भारत के ग्रामीण परिदृश्य को केवल कल्याणकारी राहत प्राप्त करने वाले लाभार्थियों के रूप में देखने के बजाय आर्थिक उत्पादन, नवाचार और उद्यम के सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित करने की जोरदार पैरवी की गई है। पांचवें रोहिणी नय्यर पुरस्कार वितरण समारोह में बोलते हुए पूर्व नीति आयोग सीईओ अमिताभ कांत ने स्पष्ट किया कि गांव के नागरिकों को दया की नहीं, बल्कि अपने पसीने का उचित दाम, सम्मानजनक अधिकार, सुचारू सार्वजनिक सेवाओं और वित्तीय संसाधनों तक सुगम पहुंच की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जब तक ग्रामीण भारत की आबादी को उत्पादक और नवप्रवर्तक के तौर पर सशक्त नहीं किया जाएगा, तब तक देश की समग्र प्रगति अधूरी रहेगी।
ग्रामीण विकास के लिए नई दृष्टि और स्वाभिमान का आधार
अमिताभ कांत ने ग्रामीण परिवारों की वित्तीय स्थिति और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए जरूरी बुनियादी आवश्यकताओं का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि विकास की ऐसी कार्यप्रणाली तैयार करने की आवश्यकता है जिसमें गांव के समुदायों को महज सहायता प्राप्तकर्ता न समझकर सक्रिय उत्पादक, खोजकर्ता और सम्मानित नागरिक माना जाए। उन्होंने कहा कि ग्रामीण नागरिकों को किसी की दया नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी उपज के लिए उचित दाम, सुचारू रूप से चलने वाली सार्वजनिक सेवाएं, सुरक्षित अधिकार, वित्तीय पूंजी तक पहुंच, कनेक्टिविटी और समाज में आदर चाहिए। उन्होंने इन सभी घटकों को स्वाभिमान और समान अवसरों के विस्तार से जोड़ा।
ग्रामीण अंचलों को कल्याणकारी सहायता बांटने के केंद्र मात्र मानने की मानसिकता से बचने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि गांवों को मजबूत आर्थिक गतिविधियों का गढ़ बनना चाहिए। समावेशी विकास की बुनियाद को मजबूत करने के लिए कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि को बेहद आवश्यक करार दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीण उद्योगों के फैलाव, महिला स्वयं सहायता समूहों को अधिक शक्ति संपन्न बनाने और नौजवानों के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों के व्यापक विस्तार पर खास बल दिया ताकि ग्रामीण प्रतिभाएं स्थानीय स्तर पर ही मजबूत आजीविका से जुड़ सकें।
तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण और किसान संगठनों की भूमिका
गांवों में आमदनी के स्तर को सुधारने और रोजगार के नए विकल्प तैयार करने के लिए आधुनिक साधनों के इस्तेमाल की बात सामने रखी गई। डिजिटल तकनीक के प्रसार और उपज को खुले एवं बड़े बाजारों से सीधे जोड़ने को एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम बताया गया। खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र को विस्तार देकर किसान अपनी कृषि उपज का अधिक मूल्य हासिल कर सकते हैं, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है। इसके अलावा किसान उत्पादक संगठनों यानी एफपीओ की भूमिका को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया गया कि संगठित होने से किसानों की बाजार में मोलभाव करने की क्षमता में इजाफा होता है और उनकी आजीविका सुरक्षित बनती है।
जमीनी स्तर की व्यवस्थाओं को सशक्त करने की वकालत करते हुए यह भी कहा गया कि सरकारी नीतियों को अलग-अलग जिलों के बीच मौजूद विकास की असमानता और खाई को पाटने का काम करना चाहिए। नीतिगत फैसलों में स्थानीय समाज और ग्रामीण समुदायों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि योजनाएं वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनें। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने में महिलाओं के योगदान को महत्वपूर्ण मानते हुए यह स्पष्ट किया गया कि महिलाओं द्वारा संचालित छोटे उद्यम और सामुदायिक समूह ही जमीनी बदलाव को टिकाऊ और दीर्घकालिक रूप दे सकते हैं।
डॉ. रोहिणी नय्यर की स्मृति और पांचवां पुरस्कार
इस अवसर पर अर्थशास्त्री और प्रशासक डॉ. रोहिणी नय्यर के ग्रामीण जीवन तथा उनके कार्यों के प्रति दृष्टिकोण को याद किया गया। अमिताभ कांत ने कहा कि रोहिणी नय्यर सिर्फ एक अर्थशास्त्री या प्रशासक नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत थीं जिनका मानना था कि भारत की वास्तविक प्रगति का पैमाना उसके ग्रामीण नागरिकों के जीवन में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस वार्षिक पुरस्कार की मूल भावना भी इसी विचार से पूरी तरह जुड़ी हुई है।
शनिवार को आयोजित इस कार्यक्रम में देहरादून के तकनीकी शिक्षक प्रशांत चौधरी को पांचवें रोहिणी नय्यर पुरस्कार से नवाजा गया। मेरठ के पास स्थित अपने गांव से वर्ष 2010 में आईआईटी में प्रवेश पाने वाले प्रशांत चौधरी पहले व्यक्ति बने थे। उन्होंने आगे चलकर कोडयोगी फाउंडेशन की स्थापना की। यह संगठन भारत के वंचित और दूरदराज के क्षेत्रों के युवाओं को व्यावहारिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई और आधुनिक तकनीकी कौशलों से प्रशिक्षित करने का काम करता है ताकि वे आधुनिक अर्थव्यवस्था में नए अवसर प्राप्त कर सकें।
पुरस्कार की पृष्ठभूमि और पूर्व विजेता
डॉ. रोहिणी नय्यर की स्मृति में इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 2022 में की गई थी। इस सम्मान के तहत विजेता को 10 लाख रुपये नकद, एक प्रशस्ति पत्र और एक ट्रॉफी प्रदान की जाती है। उनके परिवार ने देश में सामाजिक और आर्थिक विकास के प्रयासों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नय्यर फाउंडेशन फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक पर्पज की स्थापना की है, जो हर साल ग्रामीण योगदानकर्ताओं को यह पुरस्कार देता है। फाउंडेशन के निदेशकों में दीपक नय्यर, धीरज नय्यर और गौरव नय्यर शामिल हैं।
इस पुरस्कार की यात्रा में पिछले वर्षों के दौरान कई जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2022 में पहला पुरस्कार नगालैंड के सेथरीचेम सांगतम को दिया गया था, जबकि वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ के दीनानाथ राजपूत को इससे सम्मानित किया गया था। इसके बाद वर्ष 2024 में ओडिशा के अनिल प्रधान इस सम्मान के हकदार बने, वहीं वर्ष 2025 में पुणे की विद्या परशुरामकर को यह पुरस्कार प्रदान किया गया था।


















