अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में गहराते व्यवधानों के बीच वॉशिंगटन ने यूरोपीय देशों पर रणनीतिक ईंधन भंडार जारी करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने यूरोप में अपने सहयोगी देशों से कहा है कि वे अपने राष्ट्रीय आपातकालीन भंडारों से डीजल का प्रवाह बाजार में बढ़ाएं। इस कूटनीतिक पहल का प्राथमिक उद्देश्य दुनिया भर में डीजल की किल्लत को रोकना और आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाना बताया जा रहा है। यदि यूरोपीय देश इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो इससे अमेरिका द्वारा अपने घरेलू डीजल निर्यात पर संभावित प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता टल सकती है।
छह महीनों में 12 करोड़ बैरल डीजल जारी करने का प्रस्ताव
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, व्हाइट हाउस का मानना है कि यूरोपीय संघ द्वारा अतिरिक्त डीजल उपलब्ध कराने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और ईंधन की लागत में नरमी आएगी। योजना के तहत वॉशिंगटन चाहता है कि यूरोपीय संघ अगले छह महीनों के दौरान लगभग 120 मिलियन यानी 12 करोड़ बैरल डीजल अपने आपातकालीन स्टॉक से बाजार में उतारे। इस बड़े कदम से रिफाइनिंग दबाव कम होने और वाणिज्यिक परिवहन नेटवर्क को स्थिरता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। गुरुवार को सोशल मीडिया मंच X पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने सहयोगी देशों से अपनी जिम्मेदारियां निभाने का आह्वान किया। स्कॉट बेसेंट ने X पर लिखा, “Our European partners should accelerate delivery on their existing commitments and make additional supplies immediately available to address ongoing disruptions” यानी यूरोपीय सहयोगियों को अपनी मौजूदा प्रतिबद्धताओं पर अमल तेज करना चाहिए और तात्कालिक व्यवधानों से निपटने के लिए अतिरिक्त आपूर्ति जारी करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय ईंधन संकट का बोझ अमेरिकी किसानों, ट्रांसपोर्टरों और घरेलू व्यवसायों पर अकेले नहीं डाला जा सकता।
वित्तीय बाजारों की मनोदशा: 'रिस्क-ऑन' बनाम 'रिस्क-ऑफ' का समीकरण
ऊर्जा संकट और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में वित्तीय बाजारों का रुख भी तेजी से बदल रहा है। वैश्विक वित्तीय जगत में निवेशकों की धारणा को समझने के लिए दो प्रमुख शब्दावलियों का व्यापक उपयोग किया जाता है: 'रिस्क-ऑन' और 'रिस्क-ऑफ'। ये दोनों शब्द यह दर्शाते हैं कि किसी विशेष समय में निवेशक जोखिम उठाने के लिए कितने तैयार हैं। जब बाजार में 'रिस्क-ऑन' का माहौल होता है, तो निवेशक भविष्य को लेकर काफी आश्वस्त होते हैं और अधिक मुनाफे की चाह में जोखिम भरी संपत्तियों की खरीदारी करते हैं। इसके विपरीत, जब बाजार 'रिस्क-ऑफ' मोड में आता है, तो प्रतिभागी सतर्कता बरतते हुए सुरक्षित निवेश विकल्पों का रुख करते हैं, जहां प्रतिफल भले ही सीमित हो, लेकिन पूंजी के डूबने की आशंका न्यूनतम रहती है।
सकारात्मक विकास परिदृश्य के दौरान यानी 'रिस्क-ऑन' दौर में आमतौर पर शेयर बाजारों में मजबूती देखी जाती है। इस अवधि में सोने को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख जिंसों या कमोडिटी की कीमतों में उछाल आता है। कच्चे माल का बड़े पैमाने पर निर्यात करने वाले देशों की मुद्राएं भी मांग बढ़ने से मजबूत होती हैं, जबकि डिजिटल संपत्तियां जैसे क्रिप्टोकरेंसी भी तेज उछाल दर्ज करती हैं। इसके बिल्कुल उलट, 'रिस्क-ऑफ' के माहौल में सरकारी बॉन्ड की मांग बढ़ जाती है, सोना चमकने लगता है, और पारंपरिक सुरक्षित ठिकाना मानी जाने वाली मुद्राएं जैसे अमेरिकी डॉलर, जापानी येन और स्विस फ्रैंक भारी खरीदारी आकर्षित करती हैं।
कमोडिटी मुद्राओं पर दबाव और सुरक्षित निवेश की मांग
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय बाजार में यह आर्थिक विभाजन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था गति पकड़ती है और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD), कनाडाई डॉलर (CAD), न्यूजीलैंड डॉलर (NZD), रूसी रूबल (RUB) और दक्षिण अफ्रीकी रैंड (ZAR) जैसी मुद्राएं बढ़त हासिल करती हैं। इन अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर प्राकृतिक संसाधनों और कच्चे माल के निर्यात पर काफी हद तक निर्भर करती है, जिसके चलते निवेशक भविष्य में उच्च औद्योगिक खपत का अनुमान लगाकर इन मुद्राओं में निवेश बढ़ाते हैं।
दूसरी ओर, संकट या अनिश्चितता के दौर में दुनिया का भरोसा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर टिक जाता है। अमेरिकी डॉलर को वैश्विक आरक्षित मुद्रा का दर्जा प्राप्त है। उथल-पुथल के समय निवेशक अमेरिकी सरकारी ऋण पत्र खरीदते हैं क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था द्वारा अपने ऋण दायित्वों में चूक करने की संभावना नगण्य मानी जाती है। जापानी येन में स्थिरता इसलिए बनी रहती है क्योंकि जापानी सरकारी बॉन्ड का एक बहुत बड़ा हिस्सा घरेलू निवेशकों के पास है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी घबराकर बिकवाली नहीं करते। वहीं, स्विट्जरलैंड के सख्त बैंकिंग कानून और मजबूत पूंजी संरक्षण नीतियां स्विस फ्रैंक को निवेशकों के लिए सुरक्षित ढाल बनाती हैं। डिजिटल उद्यम से जुड़ी लाललित श्रीजनदोर्न, जो पेरिस और बैंकॉक दोनों जगह काम करती हैं और 2019 से फ्रांस में रह रही हैं, जैसे वैश्विक उद्यमियों के लिए भी मुद्राओं का यह उतार-चढ़ाव कारोबारी योजना का हिस्सा बन चुका है।
मुद्रा बाजारों में हलचल: AUD/USD और USD/JPY के ताजा स्तर
मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में मुद्रा बाजार में भारी उठापटक जारी है। एशियाई कारोबारी सत्र की शुरुआत से पहले ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) दबाव में बना हुआ है और 0.6900 के स्तर के पास तीन महीने के निचले स्तर से उबरने की कोशिश कर रहा है। डॉलर इंडेक्स में आई जोरदार मजबूती और जोखिम से जुड़ी संपत्तियों पर लगातार जारी बिकवाली के दबाव ने इस जोड़ी की साप्ताहिक गिरावट को और तीव्र कर दिया है।
दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा (USD/JPY) एशियाई सत्र के दौरान 158.00 के स्तर से ऊपर अपनी साप्ताहिक सीमा के ऊपरी छोर पर टिकी हुई है। अमेरिका में हालिया पीसीई मुद्रास्फीति के आंकड़े अपेक्षाकृत नरम रहने के बावजूद, कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े महंगाई के जोखिमों ने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब बनाए रखा है। इसके अतिरिक्त, वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव अमेरिकी डॉलर की सुरक्षित निवेश मांग को मजबूती दे रहा है। डॉलर की यह व्यापक तेजी बैंक ऑफ जापान की नीतिगत सख्ती की उम्मीदों और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों को पीछे छोड़ रही है।
सोने की दिशाहीन चाल और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों पर दृष्टिकोण
कीमती धातुओं के बाजार में सोना फिलहाल किसी स्पष्ट दिशा के बिना संघर्ष कर रहा है और प्रति ट्रॉय औंस 4,200 डॉलर के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे बना हुआ है। सर्राफा बाजार में यह अनिश्चितता एक तरफ अमेरिकी डॉलर की मजबूत चाल और दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में बने लगातार भू-राजनीतिक तनाव के दोहरे प्रभाव के कारण देखी जा रही है। एक तरफ डॉलर की मजबूती सोने की बढ़त को सीमित करती है, तो दूसरी तरफ युद्ध के हालात इसे गहरा गिरने से बचा रहे हैं।
इस बीच, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर बाजार की उम्मीदों में भी बड़ा बदलाव आया है। कुछ ही दिन पहले तक ज्यादातर कारोबारी यह मानकर चल रहे थे कि अक्टूबर की बैठक में फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला कर सकता है। हालांकि, हाल में सामने आए नरम महंगाई आंकड़ों और केंद्रीय बैंक के नीति निर्माताओं की सतर्क टिप्पणियों के बाद धारणा पूरी तरह बदल चुकी है। अब बाजार का प्रबल अनुमान यही है कि फेडरल रिजर्व आगामी बैठक में ब्याज दरों में किसी भी बदलाव से बचते हुए ठहराव की नीति अपनाएगा।















