कच्चे तेल की कीमतों ने 20 जुलाई को दिनभर तेज उतार-चढ़ाव दिखाया। सुबह के कारोबार में जहां भाव 90 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया था, वहीं दोपहर करीब 1:40 बजे इसमें अचानक तेज गिरावट आ गई और दाम लुढ़ककर 88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। कुछ ही घंटों में आई इस उथल-पुथल ने बाजार में यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर तेल के दाम इतनी तेजी से नीचे क्यों आए।
सुबह से दोपहर तक क्या हुआ
दिन की शुरुआत में कच्चा तेल मजबूती के साथ 90 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया था। यह स्तर बाजार के लिए अहम माना जाता है, क्योंकि यहां पहुंचते ही कारोबारी अक्सर मुनाफावसूली शुरू कर देते हैं। दोपहर होते-होते खरीदारी की रफ्तार थम गई और बिकवाली हावी हो गई, जिससे भाव 90 डॉलर से नीचे फिसलते हुए 88 डॉलर पर आ टिका।
डॉलर की चाल का सीधा असर
कच्चे तेल का कारोबार दुनियाभर में डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की मजबूती और कमजोरी का इसकी कीमतों पर सीधा असर पड़ता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो दूसरे देशों के लिए तेल खरीदना महंगा पड़ता है और मांग पर दबाव आता है, जिससे कीमतें नीचे आती हैं। बीते कुछ समय से डॉलर में मजबूती का रुख रहा है, जिसका दबाव तेल की कीमतों पर भी देखा जा रहा है।
90 डॉलर का स्तर क्यों अहम है
90 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा तेल बाजार में एक बड़ी रुकावट की तरह काम करता है। भाव जैसे ही इस स्तर के आसपास पहुंचता है, कारोबारी जोखिम कम करने के लिए बिकवाली करने लगते हैं। यही वजह है कि 90 डॉलर पार करने के बाद तेल टिक नहीं पाया और तेजी से वापस नीचे आ गया। बाजार के जानकार इस स्तर के ऊपर और नीचे की चाल पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
आगे क्या
कच्चे तेल की कीमतों में इस तरह का तेज उतार-चढ़ाव वैश्विक मांग, डॉलर की चाल और कारोबारी धारणा पर निर्भर करता है। फिलहाल भाव 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है और आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि तेल दोबारा 90 डॉलर की ओर बढ़ता है या और नीचे फिसलता है।



















