नई कर व्यवस्था के तहत 12 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी पर मिलने वाली कर छूट को लेकर निवेशकों के बीच काफी उत्सुकता है। कई ऐसे करदाता जो बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी के सुरक्षित विकल्प के तौर पर डेट म्यूचुअल फंड का रुख करते हैं, वे यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या उनकी निवेश कमाई पर भी धारा 87A का यह लाभ मिल पाएगा। आयकर रिटर्न दाखिल करने से ठीक पहले इस नियम की बारीकियों को समझना बहुत आवश्यक है, ताकि किसी अनचाही वित्तीय देनदारी से बचा जा सके।
डेट म्यूचुअल फंड पर कैसे तय होता है कर का नियम
नियमों के अनुसार, 1 अप्रैल 2023 के बाद खरीदे गए ऐसे सभी डेट म्यूचुअल फंड, जिनमें घरेलू इक्विटी की हिस्सेदारी 35% से कम रखी गई है, उनके कराधान में बड़ा बदलाव किया जा चुका है। इन फंड्स से होने वाले समस्त मुनाफे को अब शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स मानकर सीधे करदाता की सामान्य सालाना कमाई में जोड़ दिया जाता है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि इस मुनाफे पर कोई अलग से निर्धारित या रियायती टैक्स दर लागू नहीं होती, बल्कि यह रकम निवेशक के लागू टैक्स स्लैब के हिसाब से ही कर के दायरे में आती है।
धारा 87A का लाभ कब और कैसे मिलेगा
चूंकि डेट फंड का पूंजीगत लाभ आपकी ग्रॉस टोटल इनकम यानी सकल कुल आय का ही एक हिस्सा बन जाता है, इसलिए कर छूट का आकलन पूरी कमाई को मिलाकर किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति की वेतन, व्यावसायिक कारोबार और डेट फंड से अर्जित पूंजीगत लाभ को जोड़कर कुल वार्षिक आय 12,00,000 रुपये या उससे कम रहती है, तो नई कर व्यवस्था के प्रावधानों के अनुसार धारा 87A के तहत पूरी छूट मिल जाती है। जब तक कुल आय इस 12 लाख रुपये के आंकड़े के भीतर सीमित है, तब तक डेट फंड के मुनाफे पर भी निवेशक को कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं भरना पड़ता।
टैक्स ट्रैप से बचने के लिए सतर्कता जरूरी
डेट फंड के निवेशकों को यहां एक विशेष कर जाल से सावधान रहने की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी व्यक्ति का वार्षिक वेतन 11,50,000 रुपये है और उसे चालू वित्त वर्ष के दौरान डेट फंड में किए गए निवेश से 60,000 रुपये का पूंजीगत मुनाफा प्राप्त हुआ। इन दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर उसकी कुल वार्षिक आमदनी 12,10,000 रुपये पर पहुंच जाती है। मात्र 10,000 रुपये से 12 लाख रुपये की सीमा पार होते ही करदाता धारा 87A के तहत मिलने वाले संपूर्ण रिबेट से वंचित हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में केवल 12 लाख रुपये से अधिक वाले 10,000 रुपये पर ही कर नहीं लगता, बल्कि नई व्यवस्था के संबंधित स्लैब के आधार पर पूरी 12,10,000 रुपये की आय पर गणना करके टैक्स चुकाना पड़ता है।


















