अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबारी हफ्ते की शुरुआत के साथ ही बहुमूल्य धातुओं पर जबरदस्त बिकवाली का दबाव देखने को मिला है। सोने की कीमतें (XAU/USD) एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान भारी गिरावट का शिकार होकर 4,200 डॉलर प्रति औंस के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे फिसल गईं। यह गिरावट धातु को 5 अगस्त के बाद के सबसे निचले स्तर पर ले आई है, जिससे बाजार का तकनीकी ढांचा काफी कमजोर नजर आ रहा है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की तरफ से सख्त मौद्रिक नीतियों के संकेत और अक्टूबर महीने में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी की आशंका ने सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की चमक को फीका कर दिया है।
बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की महंगाई का दोहरा दबाव
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड इस समय कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब टिकी हुई है। बॉन्ड यील्ड में यह तेजी कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण पैदा हुए मुद्रास्फीति के दबाव और फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में दरें बढ़ाने के बढ़ते अनुमानों की वजह से बनी हुई है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो बिना ब्याज वाली संपत्तियों जैसे सोने को अपने पास रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है। निवेशक सोने के बजाय सरकारी बॉन्ड जैसे ब्याज देने वाले विकल्पों में पूंजी लगाना ज्यादा फायदेमंद समझने लगते हैं।
इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी, कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचा बनाए रखने में मदद कर रही है। हालांकि भू-राजनीतिक संकट के दौरान आमतौर पर सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार तेल से उपजने वाली महंगाई और आक्रामक अमेरिकी डॉलर के आगे सोने की मांग कमजोर पड़ गई है। निवेशक नकदी और अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित ठिकाने के रूप में प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे सोने से पूंजी बाहर निकल रही है।
फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और मुद्रा का समीकरण
अमेरिका में समग्र मौद्रिक नीति को दिशा देने का काम फेडरल रिजर्व करता है। फेडरल रिजर्व के पास मुख्य रूप से दो वैधानिक जिम्मेदारियां हैं: कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार को बढ़ावा देना। इन दोहरे लक्ष्यों को साधने के लिए केंद्रीय बैंक का प्राथमिक हथियार ब्याज दरों का समायोजन करना है। जब अर्थव्यवस्था में कीमतें बहुत तेजी से बढ़ने लगती हैं और मुद्रास्फीति फेडरल रिजर्व के तय 2% के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो नीति निर्माता उधारी की लागत बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करते हैं।
उधारी महंगी होने से अर्थव्यवस्था में खर्च और निवेश की रफ्तार धीमी होती है, जिससे मुद्रास्फीति पर लगाम लगती है। इस प्रक्रिया का सीधा प्रभाव विदेशी मुद्रा बाजार पर पड़ता है। ऊंची ब्याज दरें वैश्विक निवेशकों को अपनी पूंजी अमेरिकी संपत्तियों में लगाने के लिए प्रेरित करती हैं, क्योंकि वहां बेहतर रिटर्न मिलता है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है। दूसरी ओर, जब महंगाई दर 2% से नीचे चली जाती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक रूप से बढ़ जाती है, तो केंद्रीय बैंक उधारी को सुगम बनाने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, जिससे अमेरिकी मुद्रा पर दबाव आता है।
एफओएमसी का गठन और निर्णय प्रक्रिया
फेडरल रिजर्व साल में आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है। इन बैठकों का संचालन फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) द्वारा किया जाता है, जो मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों का बारीकी से आकलन करती है और ब्याज दरों को लेकर अहम फैसले लेती है। इस नीति निर्धारक समिति में कुल बारह अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य और फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष स्थायी रूप से शामिल रहते हैं। शेष चार सीटें अन्य ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों के अध्यक्षों द्वारा एक-एक वर्ष के चक्रीय कार्यकाल के आधार पर भरी जाती हैं। यह समिति मुद्रास्फीति, रोजगार के आंकड़े और व्यापक वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रखकर नीति की दिशा तय करती है।
मात्रात्मक ढील और मात्रात्मक सख्ती का प्रभाव
अत्यधिक वित्तीय संकट की परिस्थितियों में फेडरल रिजर्व एक गैर-मानक नीति का सहारा लेता है जिसे मात्रात्मक ढील (QE) कहा जाता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके जरिए केंद्रीय बैंक संकटग्रस्त वित्तीय प्रणाली में नकदी के प्रवाह को तेजी से बढ़ाता है। जब अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में हो या मुद्रास्फीति बेहद नीचे आ जाए, तब इसका उपयोग होता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के समय फेडरल रिजर्व ने इसे अपने सबसे प्रमुख हथियार के रूप में आजमाया था। इस नीति के तहत केंद्रीय बैंक नई नकदी का सृजन करता है और वित्तीय संस्थानों से उच्च गुणवत्ता वाले बॉन्ड खरीदता है, जिससे आमतौर पर अमेरिकी डॉलर की कीमत कमजोर होती है।
इसके विपरीत प्रक्रिया को मात्रात्मक सख्ती (QT) कहा जाता है। इस नीति के अंतर्गत फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से नए बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और अपने पोर्टफोलियो में परिपक्व होने वाले बॉन्ड के मूलधन का पुनर्निवेश नहीं करता। इससे प्रणाली से तरलता धीरे-धीरे वापस खींची जाती है। वित्तीय बाजार में नकदी की उपलब्धता कम होने के कारण यह कदम आम तौर पर अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर को मजबूत करता है।
मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक केंद्रीय बैंक
सोने पर बना दबाव मुद्रा बाजार में चल रही भारी हलचल से पूरी तरह मेल खाता है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी (AUD/USD) हफ्ते के पहले दिन 0.7000 के स्तर के पास कमजोर रुख के साथ कारोबार कर रही है, जो 4 अगस्त के बाद का इसका निचला स्तर है। अमेरिकी यील्ड के बहु-वर्षीय उच्च स्तर पर बने रहने और अमेरिका-ईरान तनाव के चलते मजबूत बने डॉलर ने इस जोड़ी को दबा रखा है, जबकि निवेशक मंगलवार को आने वाली रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) की नीतिगत घोषणाओं का इंतजार कर रहे हैं।
दूसरी ओर, डॉलर और जापानी येन (USD/JPY) की जोड़ी में निचले स्तरों से खरीदारी लौटी है। शुक्रवार को आई उस गिरावट की भरपाई हो रही है जो जापानी अधिकारियों द्वारा येन को सहारा देने के लिए हस्तक्षेप करने की अटकलों से पैदा हुई थी। बैंक ऑफ जापान के नरम रुख वाले मिनट्स ने येन की बढ़त को सीमित कर दिया है। इसके अलावा, कच्चे तेल से पैदा हुई महंगाई और अक्टूबर में फेडरल रिजर्व की दर वृद्धि की संभावनाओं ने डॉलर को मजबूत करके इस जोड़ी को वापस 158.00 के स्तर की ओर धकेल दिया है।
पिछले हफ्ते फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान दोनों ने ही एक समान कदम उठाते हुए ब्याज दरों में 25 आधार अंकों (bps) की वृद्धि की थी। दोनों प्रमुख केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति के जोखिमों से जूझ रहे हैं और दोनों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उनके भावी नीतिगत फैसले आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेंगे। जब तक नीतिगत सख्ती और डॉलर की मजबूती का यह दौर जारी रहता है, तब तक सोने की कीमतों के लिए कोई बड़ा उछाल दर्ज करना चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है।



















