कच्चे तेल की कीमतों में बुधवार को एक बार फिर तेज गिरावट देखने को मिली। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 3% से ज्यादा लुढ़क गया, क्योंकि होर्मुज जलसंधि में फंसे तेल के टैंकर अब दोबारा बाजार की ओर निकलने लगे हैं। यह गिरावट अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद आई है। खबर लिखे जाने तक WTI करीब 70.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जो मार्च की शुरुआत के बाद इसका सबसे निचला स्तर है। मार्च की शुरुआत में ही दोनों देशों के बीच जंग छिड़ी थी।
इस स्तर पर पहुंचने का मतलब है कि मिडिल ईस्ट की जंग के दौरान तेल ने जो बढ़त बनाई थी, वह लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है। कारोबारियों के मन से अब सप्लाई ठप होने का डर निकल रहा है। दबाव इसलिए भी बढ़ा क्योंकि अमेरिका ईरान पर लगे तेल प्रतिबंधों को कुछ समय के लिए हटाने पर राजी हो गया है, जिससे ग्लोबल बाजार में और ज्यादा तेल आने की उम्मीद है।
होर्मुज से बाहर निकलते टैंकर
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने बुधवार को बताया कि हालात कितनी तेजी से सामान्य हो रहे हैं। उन्होंने कहा, "पिछले 24 घंटों में करीब 72 जहाज होर्मुज जलसंधि से बाहर निकले हैं, जिनमें 2 करोड़ बैरल तेल है।" हालांकि राइट ने यह भी आगाह किया कि होर्मुज में पूरी तरह हालात सामान्य होने में कुछ हफ्ते लगेंगे।
अभी अंतिम समझौता बाकी
बाजार में भले ही राहत का माहौल हो, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है। बातचीत के ताजा दौर में कुछ प्रगति जरूर हुई, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलसंधि के भविष्य को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बने हुए हैं।
तेहरान साफ कर चुका है कि होर्मुज जलसंधि के हालात जंग से पहले जैसे नहीं रहेंगे। माना जा रहा है कि ईरान और ओमान इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर टोल वसूलना शुरू करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को चेतावनी दी कि अगर ईरान टोल वसूलने की अपनी योजना पर आगे बढ़ता है तो यह बातचीत पूरी तरह टूट भी सकती है।
भंडार घटने के बावजूद नहीं संभली कीमत
अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में आई तेज गिरावट भी कीमतों को गिरने से नहीं रोक पाई। ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले हफ्ते भंडार 6.088 मिलियन बैरल घटा, जबकि जानकारों ने 5.1 मिलियन बैरल की गिरावट का अनुमान लगाया था। हालांकि यह गिरावट उससे पिछले हफ्ते के 8.262 मिलियन बैरल के मुकाबले कम रही, इसलिए ये आंकड़े कीमतों को पलटने के लिए काफी नहीं थे।
आखिर WTI कच्चा तेल है क्या
WTI दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल ग्रेड में से एक है, जिसका कारोबार अंतरराष्ट्रीय बाजारों में होता है। ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ यह तेल के तीन बड़े बेंचमार्क में गिना जाता है। इसका पूरा नाम वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट है। कम घनत्व और कम सल्फर की वजह से इसे "लाइट" और "स्वीट" कहा जाता है, और यही खूबियां इसे बेहतरीन क्वालिटी का और आसानी से रिफाइन होने वाला तेल बनाती हैं। यह अमेरिका में निकाला जाता है और कुशिंग हब के जरिए आगे भेजा जाता है, जिसे "दुनिया का पाइपलाइन चौराहा" कहा जाता है। तेल बाजार में इसकी कीमत सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले आंकड़ों में से एक है।
कीमत किन बातों से तय होती है
किसी भी कमोडिटी की तरह WTI की कीमत भी आखिरकार मांग और आपूर्ति पर टिकी होती है। दुनिया भर में मजबूत आर्थिक ग्रोथ मांग और कीमत दोनों बढ़ाती है, जबकि कमजोर अर्थव्यवस्था का असर उल्टा पड़ता है। राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध और प्रतिबंध सप्लाई को बाधित कर कीमतें ऊपर ले जा सकते हैं। बड़े तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक के फैसले भी कीमत पर बड़ा असर डालते हैं। अमेरिकी डॉलर की भी अहम भूमिका है, क्योंकि तेल का कारोबार ज्यादातर डॉलर में होता है। डॉलर कमजोर होने पर दूसरे खरीदारों के लिए तेल सस्ता हो जाता है और डॉलर मजबूत होने पर महंगा।
भंडार के आंकड़े क्यों मायने रखते हैं
अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) और EIA की हर हफ्ते आने वाली भंडार रिपोर्ट WTI की कीमत को हिला सकती हैं, क्योंकि इनसे पता चलता है कि मांग और आपूर्ति किस तरफ बढ़ रही है। भंडार घटना अक्सर मांग बढ़ने का संकेत होता है और कीमत ऊपर ले जा सकता है, जबकि भंडार बढ़ना ज्यादा सप्लाई की ओर इशारा करता है और कीमत नीचे खींचता है। API अपने आंकड़े हर मंगलवार जारी करता है और EIA अगले दिन। दोनों के नतीजे आमतौर पर एक जैसे होते हैं और 75% मौकों पर एक-दूसरे के 1% के दायरे में रहते हैं। EIA के आंकड़ों को ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है, क्योंकि यह एक सरकारी एजेंसी है।
ओपेक की भूमिका
ओपेक यानी पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन में 12 तेल उत्पादक देश शामिल हैं, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन का कोटा तय करते हैं। इन फैसलों का असर अक्सर WTI की कीमतों पर पड़ता है। कोटा घटाने से सप्लाई कम होती है और कीमतें ऊपर जाती हैं, जबकि उत्पादन बढ़ाने से उल्टा होता है। ओपेक+ एक बड़ा समूह है, जिसमें इस संगठन से बाहर के दस और देश शामिल हैं और इनमें सबसे अहम रूस है।













