भारतीय शेयर बाजार में दो महीने तक मजबूत लिवाली दर्ज कराने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक एक बार फिर बड़े पैमाने पर बिकवाल बन गए हैं। सितंबर के महीने में विदेशी निवेशकों ने घरेलू इक्विटी बाजार से शुद्ध रूप से 35,860 करोड़ रुपये के शेयर बेचकर अपनी पूंजी बाहर निकाली। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि बिकवाली का यह दबाव नए महीने की शुरुआत में भी थमा नहीं, जहां 1 अक्टूबर के अकेले कारोबारी दिन में ही विदेशी निवेशकों ने बाजार से 9,232 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेच डाले।
चालू वर्ष में कुल निकासी 2.7 लाख करोड़ रुपये के पार
इस ताजा निकासी से पहले विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार के प्रति काफी सकारात्मक दिखाई दे रहा था। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने जुलाई के दौरान घरेलू बाजार में 20,200 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया था, जबकि अगस्त में यह खरीदारी और बढ़कर 29,630 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। हालांकि सितंबर में हुई इस भारी बिकवाली के बाद वर्ष 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय इक्विटी से की गई कुल पूंजी निकासी लगभग 2.7 लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर चुकी है। यह आंकड़ा पूरे 2025 में दर्ज की गई 1.66 लाख करोड़ रुपये की कुल निकासी की तुलना में काफी अधिक है, जो विदेशी पूंजी के बड़े बहिर्वाह को रेखांकित करता है।
विदेशी पूंजी की निकासी के मुख्य कारण
बाजार के जानकारों का मानना है कि विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालना किसी आंतरिक कमजोरी की वजह से नहीं है। अल्फा एएमसी के फंड्स मैनेजर और सीईओ राजेश सिंगला ने इस बात पर जोर दिया कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक मुख्य रूप से बाहरी और वैश्विक परिस्थितियों के कारण अपनी पूंजी समेट रहे हैं। इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई भू-राजनीतिक चिंताओं के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की घटती कीमत, जुलाई और अगस्त की तेजी के बाद निवेशकों की मुनाफावसूली, तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उत्तर एशियाई बाजारों की ओर वैश्विक पूंजी का ट्रांसफर होना शामिल है।
घरेलू एसआईपी निवेश और छोटे शेयरों को सहारा
पूंजी के इस बहिर्वाह का विश्लेषण करते हुए राजेश सिंगला ने कहा, "ये वैश्विक स्तर पर पूंजी के आवंटन का मामला है, घरेलू कंपनियों की कमाई का नहीं।" उन्होंने रेखांकित किया कि रिटेल निवेशकों की ओर से व्यवस्थित निवेश योजनाओं यानी एसआईपी के माध्यम से हर महीने आने वाली मजबूत पूंजी इस विदेशी बिकवाली के नकारात्मक प्रभाव को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसके साथ ही, लघु और मझोले उद्यम (एसएमई) और स्मॉल कैप सेगमेंट में विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत काफी सीमित है। इसी वजह से व्यापक बिकवाली के दौर में भी छोटे शेयरों वाले इस सेगमेंट पर विदेशी निकासी का तुलनात्मक असर काफी कम देखने को मिला है।
आगे की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक
बाजार विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले हफ्तों में विदेशी निवेशकों की रणनीति मुख्य रूप से ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव तथा इसके चलते वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने वाले असर से तय होगी। जानकारों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यील्ड मजबूत रहती है, तो भारतीय शेयरों और विदेशी पूंजी प्रवाह पर निरंतर दबाव बना रह सकता है। वर्तमान में अमेरिका के 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड का प्रतिफल लगभग 5 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। हालांकि, सकारात्मक पक्ष यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित रफ्तार और घरेलू कंपनियों के मुनाफे में ठोस विस्तार की संभावनाएं बाजार को बुनियादी स्तर पर सहारा प्रदान कर रही हैं।

















