शिलोंग में एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले के तहत मेघालय उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि जिला अधिकारी कानून व्यवस्था की अपनी शक्तियों की आड़ में किसी भी धार्मिक संप्रदाय के आंतरिक मामलों और उनके धार्मिक अधिकारों के दावों का फैसला नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति एच एस थांगखिएव ने यह टिप्पणी मावखर प्रेस्बिटेरियन चर्च द्वारा दायर की गई एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दी। अदालत ने इस मामले में आंशिक रूप से फैसला सुनाते हुए ईस्ट खासी हिल्स के उपायुक्त द्वारा जारी किए गए कई ऐसे निर्देशों को रद्द कर दिया, जिनके माध्यम से चर्च की धार्मिक और प्रशासनिक गतिविधियों पर पाबंदियां लगाई गई थीं।
आंतरिक विवाद और वित्तीय अनिमितताएं
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2019 के दौरान सामने आईं वित्तीय गड़बड़ियों में जुड़ी हुई हैं। अदालत के फैसले के अनुसार, शुरुआत में लगभग 2 करोड़ 86 लाख रुपये का एक अस्पष्ट घाटा सामने आया था, जबकि इसके बाद हुई एक ऑडिट में करीब 4 करोड़ 65 लाख रुपये के गबन का आरोप लगाया गया। इस मामले में 3 अगस्त 2019 को लगभग 3 करोड़ 26 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा एक एफआईआर भी दर्ज किया गया था। समय के साथ यह मामला और गहरा गया और पादरी रेवरेंड एम पाइनग्रोप के निलंबन व निष्कासन के साथ-साथ खासी जयंतिया प्रेस्बिटेरियन सिनॉड सेपनगी के साथ चर्च के संबंधों को लेकर खींचतान शुरू हो गई।
सिनॉड से अलगाव और प्रशासनिक प्रतिबंध
घटनाक्रम आगे बढ़ते हुए 1 फरवरी 2026 को चर्च की मंडली ने सिनॉड सेपनगी से अलग होने का एक प्रस्ताव पास किया। इस कदम के बाद चर्च के प्रबंधन को लेकर विरोधी गुटों के बीच तीखे दावे सामने आए और यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या केजेपी सिनॉड मिहंगी वहां अपनी पास्टरल सेवाएं जारी रख सकती है या नहीं। विभिन्न गुटों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें और जवाबी शिकायतें दर्ज कराने के साथ-साथ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू कर दी गई। इसके बाद जिला प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर चर्च परिसर, स्कूलों और हॉलों में होने वाली बैठकों व गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
उपायुक्त के आदेश और अदालत की सीमाएं
प्रशासनिक स्तर पर 19 जून को उपायुक्त ने केजेपी सिनॉड मिहंगी को निर्देश दिया कि वह चर्च में पास्टरल देखभाल देना और संस्कार संपन्न कराना बंद कर दे। यह आदेश प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया के भीतर धार्मिक क्षेत्राधिकार से जुड़ी स्पष्टीकरणों पर आधारित था। हालांकि उच्च न्यायालय ने यह पाया कि उपायुक्त ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन करते हुए यह तय करने का प्रयास किया कि किस सिनॉड का चर्च पर धार्मिक अधिकार बनता है। अदालत ने कहा कि प्रशासन केवल प्रेस्बिटेरियन चर्च के आंतरिक संविधान का हवाला देकर यह फैसला नहीं दे सकता कि किसका अधिकार क्षेत्र वैध है।
न्यायालय का अंतिम निर्णय और निर्देश
इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने 13 मई के शो-कॉज नोटिस और 19 जून को जारी किए गए दो आदेशों को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके अलावा 8 मई के संचार के कुछ हिस्सों और 12 मार्च को जारी किए गए उन निर्देशों को भी दरकिनार कर दिया गया, जिनके तहत चर्च के आंतरिक कामकाज और प्रशासन पर अनिश्चितकालीन या पूर्ण प्रतिबंध लगा दिए गए थे। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके इस फैसले से 1 फरवरी के प्रस्ताव की वैधता तय नहीं होती और न ही पादरियों व पदाधिकारियों की नियुक्ति या निष्कासन से जुड़े सवालों का समाधान होता है। अदालत ने सभी पक्षों को यह छूट दी है कि वे अपने दावों को आगे बढ़ाने के लिए उचित धार्मिक, दीवानी या वैधानिक मंचों का रुख कर सकते हैं, जबकि जिला प्रशासन को सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए कानूनन जरूरी कदम उठाने की छूट बरकरार रखी गई है।


















