वाशिंगटन में सीनेट की विदेश संबंध समिति के सदस्य और डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने मिस्र में स्वतंत्र प्रेस पर हालिया कार्रवाई के लिए अमेरिकी सरकार के एक फैसले को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि काहिरा को दी जाने वाली 30 करोड़ डॉलर से अधिक की रक्षा सहायता पर से मानवाधिकार संबंधी पाबंदियां हटाने के निर्णय ने वहां के स्वतंत्र पत्रकारों को भारी संकट में डाल दिया है। मर्फी के अनुसार, इस कदम से ऐसा संकेत गया कि अमेरिका ने मिस्र की जनता और वहां के लोकतांत्रिक मूल्यों का साथ छोड़ दिया है, जिसके तुरंत बाद प्रशासन ने स्वतंत्र मीडिया संस्थानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
बीते एक महीने के भीतर मिस्र में उंगलियों पर गिने जा सकने वाले बचे हुए स्वतंत्र समाचार मंचों के कई पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है। देश के भीतर मुख्यधारा के अखबारों और टेलीविजन चैनलों पर सुरक्षा एजेंसियों का कड़ा नियंत्रण पहले से ही बना हुआ है। ऐसे में स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने वाले गिने-चुने संस्थानों पर कानून का शिकंजा और कस गया है। इस घटनाक्रम के बीच वाशिंगटन स्थित मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मर्फी ने कहा कि रक्षा कोष की मंजूरी और पत्रकारों की गिरफ्तारी के बीच सीधा ताल्लुक है। जैसे ही यह सहायता राशि जारी की गई, वैसे ही बड़े पैमाने पर मीडिया कर्मियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए गए।
मिस्र में पत्रकारों की धरपकड़ और जांच एजेंसियों के आरोप
हालिया कार्रवाइयों के तहत सुरक्षा अधिकारियों ने स्वतंत्र फैक्ट चेकिंग प्लेटफॉर्म 'मत्सदा2श' से जुड़े छह पत्रकारों को गिरफ्तार किया। इन पत्रकारों पर प्रतिबंधित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने और आतंकवाद से जुड़े आरोपों के तहत मामला दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, वाशिंगटन स्थित मिस्र के दूतावास ने इन गिरफ्तारियों और सीनेटर के आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के शासनकाल के दौरान मानवाधिकार संस्थाएं लगातार यातना और जबरन गायब किए जाने जैसी गंभीर ज्यादतियों के आरोप लगाती रही हैं, हालांकि सरकार इन दावों को खारिज करती आई है।
राष्ट्रपति सीसी का कहना है कि उनके देश में कोई राजनीतिक कैदी नहीं है। उनका तर्क रहा है कि राष्ट्रीय स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। इसके साथ ही सरकार यह भी दावा करती है कि नागरिकों को रोजगार, आवास और बुनियादी जरूरतें मुहैया कराकर उनके अधिकारों को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुरक्षा के नाम पर किसी भी तरह के विरोध या असहमति के स्वर को पूरी तरह दबा दिया गया है।
सालाना रक्षा सहायता और मानवाधिकार छूट का गणित
अमेरिका हर साल मिस्र को 1.73 अरब डॉलर (1.3 अरब पाउंड) की भारी सैन्य सहायता भेजता है, जिससे वह वाशिंगटन से रक्षा सहयोग प्राप्त करने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में शुमार है। अमेरिकी संघीय कानून के तहत इस वार्षिक आवंटन में से 32 करोड़ डॉलर (320 मिलियन पाउंड) तक की राशि को तब तक रोका जा सकता है, जब तक कि मिस्र लोकतंत्र और मानवाधिकारों के तय मानकों को पूरा न करे। हालांकि, कानून में यह प्रावधान भी है कि यदि अमेरिकी प्रशासन राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर आवश्यक समझे, तो वह इन शर्तों से छूट दे सकता है।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सितंबर में विभिन्न संसदीय समितियों को भेजे एक पत्र के माध्यम से 32 करोड़ डॉलर की सहायता से मानवाधिकार की शर्तों को हटा दिया था। इस फैसले के पीछे ईरान के साथ अमेरिका के हालिया संघर्ष के बाद मिस्र द्वारा निभाई गई भूमिका को मुख्य कारण बताया गया था। मिस्र ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में सहायता की थी। चार सितंबर के एक आधिकारिक ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के बाद मिस्र के सहयोग को देखते हुए द्विपक्षीय संबंधों के लिए इस छूट का इस्तेमाल बेहद जरूरी था।
विदेश मंत्रालय का रुख और पिछली सरकारों की नीतियां
जब अमेरिकी विदेश मंत्रालय से हालिया गिरफ्तारियों और सहायता जारी करने के संबंध में पूछा गया, तो उसने कहा कि यह छूट अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए मिस्र के महत्व, उसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले ठोस सुरक्षा सहयोग और क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए इस साझेदारी को बनाए रखने की आवश्यकता के कारण दी गई थी। विदेश मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि वह काहिरा के साथ कई मुद्दों पर लगातार संवाद बनाए रखता है, लेकिन निजी राजनयिक बातचीत पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेगा।
यह छूट कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले 2024 में जो बाइडेन प्रशासन के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी मिस्र को मिलने वाले पूरे सैन्य बजट पर से मानवाधिकार शर्तें हटाई थीं। उस समय अमेरिका गाजा युद्ध में इजरायल और हमास के बीच मध्यस्थता के लिए मिस्र के सहयोग पर निर्भर था। हालांकि, 2024 से पहले बाइडेन प्रशासन ने मिस्र के खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड के चलते सहायता राशि के कुछ हिस्सों को रोका भी था। मर्फी, जो मध्य पूर्व और आतंकवाद विरोधी संसदीय समिति के प्रमुख भी हैं, ने स्पष्ट किया कि उन्होंने मानवाधिकारों की अनदेखी के मामले में बाइडेन और ट्रंप दोनों प्रशासनों की कड़ी आलोचना की है।
मर्फी ने कहा कि मिस्र में राजनीतिक अभिव्यक्ति की जो थोड़ी बहुत गुंजाइश बची थी, वह केवल इसलिए खत्म हो गई क्योंकि अमेरिकी सरकार ने वहां के लोगों का साथ छोड़कर वित्तीय मदद पर लगी सभी शर्तें हटाने का फैसला किया। उन्होंने अफसोस जताया कि इस निर्णय ने मिस्र में एक सच्चे और सार्थक राजनीतिक विपक्ष के पुनर्जीवित होने की हर उम्मीद को तोड़कर रख दिया है।
कैंप डेविड समझौते की पृष्ठभूमि और अंतरराष्ट्रीय चिंताएं
काहिरा को अमेरिकी सैन्य सहायता देने की शुरुआत 1978 के कैंप डेविड समझौते और उसके बाद मिस्र एवं इजरायल के बीच हुई शांति संधि के बाद हुई थी। तभी से अमेरिका की लगातार सरकारों ने अरब जगत के सबसे अधिक आबादी वाले इस देश को पश्चिमी एशिया में अपना एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस साझेदारी की कीमत को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'द तहरीर इंस्टीट्यूट फॉर मिडल ईस्ट पॉलिसी' के उप निदेशक टिमोथी ई कलदास के अनुसार, पत्रकार लीना अताल्लाह को दोषी ठहराया जाना और स्वतंत्र मंच 'मदर मसर' को बंद कराया जाना मिस्र में प्रेस की आजादी पर अभूतपूर्व दमन का प्रतीक है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी लीना अताल्लाह के खिलाफ आए फैसले को प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा झटका करार दिया था। कलदास का कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों ही मिस्र में मानवाधिकारों और कानून के शासन पर अपने रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कलदास का मानना है कि अटलांटिक के दोनों किनारों से मिस्र को यह संकेत मिल रहे हैं कि मानवाधिकार और कानून का राज अब पश्चिमी शक्तियों की प्राथमिकता सूची में नहीं हैं। जब सत्ता में बैठे लोगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, तो उन्हें यह गलत संदेश जाता है कि वे बिना किसी परिणाम के स्वतंत्र आवाजों को कुचल सकते हैं। इसी बेपरवाही के चलते आज मिस्र में स्वतंत्र पत्रकारिता अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है।



















