धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में देवी-देवताओं को चढ़ाए जाने वाले अपराजिता और गुड़हल के फूल अब सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं रहे, बल्कि किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बन रहे हैं। बिहार के भागलपुर के रहने वाले मनीष सिंह ने इन पारंपरिक फूलों के औषधीय गुणों को पहचानकर इनसे खास किस्म की हर्बल चाय तैयार करने की अनूठी पहल शुरू की है। इस नवोन्मेषी प्रयास ने यह साबित कर दिया है कि जिसे अक्सर लोग बाग-बगीचों या जंगलों में उगने वाली साधारण वनस्पति समझ लेते हैं, वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में हजारों रुपये का मूल्य रखती है।
नीली और लाल हर्बल चाय की नई पहचान
मनीष सिंह अपराजिता के नीले फूलों से ब्लू टी और मां दुर्गा की पूजा में प्रमुखता से चढ़ाए जाने वाले गुड़हल यानी अड़हुल के फूलों से रेड टी तैयार कर रहे हैं। जिस तरह लोग अपनी सेहत और ताजगी के लिए ग्रीन टी का सेवन करते हैं, ठीक उसी तरह इन सूखे फूलों को चाय पत्ती के रूप में सीधे पानी में उबालकर या डुबोकर पिया जा सकता है। यह हर्बल पेय न केवल मानसिक तनाव दूर कर मूड को तरोताजा करता है, बल्कि इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में भी मदद करते हैं।
सेमिनार के अनुभवों से मिला व्यवसाय का विचार
इस व्यवसाय की शुरुआत एक खास अनुभव से हुई। मनीष सिंह ने जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई व्यापारिक सेमिनारों में भाग लिया, तो उन्होंने वहां देखा कि विदेशी मेहमानों और स्वास्थ्य प्रेमियों के बीच ब्लू टी और रेड टी की जबरदस्त मांग है। शुरुआत में उन्हें इस पेय के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी, लेकिन जब उन्होंने गहराई से खोजबीन की तो यह तथ्य सामने आया कि जिस ब्लू टी के लिए लोग भारी रकम चुका रहे हैं, वह दरअसल भारत के घरों और जंगलों में स्वतः उगने वाले अपराजिता के फूल से ही बनती है। इसी तरह रेड टी का आधार भी हर गली-मोहल्ले में खिलने वाला गुड़हल का फूल है।
कम लागत में भरपूर पैदावार और विदेशी बाजार
इन फूलों की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें उगाने के लिए किसी विशेष भारी लागत या महंगे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह पौधे सामान्य देखभाल में भी बहुत आसानी से पनप जाते हैं और भरपूर मात्रा में फूल देते हैं। बाजार में इस समय ब्लू टी की कीमत 8000 रुपये प्रति किलोग्राम से भी ऊपर पहुंच रही है। इस व्यावसायिक संभावना को भुनाने के लिए मनीष ने 'जर्दालू और कतरनी एग्रो फार्मर' नाम से अपनी कंपनी स्थापित की है। उनकी तैयार की गई इस विशिष्ट चाय की खेप को अब विदेशों में भेजा जा रहा है, जहां थाईलैंड और इंग्लैंड जैसे देशों में इसकी मांग काफी ज्यादा देखी जा रही है।
घरेलू कंपनियों से बड़े ऑर्डरों की तैयारी
विदेशी बाजारों में पहचान बनाने के बाद अब भारत के प्रमुख महानगरों में भी इस हर्बल चाय का विस्तार हो रहा है। हाल ही में कर्नाटक के बेंगलुरु की दो बड़ी कंपनियों ने इस चाय के नमूने जांच के लिए मंगाए हैं। नमूनों के सफल परीक्षण के बाद जल्द ही वहां से भारी मात्रा में थोक आपूर्ति के ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। इस मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इस पहल से स्थानीय किसानों को नकदी फसल का एक नया विकल्प मिलेगा, जिससे उनकी आमदनी में सुधार होगा और समाज में प्राकृतिक स्वास्थ्य उत्पादों के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।


















