इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते समय यदि कोई तकनीकी या गणना संबंधी चूक हो जाती है, तो उसके आधार पर करदाता को उसके वैध रिफंड पर मिलने वाले ब्याज से वंचित नहीं किया जा सकता। आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि फाइलिंग में किसी गलती के चलते आयकर विभाग रिफंड पर देय ब्याज रोकने का हकदार नहीं है। यदि किसी करदाता का रिफंड अब तक अटका हुआ है अथवा विभाग ने चूक का हवाला देकर ब्याज की राशि रोक ली है, तो इस न्यायिक निर्णय के आधार पर विभाग की कार्रवाई को चुनौती दी जा सकती है।
फ्लैट बिक्री और कैपिटल गेन वर्गीकरण से जुड़ा विवाद
यह कानूनी मामला आकलन वर्ष 2013-14 की फाइलिंग से संबंधित है। एक करदाता ने आवासीय अपार्टमेंट की बिक्री की थी, जिससे प्राप्त मुनाफे को शुरुआत में शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के रूप में दिखाया गया था। इसके बाद करदाता ने स्थिति में सुधार करते हुए संशोधित रिटर्न पेश किया, जिसमें उक्त लाभ को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के तौर पर दर्ज किया गया। साथ ही आयकर कानून के सेक्शन 112 के प्रावधानों के अंतर्गत इंडेक्सेशन लाभ के साथ 20 फीसदी की दर से कर अदायगी की स्वीकृति दी गई। ट्रिब्यूनल ने सुनवाई के दौरान करदाता द्वारा जमा किए गए इस रिवाइज्ड आईटीआर को पूरी तरह वैध ठहराया और उसे रिफंड का पात्र माना।
विभाग की आपत्तियों को ट्रिब्यूनल ने किया खारिज
आयकर विभाग ने संशोधित आईटीआर में किए गए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के दावे को अस्वीकार कर दिया था। विभाग का तर्क था कि मूल रिटर्न भरते समय करदाता ने स्वयं उच्च कर स्लैब चुना था और बाद में संशोधित रिटर्न दाखिल करते वक्त इस बदलाव का पर्याप्त व उचित कारण स्पष्ट नहीं कर पाया। इसी आधार पर विभाग ने सेक्शन 244ए के तहत बनने वाले टैक्स रिफंड ब्याज का भुगतान करने से इनकार कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने विभाग की इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यदि मूल फाइलिंग में कोई मानवीय अथवा तकनीकी गलती हुई भी थी, तब भी वैध रूप से देय ब्याज को रोका नहीं जा सकता।
5.39 करोड़ के रिफंड पर ब्याज भुगतान का स्पष्ट आदेश
अपने विस्तृत आदेश में ट्रिब्यूनल ने दर्ज किया कि करदाता ने किसी भी स्तर पर कानून की अनदेखी नहीं की और न ही तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया। करदाता ने विभाग के सभी नोटिसों का समय पर जवाब दिया और अपीलीय प्रक्रिया के किसी भी बिंदु की उपेक्षा नहीं की। ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि आयकर विभाग मानक वेरिफिकेशन नियमों का पालन करते हुए करदाता को 5.39 करोड़ रुपये के रिफंड पर निर्धारित ब्याज का भुगतान करे।
सेक्शन 244ए के तहत ब्याज कटौती की शर्तें
ट्रिब्यूनल ने सेक्शन 244ए के कानूनी पहलुओं को समझाते हुए स्पष्ट किया कि कानून में एक विशिष्ट स्थिति में ब्याज रोकने का प्रावधान है। यदि अंतिम टैक्स गणना के पश्चात स्वीकृत रिफंड की रकम कुल निर्धारित राशि के 10 फीसदी से अधिक घट जाती है, तो ब्याज का लाभ नहीं मिलता। हालांकि, इस विचाराधीन मामले में ऐसी कोई परिस्थिति मौजूद नहीं थी, इसलिए करदाता ब्याज पाने का पूर्ण अधिकारी बना रहता है।



















