शिलोंग में स्थित कॉन्फेडरेशन ऑफ मेघालय सोशल ऑर्गेनाइजेशंस यानी सीओएमएसओ ने केंद्र सरकार से यह साफ करने को कहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए शासित राज्यों में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी के दायरे में मेघालय को भी शामिल किया जाएगा। संगठन ने इस मामले में राज्य की ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल्स और आदिवासी समुदायों के साथ आधिकारिक बातचीत शुरू करने की पुरजोर मांग उठाई है।
केंद्रीय गृह मंत्री को सौंपा गया ज्ञापन
संगठन के पदाधिकारियों ने 15 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया है कि यूसीसी से जुड़ा कोई भी कदम उठाने से पहले मेघालय के संवैधानिक ढांचे, खासकर संविधान के अनुच्छेद 244(2) और छठी अनुसूची के प्रावधानों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना चाहिए। संगठन का मानना है कि इस तरह के नीतिगत बदलावों से क्षेत्रीय विशिष्टताओं पर गहरा असर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री को भी दी गई जानकारी
इस सिलसिले में संगठन ने मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा को भी ज्ञापन की प्रति भेजी है। राज्य सरकार से अनुरोध किया गया है कि वह इन गंभीर चिंताओं को केंद्र के समक्ष मजबूती से रखे और तीनों स्वायत्त जिला परिषदों तथा पारंपरिक संस्थाओं के साथ तत्काल परामर्श प्रक्रिया शुरू करे ताकि स्थानीय हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
अमित शाह के बयान के बाद उठी प्रतिक्रिया
यह पूरा घटनाक्रम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के ठीक बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने 13 सितंबर को यह विश्वास जताया था कि वर्ष 2029 से पहले बीजेपी समर्थित एनडीए वाले सभी 21 राज्यों में यूसीसी को सफलतापूर्वक लागू कर दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद से ही पूर्वोत्तर के इस राज्य के मूल निवासी समुदायों के बीच आशंकाएं और चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
संवैधानिक प्रावधानों का दिया गया हवाला
संगठन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मेघालय की संवैधानिक व्यवस्था यहाँ की स्वायत्त जिला परिषदों को पारंपरिक जीवन से जुड़े कई अहम मामलों में कानून बनाने की विशेष शक्तियां देती है। छठी अनुसूची में संपत्ति की पैतृक विरासत, विवाह, तलाक और पारंपरिक सामाजिक रीति-रिवाजों जैसे विषयों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है जिन पर जिला परिषदें अपने अधिकार के तहत निर्णय लेती हैं।
स्वायत्त जिला परिषदों के अधिकारों का सवाल
सीओएमएसओ की ओर से कहा गया कि यदि किसी एक समान पर्सनल लॉ व्यवस्था को मेघालय पर थोपने का कोई भी प्रयास होता है, तो सबसे पहले स्वायत्त जिला परिषदों की शक्तियों और उनके संवैधानिक संरक्षण से जुड़े एक बुनियादी सवाल का जवाब देना होगा। संगठन का तर्क है कि एकरूपता और समानता दोनों अलग चीजें हैं और दोनों को एक ही मानकर नहीं चलना चाहिए।
छठी अनुसूची की धारा 12ए का उल्लेख
संगठन ने संविधान की छठी अनुसूची के पैराग्राफ 12ए की ओर भी विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है। यह प्रावधान मेघालय के स्वायत्त जिलों और क्षेत्रों में संसद तथा राज्य के कानूनों के लागू होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। इसके तहत देश के राष्ट्रपति आधिकारिक अधिसूचना के जरिए यह निर्देश दे सकते हैं कि संसद का कोई अधिनियम राज्य के किसी स्वायत्त क्षेत्र में लागू नहीं होगा या फिर कुछ विशेष छूट और संशोधनों के साथ ही लागू किया जाएगा।
पारंपरिक व्यवस्थाओं और मातृसत्तात्मक ढांचे की रक्षा
मेघालय में खासी, जयंतिया और गारो समुदायों की अपनी अनूठी प्रथाएं हैं और यहाँ का सामाजिक ढांचा मातृसत्तात्मक है। इसका सीधा असर विवाह, उत्तराधिकार, पारिवारिक संपत्ति और वंशीय परंपराओं पर पड़ता है। संगठन ने मांग की है कि इन सभी सांस्कृतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही कोई कदम उठाया जाना चाहिए।
व्यापक परामर्श और समीक्षा समिति की मांग
सीओएमएसओ ने खासी हिल्स, जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स की स्वायत्त जिला परिषदों, राज्य सरकार, पारंपरिक संस्थानों, दरबार श्नोंग और अन्य सभी संबंधित पक्षों के बीच गहन चर्चा की मांग की है। साथ ही एक विशेष मेघालय संवैधानिक और कस्टमरी लॉ रिव्यू कमेटी के गठन की भी वकालत की गई है ताकि यूसीसी के संभावित प्रभावों की गहरी समीक्षा की जा सके।
नेतृत्व और हस्ताक्षरकर्ता
संगठन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस संवेदनशील मामले में मेघालय को महज़ एक आम राज्य की तरह नहीं देखा जा सकता। इस ज्ञापन पर सीओएमएसओ के चेयरमैन रॉय कुपार सिन्रेम और जनरल সেক্রেটারি बाल्कारिन सीएच मारक के हस्ताक्षर मौजूद हैं।



















