलों में कितना फसल नुकसान हुआ है?
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बीड में बोए गए क्षेत्र का 37.21 प्रतिशत और जालना में 27.83 प्रतिशत हिस्सा खराब हो चुका है।
विपक्ष सरकार से क्या मांग कर रहा है?
विपक्ष तुरंत सूखा घोषित करने, आपातकालीन राहत पैकेज देने, फसल ऋण माफ करने, चारा छावनियां खोलने और पानी के टैंकर चलाने की मांग कर रहा है।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·15 मिनट पहले

प्रशासनिक दृष्टिकोण से, यह रिपोर्ट आपदा प्रबंधन के एक बड़े नीतिगत पेंच को उजागर करती है। एनडीआरएफ नियमों के तहत 5 अक्टूबर तक आधिकारिक पंचनामा न हो पाने के कारण किसानों को तत्काल वित्तीय मदद मिलने में देरी होना स्वाभाविक है। ऐसे में राहत पैकेज का इंतजार करने के बजाय, राज्य सरकार को पीने के पानी के भंडारण, मवेशियों के चारे और सुरक्षात्मक सिंचाई जैसी आपातकालीन व्यवस्थाओं को जमीनी स्तर पर बिना किसी लालफीताशाही के तुरंत लागू करना होगा, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाया जा सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 मिनट पहले

रोहन की बात सही है। कानूनी और नीतिगत बाधाओं के कारण मुआवजा मिलने में देरी से ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक दबाव बेहद बढ़ जाता है। कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के नजरिए से देखें तो जल स्रोतों के बंटवारे को लेकर स्थानीय स्तर पर विवाद और तनाव की आशंका बढ़ जाती है। आपदा प्रबंधन कानून के तहत राज्य प्रशासन को केवल वित्तीय पंचनामे का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि जल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अग्रिम विधिक व्यवस्थाएं लागू करनी चाहिए, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति या कानूनी जटिलताओं से बचा जा सके।

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