जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य का संकल्प अडिग रहे, तो नियति को भी झुकना पड़ता है। महाराष्ट्र की माला पापलकर का जीवन सफर इसी अदम्य साहस और जिजीविषा का जीवंत प्रमाण बनकर उभरा है। करीब पच्चीस वर्ष पूर्व एक नवजात बच्ची को जलगांव रेलवे स्टेशन के गंदे कूड़ेदान में लावारिस छोड़ दिया गया था। वह जन्म से ही पूरी तरह दृष्टिहीन थीं। जिस उम्र में बच्चे को माता-पिता के दुलार की जरूरत होती है, उस उम्र में माला को अपनों ने ही अंधेरे और बदबूदार डस्टबिन में तिल-तिल कर मरने के लिए फेंक दिया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, और उसी बेसहारा बच्ची ने अपनी मेहनत के दम पर नागपुर कलेक्ट्रेट में राजस्व सहायक का प्रतिष्ठित पद हासिल कर लिया है।
शंकर बाबा का मिला सहारा और मिली नई पहचान
जलगांव रेलवे स्टेशन पर जब रोती-बिलखती इस नन्हीं दृष्टिहीन बच्ची पर पुलिसकर्मियों की नजर पड़ी, तो उन्होंने उसे तुरंत बचाया। इसके बाद कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए बच्ची को अमरावती जिले के वझर स्थित अनाथालय के सुपुर्द कर दिया गया। इस अनाथालय का संचालन विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता शंकर बाबा पुंडलीकराव पापलकर करते हैं। शंकर बाबा ने इस लावारिस बच्ची को केवल शरण ही नहीं दी, बल्कि उसे अपना पारिवारिक नाम यानी पापलकर उपनाम भी दिया। उन्होंने माला को अपनी सगी बेटी की तरह पाला और उसे कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि उसके सिर पर उसके अपने जन्मदाताओं का साया नहीं है। शंकर बाबा के निस्वार्थ सेवा कार्यों को हाल ही में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है।
ब्रेल लिपि से उच्च शिक्षा तक का चुनौतीपूर्ण सफर
एक अनाथालय में दिव्यांग के रूप में बड़े होना कदम-कदम पर संघर्षों से भरा होता है। माला के सामने सबसे बड़ी चुनौती दृष्टिहीनता थी, लेकिन उन्होंने अपनी इस शारीरिक कमी को कभी सपनों के आड़े नहीं आने दिया। अनाथालय के सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने डॉ. भिवापुरकर अंध विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत की। यहां उन्होंने ब्रेल लिपि के माध्यम से अक्षरों की दुनिया को पहचाना और किताबों को अपना सबसे सच्चा साथी बना लिया।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद माला ने उच्च शिक्षा की राह चुनी। उन्होंने विदर्भ ज्ञान विज्ञान संस्थान में दाखिला लिया, जहां से पहले ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन की उपाधि हासिल की। पढ़ाई के दौरान उन्हें कई तरह की प्रशासनिक अड़चनों, अध्ययन सामग्री की कमी और आर्थिक सीमाओं से जूझना पड़ा, परंतु उनका ध्यान कभी अपने लक्ष्य से नहीं भटका। ब्रेल पुस्तकों और अपनी तीव्र स्मरण शक्ति के बल पर वह लगातार आगे बढ़ती रहीं।
महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग में लहराया परचम
उच्च शिक्षा पूरी करने के उपरांत माला पापलकर ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। उनका सपना प्रशासनिक सेवा के माध्यम से समाज में अपनी पहचान बनाना और आत्मनिर्भर होना था। उन्होंने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (एमपीएससी) की ग्रुप-सी परीक्षा दी, जो क्लर्क-कम-टाइपिस्ट पदों के लिए आयोजित होती है। कड़े परिश्रम और निरंतर अभ्यास से उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण परीक्षा को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर लिया।
परीक्षा पास करने के बाद भी रास्ता पूरी तरह आसान नहीं रहा। विभिन्न प्रकार की कागजी कार्रवाई, सत्यापन और प्रक्रियात्मक विलंब के कारण नियुक्ति मिलने में काफी समय लगा। इन सभी बाधाओं को पार करते हुए अंततः उन्हें नागपुर कलेक्ट्रेट में राजस्व सहायक यानी रेवेन्यू असिस्टेंट के पद पर आधिकारिक नियुक्ति पत्र प्रदान कर दिया गया। जब माला ने कलेक्ट्रेट कार्यालय में अपनी जिम्मेदारी संभाली, तो यह केवल एक सरकारी नौकरी की शुरुआत नहीं थी, बल्कि संघर्ष और मानवीय संवेदनशीलता की सबसे बड़ी विजय थी।
बेसहारा और हाशिए पर खड़े लोगों के लिए बनीं प्रेरणा
माला पापलकर की यह कामयाबी भारत के लाखों ऐसे बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए रोशनी की किरण है जो जीवन में अभावों और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। जन्म के तुरंत बाद कूड़े के ढेर में फेंक दी गई एक लावारिस बच्ची जब अपनी मेहनत से सरकारी सेवा के महत्वपूर्ण ओहदे तक पहुंच सकती है, तो समाज का कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है। इस सफलता में शंकर बाबा पापलकर का मार्गदर्शन और अनाथालय का योगदान भी यह दर्शाता है कि सही अवसर और स्नेह मिले तो उपेक्षित प्रतिभाएं भी राष्ट्र निर्माण में अपनी अमूल्य भूमिका निभा सकती हैं।



















