कम कागजी कार्रवाई और झटपट नकदी मिलने की सुविधा के चलते देश भर में सोने के बदले कर्ज लेने का चलन तेजी से बढ़ा है, जिसने इस पूरे कारोबार को कई लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंचा दिया है। कई लोग यह मानकर चलते हैं कि गोल्ड लोन की अंतिम ईएमआई या पूरी मूल रकम जमा करते ही बैंक उनकी गिरवी रखी ज्वैलरी तुरंत लौटाने के लिए बाध्य है। हकीकत इससे अलग हो सकती है, क्योंकि विशेष परिस्थितियों में वित्तीय संस्थान पूरा भुगतान मिलने के बाद भी सोने की डिलीवरी रोकने का विधिक अधिकार रखते हैं। अगर आप भी गिरवी रखा जेवर छुड़ाने की तैयारी में हैं, तो इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को बारीकी से समझ लेना आवश्यक है।
दूसरे बकाये पर बैंक का धारणाधिकार
बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नियम यह स्पष्ट करता है कि यदि किसी ग्राहक ने एक ही बैंक से एक से अधिक प्रकार के कर्ज ले रखे हैं, तो वह केवल सोने पर लिए गए कर्ज को निपटाकर अपनी संपत्ति तुरंत हासिल नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, यदि उसी संस्थान में आपका कोई पर्सनल लोन अथवा अन्य मद का बकाया चल रहा है, तो संबंधित बैंक अपने जोखिम को सुरक्षित रखने के लिए आपकी गिरवी धातु को अपने पास रोके रख सकता है।
यह पूरी व्यवस्था इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 171 के अंतर्गत संचालित होती है। इस कानूनी धारा के मुताबिक, किसी बैंक अथवा साख देने वाली संस्था के पास सामान्य धारणाधिकार यानी जनरल लीयन की शक्ति होती है। इसका सीधा आशय यह है कि जब तक कर्जदार पर बैंक का किसी भी खाते में कोई बकाया शेष है, तब तक संस्था ग्राहक द्वारा जमानत के तौर पर रखे गए सामान को अपने कब्जे में बनाए रख सकती है, भले ही जमानत किसी विशिष्ट कर्ज के एवज में ही क्यों न सौंपी गई हो।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का ताजा न्यायिक रुख
इस व्यवस्था को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक हालिया न्यायिक निर्णय से भी मजबूती मिली है। उस प्रकरण में याचिकाकर्ता उपभोक्ता ने अपने गोल्ड लोन का संपूर्ण चुकता प्रमाण पत्र हासिल करने की स्थिति तक भुगतान कर दिया था। इसके बावजूद बैंक ने उसकी गिरवी रखी ज्वैलरी वापस करने से साफ इनकार कर दिया, क्योंकि उसी बैंक के किसी अन्य कर्ज खाते में दायित्व बाकी था। बैंक ने सोने को उस दूसरे कर्ज की भरपाई के लिए बतौर जमानत अपने पास रोक लिया।
उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद बैंक के इस कदम को पूरी तरह वैध करार दिया। अदालत ने स्पष्ट रेखांकित किया कि भारतीय संविदा कानून बैंकों को इस प्रकार का अधिकार प्रदान करता है। फैसले में निर्देश दिया गया कि जब तक ग्राहक के जिम्मे उस बैंक का समस्त बकाया पूर्ण रूप से चुकता नहीं हो जाता, तब तक वित्तीय संस्थान गिरवी रखे सोने को अपने पास रोके रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
किन शर्तों पर लागू होता है यह नियम
अदालत के इस फैसले और कानूनी स्थिति के बावजूद यह नियम हर मामले में स्वतः ही अंधाधुंध लागू नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के वकील अमृतराज कौशल के अनुसार, बैंकों को हर सामान्य परिस्थिति में सोने को रोके रखने का मनमाना अधिकार नहीं मिल जाता। ग्राहकों को यह तकनीकी अंतर समझना चाहिए कि यह अधिकार अनुबंध की शर्तों पर सीधे तौर पर निर्भर करता है।
अमृतराज कौशल ने स्पष्ट किया कि बैंक केवल तभी दूसरे बकाये के एवज में सोना रोक सकते हैं, जब गोल्ड लोन स्वीकृत करते समय हस्ताक्षरित संविदा या समझौते में इसका स्पष्ट प्रावधान पहले से दर्ज किया गया हो। आंध्र प्रदेश वाले विवाद में एक अहम तथ्य यह था कि सोना गिरवी रखने वाला व्यक्ति उसी बैंक के एक अन्य लोन खाते में सह-आवेदक यानी को-अप्लीकेंट के रूप में जुड़ा हुआ था। इसी कानूनी दायित्व और समझौते के नियमों के आधार पर अदालत ने बैंक को सारा बकाया चुकता होने तक सोना रोकने की अनुमति प्रदान की।



















