अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार को तेज गिरावट देखने को मिली। अमेरिका और ईरान के बीच सप्ताहांत में सैन्य हमलों को अस्थायी रूप से रोके जाने के बाद वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चा तेल 7.4% तक टूटकर 82.60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। दो सप्ताह से जारी सीधे संघर्ष के बाद दोनों देशों की ओर से मिले इस संकेत ने भू-राजनीतिक तनाव में कमी और कूटनीतिक बातचीत के फिर से शुरू होने की उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और तेहरान के बीच सैन्य कार्रवाइयों पर लगे इस विराम से निवेशकों ने भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम को कम कर दिया है। इस अस्थाई शांति से इस बात की संभावना मजबूत हुई है कि कूटनीतिक वार्ताएं फिर से शुरू हो सकती हैं, जिससे वैश्विक तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल हो सकेगी।
सैन्य कार्रवाई रोकने के पीछे के मुख्य कारण
अमेरिकी सैन्य अभियान को रोके जाने के पीछे इंटरसेप्टर मिसाइलों की घटती आपूर्ति और ईरान में उच्च मूल्य वाले लक्ष्यों की सीमित संख्या से जुड़ी चिंताएं बताई जा रही हैं। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी थी कि अभियान को जारी रखने से अमेरिकी सैन्य क्षमताओं पर काफी दबाव पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी बल किसी भी स्थिति का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संभावित वार्ताओं के लिए रास्ता खुला रखना चाहते हैं। दूसरी ओर, एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि तेहरान 'ईंट का जवाब पत्थर से' देने की नीति पर कायम है, जिसका मतलब है कि जब तक अमेरिका नए हमले नहीं करता, तब तक ईरान भी अपनी सैन्य कार्रवाइयों को निलंबित रखेगा।
आपूर्ति जोखिम और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की अनिश्चितता
अस्थायी युद्धविराम के बावजूद ऊर्जा बाजारों से चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लाल सागर के किनारे सऊदी अरब की तेल सुविधाओं पर ईरान समर्थित हूती (अंसार अल्लाह) के हमलों की जिम्मेदारी लेने के बाद आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं। यदि भू-राजनीतिक तनाव फिर से भड़कता है, तो यह स्थिति तेल की कीमतों में और गिरावट को रोक सकती है।
ओसीबीसी के विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल में आई यह गिरावट उनके उस आधारभूत अनुमान के करीब है, जिसमें कीमतें समय के साथ धीरे-धीरे नीचे आने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे जब तक अनसुलझे रहेंगे, तब तक तेल की कीमतों में फिर से उछाल आ सकता है। ब्रेंट क्रूड भी एक समय 7% से अधिक गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के नीचे चला गया था।
WTI कच्चा तेल क्या है और इसकी कीमतें कैसे तय होती हैं?
वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचे जाने वाले कच्चे तेल का एक मुख्य प्रकार है। ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ यह वैश्विक तेल बाजार के तीन प्रमुख बेंचमार्क में शामिल है। इसे 'लाइट' और 'स्वीट' क्रूड माना जाता है क्योंकि इसमें घनत्व और सल्फर की मात्रा काफी कम होती है, जिससे इसे रिफाइन करना आसान होता है। यह तेल मुख्य रूप से अमेरिका में उत्पादित होता है और कुशिंग हब के माध्यम से वितरित किया जाता है।
किसी भी अन्य संपत्ति की तरह, WTI क्रूड की कीमतें भी मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों पर काम करती हैं। वैश्विक आर्थिक वृद्धि से मांग बढ़ती है, जबकि राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध आपूर्ति को बाधित कर कीमतों को बढ़ा देते हैं। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर की मजबूती या कमजोरी भी तेल की कीमतों को प्रभावित करती है क्योंकि तेल का व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में ही होता है।
ओपेक और इन्वेंट्री रिपोर्ट की भूमिका
तेल की कीमतों को दिशा देने में ओपेक (तेल उत्पादक देशों का संगठन) और इसके विस्तारित समूह ओपेक+ का बड़ा हाथ होता है। 12 सदस्य देशों वाला ओपेक हर साल उत्पादन कोटा तय करता है। जब ओपेक उत्पादन घटाता है, तो आपूर्ति कम होने से कीमतें बढ़ती हैं, जबकि उत्पादन बढ़ाने पर कीमतें गिरती हैं। रूस जैसे 10 गैर-ओपेक देशों के साथ मिलकर यह समूह ओपेक+ कहलाता है।
इसके अलावा, अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी (EIA) द्वारा जारी साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट भी WTI की कीमतों को प्रभावित करती हैं। यदि रिपोर्ट में कच्चे तेल के स्टॉक में गिरावट दिखती है, तो यह बढ़ती मांग का संकेत होता है, जिससे कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत इन्वेंट्री बढ़ने से कीमतें नीचे आती हैं।
विदेशी मुद्रा बाजार पर असर
कच्चे तेल की गिरती कीमतों का असर वैश्विक मुद्रा बाजार पर भी देखा गया। ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) गिरकर 1.3300 के स्तर की ओर आ गया। तेल सस्ता होने और ब्रिटेन में मुद्रास्फीति के नरम आंकड़ों ने बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा मौद्रिक नीति में सख्ती की संभावनाओं को कम कर दिया है। वहीं, यूरो (EUR/USD) भी अपनी शुरुआती बढ़त खोकर 1.1400 के स्तर से नीचे फिसल गया, हालांकि मध्य पूर्व में तनाव घटने की उम्मीदों से इसे थोड़ा सहारा जरूर मिला है।



















