अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया तेजी ने ब्रिटेन की मौद्रिक नीति को लेकर हलचल तेज कर दी है। यमन में हूती विद्रोहियों के आगे बढ़ने के बाद कच्चे तेल का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूने की तैयारी कर रहा है। ऊर्जा लागत में आए इस भारी उछाल के कारण वित्तीय बाजारों में बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें तेजी से बढ़ गई हैं। मौजूदा समय में बाजार यह मानकर चल रहा है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड मध्य 2027 तक अपनी नीतिगत दरों में चार बार बढ़ोतरी कर सकता है, जबकि जून के अंत तक केवल एक बार की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा था। हालांकि, ब्रिटेन के कमजोर श्रम बाजार और आगामी बजट वार्ताओं से जुड़े विकास संबंधी जोखिमों को देखते हुए इस पैमाने पर ब्याज दरों को सख्त किए जाने की संभावनाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ब्रिटेन का लेबर मार्केट संकट और मौद्रिक नीति के सामने असमंजस
ऊर्जा कीमतों और ब्याज दरों के बीच ऐतिहासिक रूप से गहरा संबंध रहा है। जब भी कच्चे तेल की कीमतों में अस्वाभाविक उछाल आता है, मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंकों पर सख्त कदम उठाने की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। ब्रिटेन का केंद्रीय बैंक भी इस व्यापक आर्थिक प्रवृत्ति से अलग नहीं है। यही कारण है कि वित्तीय बाजारों ने दरों में आक्रामक बढ़ोतरी का अनुमान लगाना शुरू कर दिया है। इसके बावजूद नीति निर्माताओं के लिए ब्याज दरों में बदलाव करना कतई आसान फैसला साबित नहीं होने वाला है।
अर्थव्यवस्था के विकास के आंकड़े भले ही पहली नजर में बेहद मजबूत दिखाई दे रहे हों, लेकिन ब्रिटेन का लेबर मार्केट अभी भी एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। रोजगार और श्रम बाजार में बनी यह नाजुक स्थिति केंद्रीय बैंक के लिए हाथ खोलने में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है। अगर कमजोर पड़ते श्रम बाजार के बीच दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की जाती है, तो इससे आर्थिक गतिविधियों को और बड़ा झटका लग सकता है।
कमर्शियल बैंक के माइकल फिस्टर ने कहा, "हम इस बात को लेकर संशय में हैं कि बाजार द्वारा प्रत्याशित पैमाने पर ब्याज दर वृद्धि यथार्थवादी है या नहीं।"
इसके अलावा माइकल फिस्टर ने रेखांकित किया कि आगामी बजट वार्ताओं से उत्पन्न होने वाले आर्थिक जोखिम भी परिदृश्य को धुंधला कर रहे हैं। यही वजह है कि जो निवेशक ब्रिटेन में दरों में तेज बढ़ोतरी पर दांव लगा रहे हैं, उन्हें अन्य बाजारों की ओर रुख करना पड़ सकता है। यह समूचा आर्थिक घटनाक्रम ब्रिटिश पाउंड के लिए एक कमजोर और नकारात्मक पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।
वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर का दबदबा और येन का रुख
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में भी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक (FOMC) के प्रभाव साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं। मंगलवार को एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में बना रहा। AUD/USD की जोड़ी 0.7150 के स्तर से नीचे फिसल गई, जो पिछले कारोबारी दिन दर्ज किए गए तीन सप्ताह से अधिक के निचले स्तर के करीब है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तरों के निकट बनी हुई है। कच्चे तेल के कारण उत्पन्न महंगाई के जोखिम और आगामी FOMC बैठक ने अमेरिकी डॉलर को व्यापक मजबूती प्रदान की है। दूसरी ओर, चीन के अगस्त महीने के मिले-जुले आर्थिक आंकड़ों से भी ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को कोई खास सहारा नहीं मिल सका।
इसी बीच, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी येन में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। USD/JPY मंगलवार तड़के 155.00 के स्तर की ओर बढ़ता हुआ देखा गया। मुद्रा व्यापारी इस सप्ताह होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान (BoJ) दोनों की नीतिगत बैठकों के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। फेड द्वारा दरों में संभावित बढ़ोतरी की दांव और तेल प्रेरित महंगाई ने डॉलर को सहारा दिया है। हालांकि, बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में सख्त रुख अपनाने के संकेतों ने जापानी येन को भी कुछ हद तक जमीन दी है, जिससे USD/JPY की तेजी पर सीमित अंकुश लग सकता है।
सोने के भाव में ठहराव और निवेशकों की सतर्कता
कमोडिटी बाजार में सोने की चाल भी सीमित दायरे में सिमट गई है। एशियाई सत्र में मामूली बढ़त दर्ज करने के बाद सोना अपनी चमक बनाए रखने के लिए संघर्ष करता दिखा और एक महीने के निचले स्तर के करीब बना रहा। यह पीली धातु वर्तमान में 4,300 डॉलर प्रति औंस के स्तर से ठीक नीचे कारोबार कर रही है। आज से शुरू हो रही दो दिवसीय FOMC नीतिगत बैठक के महत्वपूर्ण फैसलों से पहले वैश्विक व्यापारी कोई बड़ा जोखिम उठाने से बच रहे हैं और उन्होंने सतर्कता का रुख अपना रखा है।















