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निफाड में अनोखा प्रदर्शन: नगर पंचायत अधिकारी की मेज पर छोड़े गए आवारा कुत्तेमहाराष्ट्र
17 सित॰ 2026, 12:29 pm (6 घंटे पहले)· 0

निफाड में अनोखा प्रदर्शन: नगर पंचायत अधिकारी की मेज पर छोड़े गए आवारा कुत्ते

महाराष्ट्र के निफाड में आवारा कुत्तों के आतंक से परेशान शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के कार्यकर्ताओं ने अनोखा विरोध प्रदर्शन किया। युवासेना जिलाप्रमुख विक्रम रंधवे ने बोरों में भरकर कुत्ते सीधे मुख्याधिकारी धीरज भामरे की मेज पर छोड़ दिए, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

महाराष्ट्र के नाशिक जिले के अंतर्गत आने वाले निफाड शहर में स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन का ध्यान खींचने के लिए एक बेहद अजीब तरीका अपनाया। शहर की गलियों में घूम रहे आवारा कुत्तों के कारण आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था, जिससे निपटने के लिए प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा था। इस उदासीनता से नाराज होकर शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेताओं ने एक अनोखा विरोध प्रदर्शन किया, जिसके वीडियो इंटरनेट पर तेजी से फैल रहे हैं।

मुख्याधिकारी के दफ्तर में छोड़े गए कुत्ते

आवारा पशुओं की बढ़ती समस्या से तंग आकर युवासेना जिलाप्रमुख विक्रम रंधवे अपने समर्थकों के साथ निफाड नगर पंचायत कार्यालय के भीतर दाखिल हुए। उनके हाथ में कुछ बोरियां थीं जिनमें आवारा कुत्ते भरे हुए थे। बातचीत के सिलसिले के दौरान इन कार्यकर्ताओं ने बोरियों को खोला और उनमें से कुत्ते निकालकर सीधे नगर पंचायत के मुख्याधिकारी धीरज भामरे की कार्यमेज पर छोड़ दिए। अचानक हुई इस हरकत से अधिकारी हक्के-बक्के रह गए। डरे हुए कुत्ते कमरे के कोने और साइड टेबल पर जा बैठे तथा पूरे कार्यालय में घूमने लगे।

नोटों की माला पहनाने की कोशिश और आश्वासन

प्रदर्शनकारियों का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। वे मुख्याधिकारी के लिए नोटों की एक विशेष माला भी अपने साथ लाए थे और उसे अधिकारी को पहनाने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि धीरज भामरे ने उस माला को पहनने से साफ इंकार कर दिया और विरोध कर रहे लोगों को भरोसा दिलाया कि इस गंभीर समस्या से जल्द ही सख्ती से निपटा जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मौके पर मौजूद अन्य कार्यकर्ता अपने मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे, जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

इस अनोखे और आक्रामक विरोध प्रदर्शन के वीडियो सामने आने के बाद इंटरनेट पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि अधिकारियों की नींद खोलने के लिए ऐसा सख्त कदम उठाना जरूरी था ताकि उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास हो सके। वहीं दूसरी ओर, कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने आवारा कुत्तों को बोरों में भरकर इस तरह लाने और कार्यालय में छोड़ने की आलोचना की है और इसे जानवरों के प्रति क्रूरता करार दिया है।

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सवाल-जवाब

यह विरोध प्रदर्शन कहाँ हुआ था?
यह विरोध प्रदर्शन महाराष्ट्र के नाशिक जिले के निफाड शहर में हुआ।
इस प्रदर्शन का नेतृत्व किसने किया?
इस प्रदर्शन का नेतृत्व शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के युवासेना जिलाप्रमुख विक्रम रंधवे ने किया।
नगर पंचायत कार्यालय में कौन से अधिकारी मौजूद थे?
नगर पंचायत कार्यालय में मुख्याधिकारी धीरज भामरे मौजूद थे।
प्रदर्शनकारियों ने अधिकारी की मेज पर क्या छोड़ा?
प्रदर्शनकारियों ने बोरियों में भरकर आवारा कुत्ते मुख्याधिकारी की मेज पर छोड़ दिए।
अधिकारी ने क्या प्रतिक्रिया दी?
मुख्याधिकारी धीरज भामरे ने नोटों की माला पहनने से मना कर दिया और आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने का भरोसा दिलाया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·5 घंटे पहले

यह घटना स्थानीय नागरिक निकायों की प्रशासनिक विफलता और सोशल मीडिया-केंद्रित राजनीतिक प्रदर्शनों के बढ़ते चलन को उजागर करती है। आवारा पशुओं की समस्या से निपटने में तंत्र की ढिलाई दूर करने के लिए कानून-व्यवस्था और पशु क्रूरता निवारण मानकों को ताक पर रखना चिंताजनक है। नगर निकायों को केवल आश्वासन या ऐसे अप्रत्याशित विरोधों के दबाव में काम करने के बजाय वैज्ञानिक बंध्याकरण और टीकाकरण जैसी दीर्घकालिक नीतियों को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि जनसुरक्षा और जीव दया दोनों बनी रहें।

Priya Sharma@priya-sharma·5 घंटे पहले

सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा और जीवों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण—दोनों ही एक सभ्य और स्वस्थ शहरी जीवनशैली के मूल तत्व हैं। सोशल मीडिया पर सनसनी फैलाने के लिए बेजुबान जानवरों को बंद बोरों में भरकर दफ्तरों में छोड़ना न केवल पशु क्रूरता है, बल्कि यह हमारे नागरिक संवाद के गिरते स्तर को भी दर्शाता है। डर और तनाव से मुक्त वातावरण ही किसी समाज की वास्तविक प्रगति की पहचान है। नगर निकायों को वायरल विरोध प्रदर्शनों के दबाव में आने के बजाय नागरिकों के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए बंध्याकरण और उत्तरदायी पशु प्रबंधन पर निरंतर काम करना चाहिए।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 घंटे पहले

सार्वजनिक कार्यालय में घुसकर पशुओं को छोड़ना और अधिकारी को घेरना कानून-व्यवस्था तथा प्रशासनिक कार्य में बाधा डालने का गंभीर मामला बनता है। यद्यपि आवारा कुत्तों की समस्या से सार्वजनिक सुरक्षा जुड़ी है, लेकिन बोरों में जानवरों को बंद करना पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत कानूनी जटिलताएँ पैदा कर सकता है। इस प्रकार के आक्रामक विरोध प्रदर्शन से जनता का ध्यान तो आकर्षित होता है, पर यह सरकारी कामकाज में व्यवधान और एफआईआर जैसी कानूनी कार्रवाई का आधार भी बन सकता है। प्रशासन को समय रहते शिकायतें सुलझानी होंगी ताकि स्थितियाँ आपराधिक मोड़ न लें।

Rohan Verma@rohan-verma·5 घंटे पहले

करण की बात सही है, लेकिन यह घटना क्षेत्रीय राजनीति में सोशल मीडिया केंद्रित आक्रामक विरोध के बढ़ते चलन को भी दर्शाती है। जब नगर निकायों में समस्याओं के समाधान के लिए पारदर्शी और समयबद्ध प्रणाली नहीं होती, तो राजनीतिक दल जन-आक्रोश का इस्तेमाल केवल प्रचार के लिए करने लगते हैं। ऐसे नाटकीय प्रदर्शनों से मीडिया का ध्यान तो खींच लिया जाता है, पर इससे प्रशासनिक गतिरोध पैदा होता है और वास्तविक नीतिगत समाधान पीछे छूट जाता है। यदि शासन स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो जनहित के मुद्दे इसी तरह केवल राजनीतिक हथकंडे बनकर रह जाएंगे।

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