बुराई पर अच्छाई और सत्य की शाश्वत विजय के महापर्व विजयादशमी के मौके पर उदयपुर के राजमहल में सदियों पुरानी क्षत्रिय परंपरा का निर्वहन किया गया. मेवाड़ के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखने वाले 77वें श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अपने पुत्र महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ के साथ मिलकर ऐतिहासिक हथियारों का परंपरागत तरीके से पूजन किया. यह धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान उदयपुर स्थित सिटी पैलेस के विख्यात शस्त्रागार सलेहखाना में पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न कराया गया, जहां वैदिक विद्वानों के पवित्र मंत्रोच्चार से वातावरण गूंज उठा.
सिटी पैलेस के सलेहखाना में सहेजी गई है शौर्य की धरोहर
महाराणा उदयसिंह द्वितीय के दौर में स्थापित हुआ सलेहखाना मेवाड़ के समृद्ध और संघर्षपूर्ण इतिहास की एक अनमोल कड़ी है. इस ऐतिहासिक शस्त्रागार में मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा सांगा, अदम्य साहसी महाराणा प्रताप तथा महाराणा राज सिंह जैसे महान वीरों द्वारा उपयोग किए गए अस्त्र-शस्त्र आज भी बेहद सुरक्षित अवस्था में मौजूद हैं. दशहरे के दिन इन प्राचीन हथियारों की अर्चना कर उन महान विभूतियों के पराक्रम और युद्ध कौशल को नमन किया गया, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया. पंडितों की उपस्थिति में धूप, दीप और अक्षत से इन गौरवशाली आयुधों की पूजा की गई.
शिल्पकला और धातु विज्ञान का उत्कृष्ट नमूना हैं राजपूती हथियार
मेवाड़ रियासत के ये हथियार सिर्फ रणभूमि में प्रहार करने के साधन भर नहीं थे, बल्कि वे उस जमाने की बेजोड़ धातु कला और बारीक दस्तकारी का भी प्रतिनिधित्व करते हैं. प्राचीन काल में शासक वर्ग महत्वपूर्ण उत्सवों, दरबारों और विशेष सैन्य अभियानों के दौरान अत्यंत नक्काशीदार तलवारें धारण करते थे. इन ऐतिहासिक तलवारों की मूठ पर सोने के बारीक तारों की जड़ाई, कुंदन वर्क, मीनाकारी और बेशकीमती नगीनों का जड़ाऊ काम देखने को मिलता है. इसके अलावा मजबूत ढालों पर सुनहरी कारीगरी, भालों और तीक्ष्ण कटारों पर उकेरी गई आकृतियां उस दौर के कुशल कारीगरों की कलात्मक महारत को दर्शाती हैं. इस पूजन अनुष्ठान में खांडा, भारी तलवारें, भाले, कटारें, बंदूकें और अन्य पारंपरिक अस्त्र सजाए गए थे.
आदिवासी समाज के अमर योगदान को समर्पित विशेष अर्पण
इस अनुष्ठान में सामाजिक सौहार्द और ऐतिहासिक कृतज्ञता की मिसाल भी देखने को मिली. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि हल्दीघाटी के युद्ध और मुगलों के खिलाफ लंबे संघर्ष में स्थानीय आदिवासी लड़ाकों ने महाराणा प्रताप का अटूट साथ दिया था. जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में लड़े गए युद्धों में धनुष तथा बाण उनके मुख्य अस्त्र थे. इसी ऐतिहासिक साझेदारी और सम्मान को बनाए रखने के लिए इस शस्त्र पूजन में पारंपरिक धनुष और लोहे के तीरों को विशेष रूप से शामिल किया गया. इस प्रकार यह आयोजन न केवल अस्त्रों की पूजा रहा, बल्कि मेवाड़ के शौर्य, जनसहयोग और सांस्कृतिक ताने-बाने का भी सशक्त प्रतीक बना.



















