जापान की राजधानी टोक्यो के ताजा महंगाई आंकड़ों ने वित्तीय बाजारों में नई हलचल पैदा कर दी है। आधिकारिक सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने के लिए टोक्यो का हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई सालाना आधार पर 2.7 प्रतिशत दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा पिछले महीने दर्ज की गई 1.9 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की तुलना में उल्लेखनीय तेजी को दर्शाता है। टोक्यो क्षेत्र के मुद्रास्फीति के आंकड़े पारंपरिक रूप से पूरे देश के राष्ट्रीय रुझान का एक अग्रिम संकेतक माने जाते हैं, इसलिए नीति निर्माता और विदेशी मुद्रा व्यापारी इन नंबरों को अत्यधिक संवेदनशीलता से परख रहे हैं।
ताजा आंकड़े और कोर महंगाई के विभिन्न पैमाने
सितंबर के इस रिपोर्ट कार्ड में सभी प्रमुख श्रेणियों में मूल्य वृद्धि की रफ्तार तेज हुई है। ताजा खाद्य पदार्थों की कीमतों को अलग रखकर देखे जाने वाले टोक्यो कोर सीपीआई में सालाना आधार पर 2.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह स्तर बाजार विश्लेषकों के 2.4 प्रतिशत के अनुमान से कहीं अधिक है और पिछले महीने के 1.8 प्रतिशत के स्तर से काफी आगे निकल चुका है। अस्थिर घटकों को हटाकर देखने पर कीमतों पर वास्तविक दबाव का पता चलता है, और इस श्रेणी में आई तेजी यह स्पष्ट संकेत देती है कि बुनियादी स्तर पर उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं।
इसके अलावा, नीतिगत निर्णयों के लिहाज से और भी गहरे माने जाने वाले तीसरे पैमाने यानी ताजा भोजन और ऊर्जा दोनों घटकों को हटाकर आंके जाने वाले टोक्यो सीपीआई में भी बड़ा उछाल आया है। यह सूचकांक सितंबर में सालाना आधार पर 3.0 प्रतिशत पर पहुंच गया, जबकि इसके ठीक पहले के महीने में यह आंकड़ा 2.0 प्रतिशत पर टिका हुआ था। इस श्रेणी में आई 1.0 प्रतिशत की सीधी छलांग यह साबित करती है कि जापानी अर्थव्यवस्था में सेवा और गैर-ऊर्जा विनिर्मित उत्पादों की लागत में लगातार इजाफा हो रहा है, जो लंबे समय तक टिकने वाली महंगाई का ठोस प्रमाण है।
मुद्रा बाजार की प्रतिक्रिया और विनिमय दर का रुख
टोक्यो के इन अप्रत्याशित महंगाई आंकड़ों के सामने आने के तुरंत बाद विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में जापानी येन को खरीदारों का समर्थन प्राप्त हुआ। मुद्रास्फीति की यह रिपोर्ट सामने आने के साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी मुद्रा में सक्रियता बढ़ गई। रिपोर्टिंग के समय अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की विनिमय दर यानी यूएसडी और जेपीवाई की जोड़ी 0.28 प्रतिशत की दैनिक बढ़त के साथ 157.85 के स्तर पर कारोबार करती देखी गई। हालांकि व्यापक डॉलर की ताकत के कारण जोड़ी का समग्र स्तर ऊंचा बना हुआ है, लेकिन जापानी येन में घरेलू आधार पर नई मजबूती का प्रवाह देखा जा रहा है।
एशियाई कारोबारी सत्र में डॉलर और येन का विनिमय दायरा अपने साप्ताहिक उच्च स्तरों पर 158.00 के पार बना रहा। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तरों के निकट टिकी हुई है, जिसका मुख्य कारण कच्चे तेल से जुड़े मुद्रास्फीति जोखिम हैं, भले ही हालिया अमेरिकी व्यक्तिगत उपभोग व्यय यानी पीसीई डेटा कुछ नरम रहा हो। साथ ही, अमेरिका और ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग को मजबूत बनाए हुए है। इस व्यापक डॉलर की मजबूती ने बैंक ऑफ जापान द्वारा नीतिगत सख्ती की संभावनाओं और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों के असर को काफी हद तक संतुलित कर रखा है।
मुद्रास्फीति और केंद्रीय बैंक की ब्याज दर प्रणाली
मुद्रास्फीति मूल रूप से वस्तुओं और सेवाओं की एक प्रतिनिधि टोकरी यानी बास्केट के औसत मूल्यों में होने वाले बदलाव को मापती है। हेडलाइन महंगाई दर को सामान्यतः महीने-दर-महीने और साल-दर-साल प्रतिशत परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दूसरी तरफ, कोर महंगाई दर में भोजन और ईंधन जैसे अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले घटकों को बाहर रखा जाता है। ईंधन और भोजन की कीमतें भू-राजनीतिक परिस्थितियों और मौसमी कारणों से बहुत तेजी से ऊपर-नीचे होती हैं, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक तस्वीर धुंधली हो सकती है। यही कारण है कि अर्थशास्त्री और केंद्रीय बैंक मुख्य रूप से कोर महंगाई दर पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, क्योंकि केंद्रीय बैंकों का प्राथमिक दायित्व कीमतों को एक प्रबंधनीय सीमा, आमतौर पर 2 प्रतिशत के आसपास बनाए रखना होता है।
जब किसी देश का कोर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक केंद्रीय बैंक के निर्धारित 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बना रहता है, तो केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि का सहारा लेते हैं। इसके विपरीत, जब महंगाई दर 2 प्रतिशत से नीचे गिरती है, तो आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जाती है। चूंकि उच्च ब्याज दरें वैश्विक पूंजी को आकर्षित करती हैं, इसलिए बढ़ती हुई महंगाई सामान्यतः उस देश की मुद्रा को मजबूती प्रदान करती है। इस वित्तीय तंत्र के तहत जब किसी देश में मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो निवेशक बेहतर रिटर्न की उम्मीद में वहां अपनी पूंजी जमा करते हैं, जिससे उस मुद्रा की विनिमय दर में सुधार दर्ज होता है।
सोने के सुरक्षित निवेश व्यवहार पर ब्याज दरों का प्रभाव
वित्तीय इतिहास में सोने को पारंपरिक रूप से उच्च मुद्रास्फीति के दौर में पूंजी के मूल्य की रक्षा करने वाले एक सुरक्षित साधन के रूप में देखा जाता रहा है। आज भी अत्यधिक बाजार उथल-पुथल या संकट के समय निवेशक सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर सोना खरीदना पसंद करते हैं, लेकिन सामान्य आर्थिक चक्रों में स्थिति बिल्कुल अलग रहती है। जब महंगाई बढ़ती है और केंद्रीय बैंक दरों में वृद्धि करते हैं, तो सोने की चमक फीकी पड़ने लगती है। बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों जैसे सोने को अपने पास रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है, क्योंकि निवेशक अपना पैसा ब्याज देने वाले नकद खातों या सरकारी प्रतिभूतियों में लगाना अधिक लाभदायक मानते हैं। इसके उलट, जब महंगाई घटती है और ब्याज दरें नीचे आती हैं, तब सोना एक आकर्षक विकल्प बन जाता है।
वैश्विक कमोडिटी बाजार में सोने का कारोबार गुरुवार को बिना किसी स्पष्ट दिशा के देखा गया और पीली धातु प्रति ट्रॉय औंस 4,200 डॉलर के प्रमुख स्तर से नीचे सीमित दायरे में घूमती रही। अमेरिकी डॉलर की तेज मजबूती और पश्चिम एशिया के संघर्ष में जारी तनाव के बीच सोने के मूल्य में यह दुविधापूर्ण उतार-चढ़ाव बना हुआ है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर यानी एयूडी और यूएसडी की जोड़ी एशियाई बाजार खुलने से पहले 0.6900 के तीन महीने के निचले स्तर से थोड़ा संभलने के बावजूद काफी हद तक दबाव में नजर आई। अमेरिकी डॉलर के उभार और जोखिम-संवेदनशील संपत्तियों पर भारी बिकवाली ने ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा के साप्ताहिक गिरावट के रुख को और तेज कर दिया है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख में बाजार का बदलाव
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर वित्तीय बाजारों की धारणा में हाल ही में बहुत तेजी से बदलाव आया है। अभी एक सप्ताह पहले तक वैश्विक निवेशक इस बात की सबसे अधिक संभावना मान रहे थे कि फेडरल रिजर्व अक्टूबर की अपनी बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा। हालांकि, हाल के दिनों में महंगाई के अपेक्षाकृत नरम आंकड़ों और नीति निर्माताओं की सतर्क टिप्पणियों के बाद बाजार का समीकरण पूरी तरह बदल गया है। अब दर वृद्धि की जगह मौजूदा दरों पर विराम लगाने की संभावना सबसे प्रमुख परिदृश्य बन चुकी है, जिससे आगामी नीतिगत बैठकों को लेकर सभी परिसंपत्ति वर्गों में सतर्कता का माहौल है।















