अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की आक्रामक तेजी के कारण प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर ने जोरदार मजबूती दिखाई है, जिससे ब्रिटिश पाउंड में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। यूरोपीय कारोबारी सत्र के दौरान 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 5.15% पर पहुंच गई, जो पिछले 19 वर्षों का एक नया रिकॉर्ड स्तर है। अमेरिकी ऋण प्रतिभूतियों पर मिलने वाले रिटर्न में इस भारी उछाल ने डॉलर को जबरदस्त सहारा दिया है। छह प्रमुख मुद्राओं की एक टोकरी के मुकाबले ग्रीनबैक के मूल्य का आकलन करने वाला यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) 0.15% चढ़कर 101.32 के करीब पहुंच गया, जो बीते आठ हफ्तों का सबसे ऊंचा स्तर है। दूसरी तरफ, पाउंड स्टर्लिंग अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 1.3225 के करीब पहुंच गया।
फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति और ब्याज दरों में बढ़ोतरी के आसार
अमेरिकी मुद्रा की व्यापक मजबूती के पीछे फेडरल रिजर्व के नीति-निर्माताओं का सख्त रुख मुख्य वजह बना हुआ है। फेड के अधिकारी विलियम्स ने स्पष्ट किया है कि मुद्रास्फीति की चुनौती को देखते हुए इस साल ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीद करना पूरी तरह तर्कसंगत है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अधिकतम रोजगार के जोखिम अब कम हो गए हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है, लेकिन समय रहते मुद्रास्फीति को लक्ष्य तक वापस लाना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से आ रही मजबूत मांग का भी विशेष उल्लेख किया गया।
बाजार के आंकलन टूल सीएमई फेडवॉच के मुताबिक, इस बात की लगभग 55% संभावना जताई जा रही है कि फेडरल रिजर्व चालू वर्ष की अपनी शेष दोनों नीतिगत बैठकों में ब्याज दरों में वृद्धि करेगा। केंद्रीय बैंक के बोर्ड सदस्यों ने आगाह किया है कि लगातार ऊंची बनी हुई महंगाई एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है, जिससे मौद्रिक सख्ती जारी रखने के संकेत मिलते हैं।
बैंक ऑफ इंग्लैंड के नीति निर्माताओं में आर्थिक परिदृश्य पर मतभेद
ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड (BoE) के अधिकारियों के बीच आर्थिक गतिविधियों और मुद्रास्फीति के भविष्य को लेकर परस्पर विरोधी विचार सामने आए हैं। बैंक ऑफ इंग्लैंड की डिप्टी गवर्नर क्लेयर लोम्बार्डेली ने एक सख्त रुख पेश करते हुए संकेत दिया कि यदि ऊर्जा की ऊंची कीमतें बरकरार रहती हैं, तो मौद्रिक नीति को और कड़ा करने की संभावना बढ़ जाएगी। उनका मानना है कि वेतन वृद्धि की मौजूदा रफ्तार मुद्रास्फीति के तय लक्ष्य के लिहाज से अभी भी बहुत अधिक है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि केंद्रीय बैंक को ऊर्जा कीमतों के उतार-चढ़ाव पर पूरी तरह यांत्रिक तरीके से प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए।
इसके ठीक विपरीत, बैंक ऑफ इंग्लैंड की नीति निर्माता स्वाति ढींगरा ने नरमी का पक्ष रखा। ढींगरा ने तर्क दिया कि कीमतों के दबाव में कमी के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं और यूनाइटेड किंगडम (UK) के श्रम बाजार में कमजोरी देखी जा रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिटेन की मौजूदा वित्तीय स्थितियां पहले ही काफी हद तक सख्ती का काम कर चुकी हैं। कमजोर लेबर मार्केट और सर्दियों में ऊर्जा लागत को लेकर चिंताओं के बीच उनका सतर्क दृष्टिकोण ब्रिटिश पाउंड के लिए दबाव बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।
तकनीकी विश्लेषण: GBP/USD जोड़ी पर मंदी का दबाव
दैनिक तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो GBP/USD जोड़ी 1.3225 के आसपास कारोबार कर रही है और इसका निकट अवधि का रुख मंदी की ओर बना हुआ है। हाजिर भाव 1.3421 पर स्थित 20-अवधि के एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) से काफी नीचे टिका हुआ है। यह 20-दिवसीय EMA अब तत्काल ओवरहेड सप्लाई और रेसिस्टेंस का काम कर रहा है, जो किसी भी प्रकार की रिकवरी को सीमित कर रहा है।
तकनीकी संकेतकों में, 14-अवधि का रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) लगभग 24.7 के स्तर पर है, जो ओवरसोल्ड स्थिति का संकेत देता है। यह स्थिति गिरावट की रफ्तार को कुछ हद तक थाम सकती है, लेकिन सीधे तौर पर ट्रेंड रिवर्सल की गारंटी नहीं देती। यदि मौजूदा गिरावट जारी रहती है, तो यह मुद्रा जोड़ी वर्ष के अपने निचले स्तर 1.3140 की तरफ फिसल सकती है। वहीं ऊपर की ओर, किसी भी ठोस सुधार के लिए 1.3421 के 20-दिवसीय EMA से ऊपर टिकना अनिवार्य होगा। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, GBP/USD वर्तमान में 1.32 के स्तर पर है, जिसमें पिछले बंद भाव 1.33 के मुकाबले 0.88% की गिरावट दर्ज की गई है। इसका 52-सप्ताह का दायरा 1.30 से 1.38 के बीच रहा है, जबकि लाइव तकनीकी संकेतकों में 14-दिवसीय RSI 26 (ओवरसोल्ड) और 20-दिवसीय EMA 1.34 पर स्थित है।
केंद्रीय बैंकों का अधिदेश और ब्याज दरों का प्रभाव
दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों का प्राथमिक और वैधानिक कार्य किसी देश अथवा क्षेत्र में मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करना होता है। किसी भी अर्थव्यवस्था को निरंतर मुद्रास्फीति या अपस्फीति के दौर का सामना करना पड़ता है। जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो उसे मुद्रास्फीति कहा जाता है, जबकि कीमतों में लगातार गिरावट को अपस्फीति कहते हैं। मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करते हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed), यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) और बैंक ऑफ इंग्लैंड (BoE) जैसे प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों का मुख्य अधिदेश मुद्रास्फीति को 2% के करीब बनाए रखना है।
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक बेंचमार्क ब्याज दर का सहारा लेते हैं। पूर्व निर्धारित समय पर केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत समीक्षा जारी करते हैं और दरों को स्थिर रखने, बढ़ाने या घटाने के पीछे के तर्कों को स्पष्ट करते हैं। इसके आधार पर वाणिज्यिक बैंक अपनी जमा और ऋण दरों में संशोधन करते हैं। जब ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी की जाती है, तो इसे मौद्रिक सख्ती या मॉनेटरी टाइटनिंग कहा जाता है, जिससे कर्ज लेना महंगा और बचत पर रिटर्न आकर्षक हो जाता है। इसके विपरीत, ब्याज दरों में कटौती को मौद्रिक ढील या मॉनेटरी ईजिंग कहा जाता है, जो निवेश और खर्च को बढ़ावा देती है।
हॉक्स बनाम डोव्ज़: निर्णय प्रक्रिया और ब्लैकआउट अवधि
केंद्रीय बैंक सामान्यतः राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं। इनके नीतिगत बोर्ड में शामिल होने से पहले सदस्यों को कड़ी संसदीय सुनवाई और पैनल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक सदस्य का अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने पर अपना अलग दृष्टिकोण होता है। जो सदस्य अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कम ब्याज दरों, सस्ते कर्ज और 2% से मामूली अधिक मुद्रास्फीति को स्वीकार करने के पक्ष में होते हैं, उन्हें डोव्ज़ कहा जाता है। दूसरी तरफ, जो सदस्य हर हाल में महंगाई को 2% या उससे नीचे रखने और बचत को प्रोत्साहित करने के लिए ऊंची ब्याज दरों की वकालत करते हैं, उन्हें हॉक्स कहा जाता है।
नीतिगत बैठकों का नेतृत्व चेयरमैन या प्रेसिडेंट करते हैं, जिनकी जिम्मेदारी हॉक्स और डोव्ज़ के बीच आम सहमति बनाना होता है। यदि मतदान में बराबर का बंटवारा (50-50 टाई) हो जाए, तो चेयरमैन का निर्णायक मत अंतिम फैसला तय करता है। केंद्रीय बैंक हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी नीतिगत घोषणाओं से मुद्रा, शेयर बाजार या बॉन्ड यील्ड में अनावश्यक उथल-पुथल न मचे। नीतिगत बैठक से कुछ दिन पहले तक सदस्यों को सार्वजनिक रूप से नीति पर बयान देने से प्रतिबंधित कर दिया जाता है, जिसे ब्लैकआउट अवधि कहा जाता है।
एशियाई और यूरोपीय सत्र में अन्य वैश्विक बाजारों की हलचल
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा और जिंस बाजार में गुरुवार को व्यापक हलचल देखी गई। ऑस्ट्रेलियाई रोजगार रिपोर्ट जारी होने के बाद AUD/USD गिरकर 0.7000 के करीब आ गया। आंकड़ों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5% की तुलना में बढ़कर 4.6% हो गई, हालांकि रोजगार सृजन के आंकड़े अनुमान से बेहतर रहे और 39.5 हजार दर्ज किए गए। कारोबारी आगामी ट्रंप-शी बैठक को लेकर भी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
दूसरी ओर, USD/JPY अपने तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर से पीछे हटते हुए एशियाई सत्र में 158.00 के करीब बना रहा। जापानी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि ने येन को समर्थन दिया है, जबकि अमेरिकी डॉलर अपनी दो महीने की बढ़त को बरकरार रखे हुए है। जिंस बाजार में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली बैठक से पहले सोने में लगातार दूसरे दिन मंदी का रुख देखा गया और यह 4,300 डॉलर के स्तर से नीचे फिसलकर एक सप्ताह के निचले स्तर पर आ गया। बाजार इस बैठक में दुर्लभ मृदा तत्वों, प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों और अमेरिका-चीन व्यापार समझौते के विस्तार से जुड़े घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए है।
अन्य नीतिगत कदमों में, स्विस नेशनल बैंक (SNB) ने अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दर को 0% पर अपरिवर्तित रखा, जो बाजार की उम्मीदों के अनुरूप था। बैंक ने वर्ष 2026 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 0.6% से बढ़ाकर 0.7% कर दिया है। इसके अलावा, बैंक ऑफ जापान (BoJ) ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया, जो मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
















