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अमेरिकी डॉलर की वापसी तेज, कारोबारी और निवेशक फिर लौट रहे ग्रीनबैक की ओरबाज़ार
4 घंटे पहले· 0

अमेरिकी डॉलर की वापसी तेज, कारोबारी और निवेशक फिर लौट रहे ग्रीनबैक की ओर

स्टैंडर्ड चार्टर्ड के जानकारों का कहना है कि दुनिया भर के निर्यातक और निवेशक अपनी कमाई अमेरिकी डॉलर में ही रख रहे हैं, जिससे डी-डॉलराइजेशन की चर्चा कमजोर पड़ती दिख रही है।

दुनिया भर के निर्यातक और निवेशक अपने पैसे को लेकर एक साफ फैसला ले रहे हैं, और वह फैसला बार-बार अमेरिकी डॉलर के पक्ष में जा रहा है। कई देश और कंपनियां अपने कारोबार और लेन-देन के लिए फिर से यूएस डॉलर की ओर लौट रही हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निर्यातक आज भी डॉलर को अपने पास रखना पसंद करते हैं और इसे अपनी स्थानीय मुद्राओं के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं।

इस रुझान को समझाने के लिए ताइवान का उदाहरण सामने रखा गया है। आंकड़े बताते हैं कि यह देश अपनी निर्यात कमाई के हर 100 डॉलर में से सिर्फ 2 डॉलर को न्यू ताइवान डॉलर में बदलता है। बाकी 98 डॉलर वह अमेरिकी डॉलर के रूप में ही अपने पास रखता है, क्योंकि यह मुद्रा ज्यादा स्थिर, मजबूत और आसानी से खरीदी-बेची जा सकने वाली है।

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नेताओं की अपील और कारोबार की हकीकत में फर्क

स्टैंडर्ड चार्टर्ड में एफएक्स रिसर्च की सह-प्रमुख दिव्या देवेश इसे 're-dollarization' यानी दोबारा डॉलर की ओर लौटना कहती हैं। उनका कहना है, “हम असल में डी-डॉलराइजेशन खेमे में नहीं हैं।” देवेश बताती हैं कि भले ही कई देशों के नेता अपनी कंपनियों से स्थानीय मुद्राओं को प्राथमिकता देने के लिए कह रहे हों, लेकिन कंपनियां आज भी डॉलर से चिपकी हुई हैं। उनके मुताबिक कारोबारी डॉलर को अपनी कमाई सुरक्षित रखने का जरिया मानते हैं। यहीं नेताओं के भाषणों और कंपनियों की असल सोच के बीच का साफ अंतर दिखाई देता है।

निवेशकों को अब भी लुभा रहा अमेरिकी बाजार

जानकारों का कहना है कि सिर्फ मुद्रा ही नहीं, विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी शेयर बाजार भी बेहद आकर्षक बना हुआ है। देवेश के मुताबिक री-डॉलराइजेशन का असर दो तरह से दिखता है, एक तो निर्यातक डॉलर अपने पास रोक रहे हैं और दूसरा निवेशक अमेरिकी शेयरों में पैसा लगाना अब भी बहुत फायदेमंद मान रहे हैं। यही वजह है कि 2022 से लगातार बड़ी चुनौतियां मिलने के बावजूद अमेरिका मौद्रिक बाजार पर अपनी पकड़ बनाए हुए है। देवेश जोर देकर कहती हैं कि बाजार में मौजूद दूसरी मुद्राएं कारोबार के लिहाज से बहुत भरोसेमंद विकल्प नहीं हैं।

क्यों नहीं डगमगा रही डॉलर की बादशाहत

देवेश का यह भी मानना है कि जहां री-डॉलराइजेशन का रुझान तेज हो रहा है, वहीं डी-डॉलराइजेशन की चर्चा कमजोर पड़ रही है। उनका कहना है कि सिर्फ बजट घाटे की वजह से डॉलर निकट या मध्यम अवधि में अपना सेफ-हेवन दर्जा नहीं खोने वाला। डॉलर आज भी सबसे उपयोगी मुद्रा है और इसके बिना दुनिया भर की कंपनियों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। यही वजह है कि नेताओं की स्थानीय मुद्राओं वाली अपील के बीच भी कारोबार दोबारा डॉलर की ओर लौट रहा है। कुल मिलाकर यह बड़ा बदलाव इशारा करता है कि अमेरिकी डॉलर की दबदबे वाली स्थिति फिलहाल कायम रहने वाली है।

सवाल-जवाब

री-डॉलराइजेशन का क्या मतलब है?
यह वह रुझान है जिसमें कंपनियां और देश अपने कारोबार और लेन-देन के लिए दोबारा अमेरिकी डॉलर की ओर लौट रहे हैं और अपनी कमाई डॉलर में ही रख रहे हैं।
ताइवान का उदाहरण क्यों अहम है?
ताइवान अपनी निर्यात कमाई के हर 100 डॉलर में से सिर्फ 2 डॉलर को न्यू ताइवान डॉलर में बदलता है और बाकी 98 डॉलर यूएस डॉलर में रखता है।
कंपनियां डॉलर को क्यों पसंद कर रही हैं?
क्योंकि डॉलर ज्यादा स्थिर, मजबूत और आसानी से खरीदी-बेची जा सकने वाली मुद्रा है, जिससे वे अपनी कमाई को सुरक्षित रख पाती हैं।
क्या डॉलर अपना सेफ-हेवन दर्जा खो सकता है?
दिव्या देवेश के मुताबिक सिर्फ बजट घाटे की वजह से डॉलर निकट या मध्यम अवधि में अपना सेफ-हेवन दर्जा नहीं खोने वाला।
नेताओं की अपील और कंपनियों की सोच में क्या फर्क है?
कई देशों के नेता कंपनियों से स्थानीय मुद्राओं को प्राथमिकता देने को कह रहे हैं, लेकिन कंपनियां अपनी कमाई सुरक्षित रखने के लिए अब भी डॉलर से चिपकी हुई हैं।
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