घरेलू शेयर बाजारों में हाल के दिनों में जारी तेज बिकवाली ने आम निवेशकों से लेकर बाजार विश्लेषकों तक सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सरकार की ओर से 7.8 प्रतिशत की मजबूत विकास दर दर्ज किए जाने के बावजूद स्टॉक एक्सचेंज लगातार लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं। आम तौर पर जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में इतनी रफ्तार दर्ज की जाती है, तो कंपनियों के कारोबारी मुनाफे में विस्तार की उम्मीद स्वाभाविक होती है, जिससे शेयरों के दाम चढ़ने चाहिए। लेकिन दलाल स्ट्रीट का रुख इसके ठीक उलट नजर आ रहा है। पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध का तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य गलियारा खुलने और बंद होने को लेकर बनी अनिश्चितता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें तथा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की नरमी जैसे कई कारक बाजार के माहौल को असहज कर रहे हैं। इन सबके बीच एक ऐसा बड़ा तकनीकी कारक उभरकर सामने आया है जिसकी चर्चा अब सबसे ज्यादा हो रही है, और वह है अमेरिका के सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला बढ़ता ब्याज यानी अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में लगातार होता इजाफा।
मांग और आपूर्ति का सीधा नियम और शेयरों पर बिकवाली का असर
शेयर बाजार का बुनियादी ढांचा किसी भी सामान्य कमोडिटी या उत्पाद बाजार की तरह ही मांग और आपूर्ति के संतुलन पर काम करता है। जब किसी वस्तु या शेयर के खरीदार ज्यादा होते हैं और उसे बेचने वालों की संख्या सीमित होती है, तो बाजार में उस उत्पाद की किल्लत पैदा होती है। खरीदार उसे हासिल करने के लिए ऊंची बोली लगाने को तैयार रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भाव ऊपर चले जाते हैं। इसके विपरीत, जब बिकवाली करने वाले लोग जरूरत से ज्यादा हो जाते हैं और लिवाली करने वाले हाथ पीछे खींच लेते हैं, तो मांग घट जाती है। ऐसी स्थिति में विक्रेताओं को अपने शेयर सस्ते दामों पर बेचने पड़ते हैं और कीमतों में गिरावट का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस समय भारतीय शेयर बाजार में ठीक यही स्थिति देखने को मिल रही है, जहां बिकवाली का दबाव खरीद के मुकाबले कहीं ज्यादा भारी पड़ रहा है।
बाजार में इस भारी बिकवाली का मुख्य स्रोत विदेशी संस्थागत निवेशक हैं। विदेशी निवेशक भारतीय कॉरपोरेट कंपनियों के शेयरों में बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली या बिकवाली करके अपनी पूंजी देश से बाहर ले जा रहे हैं। घरेलू स्तर पर भले ही आर्थिक वृद्धि का आंकड़ा 7.8 प्रतिशत बताया गया हो, लेकिन विदेशी फंड प्रबंधकों की रणनीति वैश्विक स्तर पर जोखिम और रिटर्न के संतुलन पर टिकी होती है। सवाल यह उठता है कि क्या विदेशी निवेशकों को भारतीय कंपनियों के मुनाफे की निरंतरता पर संदेह है, या फिर वैश्विक वित्तीय परिदृश्य में कोई ऐसा सुरक्षित और आकर्षक विकल्प तैयार हो गया है जो भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी को अपनी ओर खींच रहा है।
बॉन्ड का बुनियादी ढांचा और सरकारी उधारी का तंत्र
इस पूरे मामले की तह तक पहुंचने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि बॉन्ड क्या होता है और अंतरराष्ट्रीय वित्त में इसका क्या महत्व है। आसान शब्दों में समझें तो बॉन्ड एक प्रकार की उधारी की रसीद या औपचारिक कर्ज पत्र होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को दस हजार रुपये उधार देता है, और कर्ज लेने वाला एक कागज पर लिखित रूप से यह दर्ज करता है कि उसने इतने पैसे लिए हैं, वह इन्हें दो साल बाद लौटा देगा तथा हर साल उस पर एक निश्चित ब्याज भी चुकाएगा, तो वह दस्तावेज ही बॉन्ड का काम करता है। यह पत्र इस बात का पुख्ता प्रमाण होता है कि वास्तविक लेन-देन हुआ है और कर्जदाता को नियमित ब्याज के साथ मूलधन की गारंटी दी गई है। एक सामान्य निजी कर्ज समझौते और वित्तीय बाजार के बॉन्ड में मुख्य अंतर यह होता है कि इस रसीद को द्वितीयक बाजार में किसी अन्य तीसरे पक्ष को खरीदा या बेचा जा सकता है।
जब यही बॉन्ड किसी संप्रभु सरकार द्वारा जारी किया जाता है, तो उसकी विश्वसनीयता और साख कई गुना बढ़ जाती है। सरकारी बॉन्ड का सीधा मतलब यह है कि देश की सरकार स्वयं अपने नागरिकों, वित्तीय संस्थानों या अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से धन उधार ले रही है और बदले में एक निश्चित ब्याज देने का कानूनी वादा कर रही है। जब कर्ज लेने वाली सत्ता संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार हो, तो वैश्विक वित्तीय तंत्र में इसे सबसे पक्की और जोखिम-रहित प्रतिभूति माना जाता है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को दुनिया का सबसे सुरक्षित वित्तीय साधन माना जाता है क्योंकि वहां डिफॉल्ट यानी कर्ज डूबने का जोखिम नगण्य माना जाता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी का भारतीय शेयरों पर असर
जब वित्तीय विश्लेषक यह कहते हैं कि अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है या बॉन्ड पर ब्याज ज्यादा हो गया है, तो इसका अर्थ यह होता है कि अमेरिकी सरकार को उधार देने पर निवेशकों को पहले की तुलना में अधिक रिटर्न मिल रहा है। खुले बाजार में इन बॉन्डों की खरीद-फरोख्त रोज होती है और मांग के आधार पर इनका बाजार मूल्य लगातार घटता-बढ़ता रहता है, जबकि मूल समझौते में तय की गई उधारी राशि और कूपन ब्याज दर कागज पर यथावत रहती है। जिस निवेशक के पास अमेरिकी सरकार की यह कर्ज रसीद होती है, वह मांग और आपूर्ति के आधार पर उसे दूसरे को बेच सकता है।
जब अमेरिका की सरकार अपना प्रशासनिक खर्च चलाने या पुराने कर्जों के पुनर्वित्तपोषण के लिए नए बॉन्ड पेश करती है और उन पर निवेशकों को मिलने वाला प्रतिफल बढ़ जाता है, तो दुनिया भर की बड़ी वित्तीय कंपनियों के लिए गणित बदल जाता है। वैश्विक निवेशक हमेशा जोखिम और लाभ की तुलना करते हैं। शेयर बाजार में निवेश पर मुनाफा असीमित हो सकता है, लेकिन वहां कंपनियों के मुनाफे घटने, मंदी आने या भू-राजनीतिक तनाव से पूंजी डूबने का भारी जोखिम रहता है। दूसरी ओर, जब दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था की सरकार अपने बॉन्ड पर आकर्षक ब्याज देने लगती है, तो वैश्विक फंड मैनेजरों को बिना किसी जोखिम के गारंटीड कमाई दिखने लगती है। नतीजतन, विदेशी निवेशक भारत जैसे विकासशील बाजारों के जोखिम भरे शेयरों को बेचकर अपनी नकदी समेटते हैं और उसे अमेरिकी बॉन्ड में सुरक्षित मुनाफे के लिए ट्रांसफर करने लगते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में तेजी आते ही भारतीय इक्विटी बाजारों में बिकवाली का दौर शुरू हो जाता है।



















