जापान की अर्थव्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा नीतिगत संदेश सामने आया है। अमेरिकी वित्त विभाग में अंतरराष्ट्रीय मामलों की अवर सचिव एरिन ब्राउन ने शुक्रवार को कहा कि जापान अब अपस्फीति यानी लगातार कीमतों में गिरावट वाले माहौल से पूरी तरह बाहर निकल चुका है। उनका मानना है कि जब किसी देश की बुनियादी आर्थिक स्थिति में इतना बड़ा बदलाव आ जाता है, तो उसकी राष्ट्रीय मुद्रा यानी येन के विनिमय स्तर और केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति में भी उसी के अनुरूप समायोजन किया जाना अनिवार्य हो जाता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मुद्रा बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और प्रमुख केंद्रीय बैंकों के ब्याज दर निर्णयों पर निवेशकों की नजरें टिकी हुई हैं।
ब्राउन ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूत गति का दौर है, लेकिन साथ ही जापान ने जितने लंबे समय तक प्रयास करके आर्थिक सुधार हासिल किया है, उससे भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गहरा विश्वास मिला है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और जापान हर प्रशासनिक स्तर पर एक-दूसरे के साथ बेहद करीबी संवाद बनाए रखते हैं। दोनों देश यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं कि वित्तीय बाजार स्थिर रहें और वहां किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले। मुद्राओं में आने वाले बहुत तेज और अनियंत्रित उतार-चढ़ाव व्यापक आर्थिक नुकसान पहुंचा सकते हैं और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता को भड़का सकते हैं, जिससे दोनों ही देश पूरी तरह बचना चाहते हैं।
वैश्विक असंतुलन पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भूमिका पर सवाल
अमेरिकी वित्त मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के कामकाज और उसके विश्लेषण के तौर-तरीकों पर भी टिप्पणी की। ब्राउन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय और व्यापारिक असंतुलन की पहचान करने के मामले में IMF को कहीं अधिक मुखर और स्पष्ट रवैया अपनाना चाहिए। उनका मानना है कि दुनिया भर के आर्थिक परिदृश्य का आकलन करते समय वैश्विक संस्था को अधिक संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है। IMF को अपनी समीक्षाओं में इस बात पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि अमेरिका के नेतृत्व में आने वाले सकारात्मक आर्थिक झटके वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किस तरह विकास के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वास्तविक जमीनी बदलावों को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करेंगी, तब तक नीतिगत तालमेल बिठाना कठिन बना रहेगा।
विदेशी मुद्रा बाजार में येन और अमेरिकी डॉलर की हलचल
इस नीतिगत बयान के समय विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक सतर्कता का माहौल देखने को मिला। शुरुआती कारोबार के दौरान जब रिपोर्ट तैयार हो रही थी, तब USD/JPY मुद्रा जोड़ी 0.01 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ 158.00 के स्तर पर कारोबार कर रही थी। हालांकि, शुक्रवार को एशियाई कारोबारी सत्र के आगे बढ़ते ही अमेरिकी डॉलर पर नया बिकवाली का दबाव आ गया। इसके परिणामस्वरूप USD/JPY जोड़ी 158.00 के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे फिसल गई। यह गिरावट अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श के उस संबोधन के बाद आई, जिसमें उन्होंने भविष्य की ब्याज दर नीति को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया।
फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श ने अपने वक्तव्य में साफ किया कि वह देश में मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, लेकिन आने वाले समय में ब्याज दरों में किस प्रकार बढ़ोतरी या कटौती होगी, उस पर उन्होंने कोई ठोस रास्ता स्पष्ट नहीं किया। नीतिगत स्पष्टता न मिलने के कारण बाजार में अमेरिकी डॉलर की बिकवाली तेज हो गई, जिससे जापानी मुद्रा को डॉलर के मुकाबले थोड़ी राहत मिली और विदेशी मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया।
वित्तीय बाजारों में रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ की कार्यप्रणाली
वैश्विक वित्तीय बाजारों को समझने के लिए दो सबसे प्रचलित अवधारणाओं को जानना बेहद जरूरी है, जिन्हें रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ कहा जाता है। ये दोनों शब्द यह दर्शाते हैं कि किसी खास समयावधि में निवेशक कितना जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं। जब बाजार का मिजाज रिस्क-ऑन होता है, तब निवेशक भविष्य के आर्थिक विकास को लेकर बेहद आशावादी होते हैं। ऐसे समय में वे उन परिसंपत्तियों में पैसा लगाने के लिए तैयार रहते हैं जहां जोखिम अधिक होता है लेकिन अधिक मुनाफे की संभावना भी ज्यादा होती है। इसके विपरीत, रिस्क-ऑफ माहौल में अनिश्चितता और चिंता बढ़ जाती है, जिसके कारण निवेशक सुरक्षित रास्ता चुनते हैं और कम जोखिम वाली संपत्तियों में पूंजी लगाते हैं, भले ही वहां मिलने वाला रिटर्न अपेक्षाकृत कम क्यों न हो।
रिस्क-ऑन के दौर में शेयर बाजारों में व्यापक तेजी देखने को मिलती है। सोने को छोड़कर अधिकांश जिंसों यानी कमोडिटीज के भाव बढ़ते हैं क्योंकि दुनिया भर में औद्योगिक मांग और आर्थिक वृद्धि की बेहतर संभावनाएं बनती हैं। कच्चे माल और धातुओं का निर्यात करने वाले देशों की मुद्राएं तेजी से मजबूत होती हैं क्योंकि उनके उत्पादों की मांग बढ़ जाती है, और साथ ही क्रिप्टोकरेंसी जैसी जोखिम भरी संपत्तियों में भी खरीदारी आती है। दूसरी ओर, रिस्क-ऑफ दौर में सुरक्षित ठिकाना मानी जाने वाली परिसंपत्तियों का बोलबाला होता है। सरकारी बॉन्ड की कीमतें चढ़ जाती हैं, सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की चमक बढ़ जाती है, और अमेरिकी डॉलर, जापानी येन तथा स्विस फ्रैंक जैसी सुरक्षित मुद्राओं को भारी समर्थन मिलता है।
कमोडिटी मुद्राओं और सुरक्षित मुद्राओं का अलग-अलग व्यवहार
विभिन्न मुद्राओं के व्यवहार का सीधा संबंध इस बात से होता है कि संबंधित देश की अर्थव्यवस्था किस पर निर्भर है। जब बाजार में रिस्क-ऑन की लहर होती है, तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD), कनाडाई डॉलर (CAD), और न्यूजीलैंड डॉलर (NZD) जैसी प्रमुख मुद्राओं में उछाल आता है। इसके साथ ही रूसी रूबल (RUB) और दक्षिण अफ्रीकी रैंड (ZAR) जैसी अन्य मुद्राएं भी मजबूत होती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं काफी हद तक प्राकृतिक संसाधनों और जिंसों के निर्यात पर टिकी हैं। आर्थिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीद से कच्चे माल के दाम बढ़ते हैं, जिससे इन निर्यातक देशों की मुद्राओं को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है।
इसके उलट, रिस्क-ऑफ के माहौल में तीन प्रमुख मुद्राओं में निवेशकों का भरोसा सबसे मजबूत रहता है, जिनमें अमेरिकी डॉलर (USD), जापानी येन (JPY) और स्विस फ्रैंक (CHF) शामिल हैं। अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्राथमिक रिजर्व मुद्रा है और संकट के समय निवेशक अमेरिकी सरकारी ऋण पत्र खरीदते हैं, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते उसके डिफॉल्ट होने की कोई संभावना नहीं मानी जाती। वहीं जापानी येन की मजबूती के पीछे कारण यह है कि जापान के सरकारी बॉन्ड का एक बहुत बड़ा हिस्सा वहां के घरेलू निवेशकों के पास है, जो किसी भी बड़े संकट के समय भी अपने देश के बॉन्ड नहीं बेचते। दूसरी तरफ, स्विट्जरलैंड के सख्त बैंकिंग कानून निवेशकों को पूंजी की सुरक्षा की असाधारण गारंटी देते हैं, इसलिए स्विस फ्रैंक संकट के समय पसंदीदा विकल्प बन जाता है।
अन्य वैश्विक बाजारों, सोने और क्रिप्टोकरेंसी का हाल
शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र में केवल जापानी येन ही चर्चा में नहीं था, बल्कि अन्य परिसंपत्तियों में भी अहम बदलाव देखे गए। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपनी बढ़त को मजबूत किया और AUD/USD जोड़ी उछलकर 0.6950 के स्तर की ओर बढ़ गई। फेडरल रिजर्व प्रमुख केविन वॉर्श की टिप्पणियों से डॉलर पर आए दबाव ने इस उछाल को सहारा दिया।
कमोडिटी बाजार में सोने की चाल सुस्त रही और एशियाई सत्र में यह घटकर लगभग 4,150 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गया। सोने में आई यह गिरावट पिछले कारोबारी सत्र की बढ़त को आंशिक रूप से कम करती है। इस सप्ताह जारी हुए अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने निवेशकों में यह भरोसा मजबूत किया है कि फेडरल रिजर्व इस साल कम से कम एक बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी जरूर कर सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गुरुवार की भारी गिरावट के बाद स्थिरता लौट आई, जिससे डॉलर को कुछ सहारा मिला और सोने की मांग पर दबाव बना।
डिजिटल परिसंपत्तियों के क्षेत्र में बिटकॉइन (BTC), एथेरियम (ETH) और रिपल (XRP) में मिला-जुला रुख देखने को मिला। बिटकॉइन और एथेरियम अपने प्रमुख सपोर्ट स्तरों को बचाने में सफल रहे, लेकिन एक्सआरपी अपने अहम रेजिस्टेंस स्तर से नीचे संघर्ष करता नजर आया। लगातार ऊंची बनी हुई महंगाई के आंकड़ों ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कमजोर किया है। तकनीकी संकेतकों पर तीनों प्रमुख क्रिप्टो टोकन में कमजोरी के लक्षण दिखे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यदि इनके मौजूदा सपोर्ट स्तर टूटते हैं तो बाजार में और गहरा सुधार देखने को मिल सकता है।


















