भारत में म्यूचुअल फंड सिप (SIP) के जरिए 1 करोड़ रुपये की बड़ी रकम जुटाना कई निवेशकों का अहम वित्तीय लक्ष्य होता है। जब कोई निवेशक कड़ी मेहनत और अनुशासन से इस मील के पत्थर तक पहुंच जाता है, तब निवेश की पूरी रणनीति बदल जाती है। छोटे पोर्टफोलियो पर बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव को संभालना आसान होता है, लेकिन फंड का आकार जैसे ही 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक होता है, मामूली गिरावट भी भारी नुकसान दे जाती है। ऐसे मोड़ पर सिर्फ नए रिटर्न बनाने के बजाय बने-बनाए फंड की सुरक्षा करना और जोखिम को संतुलित रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाता है।
छोटे और बड़े पोर्टफोलियो में गिरावट का गणित
बाजार के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पोर्टफोलियो के साइज के साथ पूरी तरह बदल जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी निवेशक के पास 10 लाख रुपये का फंड है और बाजार में 10 प्रतिशत की गिरावट आती है, तो कुल नुकसान 1 लाख रुपये का होता है। इस 1 लाख रुपये के घाटे को नियमित मासिक सिप की किस्तों के जरिए अगले कुछ महीनों में आसानी से पाटा जा सकता है। लेकिन जब यही 10 प्रतिशत की गिरावट 1 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो पर आती है, तो एक झटके में पूरे 10 लाख रुपये का नुकसान हो जाता है। इतनी बड़ी रकम की भरपाई केवल नियमित मासिक निवेश से तुरंत करना बेहद कठिन होता है। यही कारण है कि बड़े फंड पर नुकसान की सीमा को थामने यानी ड्रॉडाउन कंट्रोल पर खास ध्यान देने की जरूरत पड़ती है।
एसेट एलोकेशन: स्टॉक चुनने से ज्यादा जरूरी है सही विभाजन
जैनम के रिटेल ब्रोकिंग रिसर्च हेड (एवीपी) हिमांशु गुप्ता के अनुसार, पहले बड़े लक्ष्य को हासिल करने के बाद वेल्थ क्रिएशन का तरीका बदल जाता है। शुरुआत में धन जुटाने की प्रक्रिया संचय यानी एक्युमुलेशन पर टिकी होती है, मगर 1 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करते ही ध्यान पूरी तरह एसेट एलोकेशन पर आ जाता है। बाजार के ऐतिहासिक आंकड़े भी यही साबित करते हैं कि किसी निवेशक को लंबे समय में मिलने वाला वास्तविक रिटर्न इस बात पर निर्भर करता है कि उसका एसेट एलोकेशन कैसा है, न कि इस बात पर कि उसने कौन सा खास शेयर चुना था।
एक संतुलित और व्यावहारिक पोर्टफोलियो तैयार करने के लिए पूंजी को अलग-अलग श्रेणियों में बांटना चाहिए। इसमें इक्विटी सभी मार्केट कैप के जरिए दीर्घकालिक पूंजी वृद्धि में मदद करती है, जबकि डेट फंड पोर्टफोलियो को स्थिरता और लिक्विडिटी प्रदान करते हैं। सोने (गोल्ड) में निवेश घरेलू मुद्रा की कमजोरी और अंतरराष्ट्रीय तनाव के समय पोर्टफोलियो के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। इसके अलावा कई निवेशक अपनी जरूरतों के मुताबिक रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) को भी अपने पोर्टफोलियो में शामिल करते हैं।
उम्र और लक्ष्यों के हिसाब से तैयार करें रणनीति
हर निवेशक के लिए एसेट एलोकेशन का कोई एक तय फॉर्मूला फिट नहीं बैठ सकता। उदाहरण के तौर पर, 35 साल का कोई पेशेवर जिसका करियर स्थिर है, वह अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा ज्यादा रख सकता है क्योंकि उसके पास निवेश की लंबी अवधि बची होती है। इसके विपरीत, 55 वर्ष का कोई निवेशक जो रिटायरमेंट के करीब है, वह बाजार की तेज उठापटक से बचने के लिए कम अस्थिरता वाले विकल्पों यानी डेट को प्राथमिकता देगा। इसलिए पोर्टफोलियो का ढांचा हमेशा व्यक्तिगत वित्तीय लक्ष्यों, समय सीमा और बाजार की मंदी में टिके रहने की क्षमता के आधार पर ही तय होना चाहिए।
पोर्टफोलियो की नियमित रीबैलेंसिंग क्यों है आवश्यक
एसेट एलोकेशन कोई एक बार लिया जाने वाला फैसला नहीं है, बल्कि इसे नियमित रखरखाव की जरूरत होती है। जब शेयर बाजार में जोरदार तेजी आती है, तो आपका मूल 60:40 का इक्विटी और डेट अनुपात अपने आप बढ़कर 75:25 तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में पोर्टफोलियो का जोखिम आपकी मूल योजना से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। इस जोखिम को नियंत्रित करने के लिए साल में एक या दो बार पोर्टफोलियो की समीक्षा करना बेहद फायदेमंद रहता है। जो एसेट क्लास ज्यादा बढ़ गया है उससे मुनाफा काटकर पिछड़े हुए एसेट क्लास में पैसा लगाना ही रीबैलेंसिंग है। हालांकि किसी भी बदलाव से पहले टैक्स की देनदारी और एग्जिट लोड का आकलन जरूर कर लेना चाहिए।
1 करोड़ के बाद सिप की भूमिका और आम गलतियां
बड़ा फंड तैयार होने के बाद भी सिप की उपयोगिता खत्म नहीं होती, बल्कि उसका काम करने का तरीका बदल जाता है। निवेशक अपनी नई मासिक सिप की रकम को उन एसेट क्लास में लगा सकते हैं जिनका हिस्सा लक्ष्य से नीचे आ गया है। इससे मासिक निवेश एक स्थिर रीबैलेंसिंग टूल बन जाता है। इसके साथ ही, आय में बढ़ोतरी के साथ हर साल सिप की रकम को स्टेप-अप करने से लंबी अवधि में महंगाई को मात देने में मदद मिलती है।
दूसरी ओर, कुछ गलत आदतें निवेशकों के रिटर्न को चोट पहुंचा सकती हैं। किसी एक शेयर या सेक्टर में जरूरत से ज्यादा पैसा लगाना भारी जोखिम पैदा करता है। पिछले साल के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले फंडों के पीछे भागना, इमरजेंसी के लिए लिक्विडिटी न रखना, इंश्योरेंस की कमी होना और पोर्टफोलियो को रोज-रोज देखकर घबराहट में गलत फैसले लेना वे गलतियां हैं जिनसे हर हाल में बचना चाहिए। 1 करोड़ रुपये किसी के लिए रिटायरमेंट हो सकता है तो किसी के लिए बच्चों की पढ़ाई या वित्तीय आजादी का माध्यम। वर्ल्ड इन्वेस्टर वीक भी यही संदेश देता है कि जानकारी और अनुशासन पर आधारित फैसले ही निवेशकों को स्थिर लंबी अवधि की वेल्थ बनाने में मदद करते हैं।



















