अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों को लेकर एक बार फिर सख्त रुख देखने को मिल रहा है। फिलाडेल्फिया फेडरल रिजर्व की अध्यक्ष पॉलसन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि महंगाई पर काबू पाना जरूरी हुआ तो दरों में और बढ़ोतरी की जा सकती है। जुलाई 2025 में फिलाडेल्फिया फेड प्रमुख के रूप में अपना कार्यकाल संभालने वाली पॉलसन शुरुआत में नीतिगत नरमी यानी डोविश रुख की पक्षधर दिख रही थीं, लेकिन हालिया आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए उनके रुख में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह महंगाई को 2 प्रतिशत के लक्ष्य तक वापस लाने के लिए जो भी जरूरी होगा, उसका पूरा समर्थन करेंगी।
महंगाई का दबाव और आर्थिक मजबूती के बीच नीतिगत बदलाव
पॉलसन के हालिया बयानों से यह साफ हो गया है कि मुद्रास्फीति के खिलाफ अमेरिकी केंद्रीय बैंक का संघर्ष अभी थमा नहीं है। उनके अनुसार, महंगाई को लेकर सबसे बेहतर बात केवल यही कही जा सकती है कि स्थिति पहले से बदतर नहीं हुई है, लेकिन बुनियादी महंगाई अब भी अड़ियल स्तर पर बनी हुई है। सितंबर की नीतिगत बैठक से ठीक पहले जोखिमों का संतुलन बदल गया था, जिसके बाद नीति को मुद्रास्फीति से निपटने के लिए एक बेहतर स्थिति में लाने के वास्ते सितंबर में ब्याज दर वृद्धि का सहारा लिया गया था।
इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI क्षेत्र में हो रहे भारी निवेश और विस्तार को भी महंगाई का दबाव बढ़ाने वाले एक प्रमुख घटक के रूप में देखा जा रहा है। पॉलसन ने रेखांकित किया कि व्यापक अर्थव्यवस्था लगातार मजबूती दिखा रही है और इसमें विकास की रफ्तार तेज होने के स्पष्ट संकेत नजर आ रहे हैं। जब अर्थव्यवस्था में मांग और गति मजबूत बनी रहती है, तो कीमतें नीचे लाने के लिए उधारी लागत को सख्त रखना अनिवार्य हो जाता है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक को लगता है कि अगर मौजूदा स्तरों पर ढिलाई बरती गई, तो कीमतें फिर से अनियंत्रित हो सकती हैं।
फेडरल रिजर्व का दोहरा जनादेश और ब्याज दरों का तंत्र
संयुक्त राज्य अमेरिका में मौद्रिक नीति को संचालित करने की पूरी जिम्मेदारी फेडरल रिजर्व पर है। केंद्रीय बैंक के पास दो बुनियादी संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने के लिए फेडरल रिजर्व का सबसे मुख्य हथियार ब्याज दरों में समायोजन करना है।
जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं और वार्षिक महंगाई दर 2 प्रतिशत के अनिवार्य लक्ष्य को पार कर जाती है, तब फेडरल रिजर्व नीतिगत ब्याज दरों में इजाफा करता है। दरों में बढ़ोतरी से पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी लागत बढ़ जाती है, जिससे कर्ज लेना महंगा होता है और कंपनियों व उपभोक्ताओं के खर्च करने की रफ्तार धीमी पड़ती है। उधारी लागत बढ़ने का असर वैश्विक मुद्रा बाजार पर भी पड़ता है। इसके चलते अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए अधिक यील्ड वाले अमेरिकी वित्तीय बाजारों में अपनी पूंजी लगाना अधिक आकर्षक बन जाता है। दूसरी तरफ, जब महंगाई 2 प्रतिशत से नीचे आ जाती है या फिर बेरोजगारी की दर खतरनाक रूप से बढ़ जाती है, तब फेडरल रिजर्व आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, जिसका विपरीत असर डॉलर की कीमत पर पड़ता है और वह कमजोर होने लगता है।
नीतिगत बैठकों की संरचना और फैसले लेने की प्रक्रिया
फेडरल रिजर्व पूरे वर्ष में आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है। इन बैठकों में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी FOMC देश की आर्थिक स्थिति, उत्पादन, रोजगार और मूल्य वृद्धि का गहन विश्लेषण करती है और उसी आधार पर मौद्रिक दिशा तय करती है। FOMC के निर्णय निर्माण मंडल में कुल बारह अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात स्थायी सदस्य और फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष शामिल होते हैं। इनके अलावा शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों के अध्यक्षों में से चार अध्यक्ष एक-एक वर्ष के चक्रीय आधार पर इस समिति में मतदान का अधिकार पाते हैं। क्षेत्रीय अध्यक्षों की यह संरचना सुनिश्चित करती है कि देश के अलग-अलग हिस्सों के आर्थिक आंकड़ों को नीति निर्माण में जगह मिल सके।
असामान्य मौद्रिक उपाय: परिमाणात्मक सहजता और परिमाणात्मक सख्ती
गंभीर वित्तीय संकट या असामान्य मंदी के दौर में फेडरल रिजर्व पारंपरिक ब्याज दर समायोजन से आगे बढ़कर असाधारण उपायों का सहारा लेता है। ऐसे संकट काल में केंद्रीय बैंक परिमाणात्मक सहजता यानी क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) की नीति अपनाता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से फेडरल रिजर्व किसी ठप या नकदी की कमी से जूझ रहे वित्तीय तंत्र में बड़े पैमाने पर नकदी का प्रवाह बढ़ाता है। यह एक गैर-मानक नीतिगत उपाय है जिसे संकट के समय या बेहद कम महंगाई के दौर में लागू किया जाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान यह फेड का सबसे प्रमुख आर्थिक हथियार था। इसके तहत केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर जारी करता है और वित्तीय संस्थानों से उच्च गुणवत्ता वाले बॉन्ड खरीदता है, जिससे बाजार में तरलता बढ़ती है। हालांकि, QE के अमल में आने से आमतौर पर अमेरिकी डॉलर की कीमतों में कमजोरी आती है।
इसके ठीक विपरीत प्रक्रिया को परिमाणात्मक सख्ती यानी क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से नए बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है। इसके अलावा, अपने पास रखे मौजूदा बॉन्ड की परिपक्वता अवधि पूरी होने पर मिलने वाले मूलधन का इस्तेमाल नए बॉन्ड खरीदने में नहीं करता है। इससे वित्तीय तंत्र से अतिरिक्त नकदी वापस खिंच जाती है। आमतौर पर QT की नीति अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक मानी जाती है और इससे ग्रीनबैक को मजबूती मिलती है।
वैश्विक मुद्रा बाजार का हाल: जापानी येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में उठापटक
पॉलसन के सख्त बयानों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी के बीच वैश्विक मुद्रा बाजारों में मिलाजुला असर देखा गया है। अमेरिकी डॉलर प्रमुख मुद्राओं की तुलना में स्विस फ्रैंक के मुकाबले सबसे ज्यादा मजबूत नजर आया। विभिन्न प्रमुख मुद्राओं के आपसी उतार-चढ़ाव को दर्शाने वाले विश्लेषण में अमेरिकी डॉलर का दबदबा साफ दिखाई दिया।
एशियाई कारोबारी सत्र में गुरुवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7000 के स्तर की ओर फिसल गया। इस कमजोरी के पीछे ऑस्ट्रेलिया का अगस्त रोजगार आंकड़ा रहा, जिसमें बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5 प्रतिशत की तुलना में बढ़कर 4.6 प्रतिशत पर पहुंच गई। हालांकि, रोजगार परिवर्तन के आंकड़ों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया और यह 39.5K दर्ज हुआ, लेकिन बढ़ती बेरोजगारी ने निवेशकों का उत्साह ठंडा कर दिया।
दूसरी तरफ, जापानी बाजार में उथल-पुथल के बीच USD/JPY तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर से फिसलकर एशियाई सत्र में 158.00 के करीब आ गया। बैंक ऑफ जापान यानी BoJ ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। यह निर्णय 7-2 के बहुमत से लिया गया, जो पिछले कई हफ्तों से बाजार के लगाए जा रहे अनुमानों के पूरी तरह अनुकूल था। जापान में सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल और संभावित मुद्रा हस्तक्षेप के जोखिम ने जापानी येन को सहारा दिया, जबकि फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख के चलते अमेरिकी डॉलर भी दो महीने के उच्चतम स्तर के करीब अपनी बढ़त बनाए रखने में सफल रहा।
सोने की कीमतों में गिरावट और ट्रंप-शी बैठक पर टिकी नजरें
कमोडिटी बाजार में सोने पर लगातार दूसरे दिन दबाव बना रहा। यूरोपीय कारोबारी सत्र के पहले हिस्से में सोना 4,300 डॉलर प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे कारोबार करता हुआ एक सप्ताह के निचले स्तर तक आ गया। बुलियन निवेशकों की निगाहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बैठक पर टिकी हुई हैं।
हालांकि बाजार को इस बैठक से किसी बहुत बड़ी घोषणा की उम्मीद कम है, फिर भी कारोबारी दुर्लभ खनिज तत्वों यानी रेयर अर्थ्स की आपूर्ति, तकनीकी प्रतिबंधों के दायरे और मौजूदा अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध विराम को आगे बढ़ाए जाने से जुड़े घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और फेड की ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी ने फिलहाल सर्राफा बाजार के रुख को कमजोर कर रखा है।


















