अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के शीर्ष नेता शी जिनपिंग के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बैठक से पहले वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक गलियारों में सरगर्मी बढ़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ.सोशल पर अपनी उत्सुकता साझा करते हुए संकेत दिया कि दोनों महाशक्तियों के बीच आगामी संवाद में आधुनिक तकनीक और सुपर इंटेलिजेंस का मुद्दा शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। उन्होंने साफ किया कि इस जटिल तकनीक के संदर्भ में दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति को बनाए रखने के पक्षधर दिख रहे हैं। इस कूटनीतिक हलचल के बीच मुद्रा बाजारों, जिंसों और केंद्रीय बैंकों के नीतिगत निर्णयों पर दुनिया भर के निवेशकों की बारीक नजर बनी हुई है।
सुपर इंटेलिजेंस पर वार्ता और मुद्रा बाजार का रुख
चीनी समकक्ष शी जिनपिंग से आमने-सामने बातचीत से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया मंच पर अपने विचार रखे। ट्रंप ने लिखा कि चीन के राष्ट्रपति शी के साथ एक बड़ा दिन होने वाला है और सुपर इंटेलिजेंस चर्चा का एक बड़ा विषय होगा, लेकिन वे इसे वहीं छोड़ना चाहते हैं जहां यह अभी है, और चीन का रुख भी यही है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीकी नियंत्रणों को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है, ऐसे में इस संवाद को बेहद अहम माना जा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के तुरंत बाद विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर पर कोई त्वरित नकारात्मक प्रभाव नहीं देखा गया। अमेरिकी डॉलर सूचकांक यानी यूएस डॉलर इंडेक्स मजबूती के साथ लगभग 101.23 के स्तर पर स्थिर बना रहा। मुद्रा कारोबारियों का मानना है कि दोनों नेताओं की बैठक के वास्तविक नतीजों और आधिकारिक समझौतों के सामने आने तक डॉलर में स्थिरता बनी रह सकती है।
ट्रेड वॉर की पृष्ठभूमि और टैरिफ का बढ़ता दबाव
आर्थिक दृष्टिकोण से ट्रेड वॉर या व्यापार युद्ध तब शुरू होता है जब दो या दो से अधिक देश अत्यधिक संरक्षणवादी नीतियां लागू करने लगते हैं। इसके तहत एक देश दूसरे देश से आने वाले सामान पर सीमा शुल्क यानी टैरिफ और व्यापारिक बाधाएं खड़ी करता है। जवाब में दूसरा देश भी जवाबी टैरिफ लगाता है, जिससे आयात लागत में भारी इजाफा होता है और अंततः इसका सीधा असर आम जनता पर बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के रूप में पड़ता है।
अमेरिका और चीन के बीच यह आर्थिक टकराव वर्ष 2018 की शुरुआत में तब भड़का था, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एशियाई दिग्गज पर अनुचित व्यापारिक प्रथाओं और बौद्धिक संपदा की चोरी का आरोप लगाते हुए व्यापक टैरिफ लगाए थे। इस कदम के जवाब में चीन ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए अमेरिकी ऑटोमोबाइल और सोयाबीन सहित कई वस्तुओं पर जवाबी शुल्क लगा दिए थे। दोनों देशों के बीच तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया था, जिसके बाद जनवरी 2020 में दोनों पक्षों ने पहले चरण के व्यापार समझौते यानी यूएस-चाइना फेज वन ट्रेड डील पर हस्ताक्षर किए थे। उस समझौते में चीन की आर्थिक और व्यापार व्यवस्था में संरचनात्मक सुधारों की मांग की गई थी, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच भरोसा और स्थिरता बहाल करना था। हालांकि, इसके तुरंत बाद फैली कोरोनावायरस महामारी ने पूरी दुनिया का ध्यान इस व्यापार विवाद से भटका दिया। बाद में सत्ता संभालने वाले राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इन टैरिफ को न केवल बरकरार रखा, बल्कि कुछ अतिरिक्त लेवी भी जोड़ीं।
व्हाइट हाउस में 47वें अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने वाशिंगटन और बीजिंग के रिश्तों में फिर से नई हलचल पैदा कर दी है। वर्ष 2024 के चुनावी अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने वादा किया था कि सत्ता में लौटने के बाद वे चीन पर 60 प्रतिशत तक टैरिफ लगाएंगे। 20 जनवरी 2025 को कार्यभार संभालने के साथ ही यह संरक्षणवादी नीति दोबारा सक्रिय हो गई। ट्रंप के वापस आने से व्यापार युद्ध उसी मोड़ से दोबारा शुरू होने की आशंका गहराई है, जहां जवाबी कार्रवाइयां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकती हैं। इससे निवेश और खर्च में कमी आने तथा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई बढ़ने का जोखिम मंडरा रहा है।
वैश्विक मुद्रा और जिंस बाजारों की प्रतिक्रिया
उच्चस्तरीय शिखर बैठक से पहले वित्तीय बाजारों में मिला-जुला और सतर्क रुख देखने को मिल रहा है। गुरुवार के एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर नीचे खिसकता नजर आया। यह गिरावट ऑस्ट्रेलिया के अगस्त रोजगार आंकड़ों के जारी होने के बाद आई, जिसमें बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 4.6 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि रोजगार परिवर्तन का आंकड़ा 39.5 हजार रहा जो बाजार के अनुमानों से बेहतर था। इसके साथ ही ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक को लेकर निवेशकों की चिंताएं भी इस दबाव का मुख्य कारण रहीं।
दूसरी ओर, डॉलर-येन जोड़ी तीन सप्ताह के उच्च स्तर से पीछे हट गई और गुरुवार को एशियाई सत्र के दौरान 158.00 के आसपास नुकसान झेलती दिखी। जापानी बॉन्ड यील्ड में आई तेजी और बैंक ऑफ जापान के संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों ने येन को सहारा दिया, जबकि फेडरल रिजर्व की ओर से सख्त मौद्रिक रुख के दांव और ऊंची अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के दम पर अमेरिकी डॉलर ने दो महीने के उच्च स्तर के करीब अपनी बढ़त बनाए रखी।
सोने के बाजार में भी लगातार दूसरे दिन नकारात्मक रुझान देखने को मिला। यूरोपीय सत्र के पहले हिस्से में पीली धातु 4,300 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे फिसलकर एक सप्ताह के निचले स्तर पर कारोबार करती रही। बाजार सहभागियों को इस बैठक से किसी बड़े चमत्कारिक समझौते की कम उम्मीद है, हालांकि दुर्लभ पृथ्वी खनिजों यानी रेयर अर्थ्स, तकनीकी निर्यात प्रतिबंधों और मौजूदा संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने पर होने वाली प्रगति पर हर किसी का ध्यान केंद्रित है।
केंद्रीय बैंकों के नीतिगत फैसले और आर्थिक परिदृश्य
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के इस दौर में विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक भी महत्वपूर्ण मौद्रिक कदम उठा रहे हैं। स्विस नेशनल बैंक ने अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दरों को उम्मीद के अनुरूप 0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा है। अपने मौद्रिक नीति आकलन में स्विस केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि वाणिज्यिक बैंकों द्वारा उसके पास रखी जाने वाली साइट डिपॉजिट पर एक निश्चित सीमा तक नीतिगत दर के हिसाब से रिटर्न दिया जाएगा। स्विस नेशनल बैंक ने वर्ष 2026 के लिए महंगाई दर 0.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले अनुमान 0.6 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। इसके साथ ही बैंक ने चेतावनी दी है कि स्विट्जरलैंड के आर्थिक परिदृश्य के लिए मुख्य जोखिम वैश्विक अर्थव्यवस्था में होने वाले घटनाक्रमों से जुड़ा हुआ है।
वहीं, दूसरी ओर बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया। जापानी केंद्रीय बैंक ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। यह निर्णय व्यापक रूप से बाजार की उन अपेक्षाओं के अनुरूप रहा जो विश्लेषक कई हफ्तों से जता रहे थे। वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में इस तरह के बदलाव और टैरिफ युद्ध की आशंकाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।


















