मेघालय के जंगलों में पाई जाने वाली दुर्लभ जंगली बिल्लियों और शर्मीले स्तनपायी जीवों की मौजूदगी दर्ज करने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया है। राज्य का वन और पर्यावरण विभाग तथा ग्लोबल टाइगर फोरम मिलकर 161 कैमरा ट्रैप और फील्ड सर्वे के जरिए इस इन-सीटू संरक्षण पहल को आगे बढ़ा रहे हैं। इस संयुक्त अभियान का औपचारिक नाम "स्ट्रेंथनिंग इन-सीटू कंजर्वेशन ऑफ स्मॉल कैट्स एंड अदर इल्यूसिव मैमल्स इन द स्टेट ऑफ मेघालय" रखा गया है।
परियोजना का उद्देश्य और संरक्षण एटलस
इस पूरे अध्ययन का केंद्रीय उद्देश्य राज्य में छोटी जंगली बिल्ली प्रजातियों के फैलाव और उनकी मौजूदा स्थिति का विस्तृत नक्शा तैयार करना है। इसके साथ ही यह समझना भी शामिल है कि विभिन्न प्रजातियां आपस में किस तरह सह-अस्तित्व बनाकर रहती हैं। मैदानी कर्मचारियों और स्थानीय ग्रामीणों के माध्यम से निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है। इन सभी फील्ड सर्वे और निगरानी के नतीजों को आगे चलकर एक राज्य स्तरीय वन्यजीव एटलस और वैज्ञानिक संरक्षण कार्ययोजना का हिस्सा बनाया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार कैमरा ट्रैप उन जीवों के दस्तावेजीकरण का एक पुख्ता वैज्ञानिक जरिया बनते हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर जंगलों में देखना बेहद कठिन होता है। वर्ष 2020-21 में खरीदे गए इन विशेष कैमरों की मदद से पूरे राज्य में इन जीवों की मौजूदगी और भौगोलिक फैलाव का एक ठोस डेटाबेस तैयार किया जा रहा है।
बालपक्रम और दक्षिण गारो हिल्स में मैदानी कार्य
परियोजना के तहत अब तक दक्षिण गारो हिल्स स्थित बालपक्रम राष्ट्रीय उद्यान और उससे सटे सामुदायिक संरक्षित क्षेत्रों में कैमरा ट्रैपिंग का काम पूरा कर लिया गया है। फील्ड टीमों ने केवल कैमरे लगाने तक ही काम सीमित नहीं रखा, बल्कि इलाके में वनस्पति सर्वेक्षण भी किए, जानवरों के मल के नमूने जुटाए और वन्यजीवों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष पदचिह्नों और निशानों को दर्ज किया। यह पहल जंगलों के अलावा इंसानों और वन्यजीवों के आपसी रिश्तों पर भी खास ध्यान दे रही है। बालपक्रम की सीमा से लगे गांवों में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण किए गए, ताकि वहां के परिवारों की जीवनशैली, जंगलों पर उनकी निर्भरता और मानव-वन्यजीव संपर्कों का निष्पक्ष आकलन किया जा सके।
जागरूकता अभियान और मैदानी कर्मियों का प्रशिक्षण
संरक्षण के प्रयासों में स्थानीय लोगों को जोड़ने के लिए दक्षिण गारो हिल्स के कई हिस्सों में जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए, जिनमें गोंगग्रोट गांव और बाघमारा का डॉन बॉस्को हायर सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं। हालिया चरण में, 29 सितंबर को शिलांग में वन विभाग और ग्लोबल टाइगर फोरम द्वारा मैदानी कर्मियों के लिए एक विशेष क्षमता-निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। इस सत्र में कर्मचारियों को कैमरा ट्रैपिंग, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण, जैविक नमूनों का संग्रह, वनस्पतियों व आवास की पहचान और फील्ड डेटा संकलन के व्यावहारिक तरीके सिखाए गए।
एक वन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि फील्ड स्टाफ ही वह पहला माध्यम होता है जो जंगलों में जानवरों के पदचिह्नों और निशानों से रूबरू होता है, इसलिए उनका प्रशिक्षित होना इस डेटाबेस की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। यह परियोजना केवल प्रजातियों की गिनती करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जानना चाहती है कि ये जीव किन आवासों का उपयोग करते हैं और आपस में जगह कैसे साझा करते हैं। इस समझ के आधार पर समुदाय की भागीदारी से वैज्ञानिक संरक्षण योजनाएं बनाई जाएंगी।



















