राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जमीन जायदाद के विस्तार का मुख्य दायरा अब तक गुरुग्राम और नोएडा जैसे स्थापित महानगरों तक ही सिमटा रहा था, लेकिन आने वाले दशकों में यह तस्वीर पूरी तरह बदलने जा रही है। नाइट फ्रैंक इंडिया के अध्ययन के मुताबिक, प्रॉपर्टी बाजार की तरक्की की अगली रफ्तार अब उन कस्बों, गांवों और दूरदराज के इलाकों में देखने को मिलेगी जो अब तक विकास के मुख्य नक्शे में हाशिए पर थे। सड़क और रेल परिवहन की मजबूत कड़ियों, बुनियादी ढांचे के नए निर्माण कार्यों और चरणबद्ध तरीके से तैयार की जा रही नगर योजना के दम पर ये कम विकसित इलाके राजधानी क्षेत्र के नए पहचान स्तंभ बनकर उभरने को तैयार हैं।
छोटे शहरों और कस्बों में 20 लाख करोड़ रुपये की नई पूंजी
क्षेत्रीय विकास योजना 2041 के तहत पूरे परिक्षेत्र में लगभग 20 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम पूंजी लगाने का खाका खींचा गया है। इस विस्तृत कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि निवेश की इस भारी राशि को नोएडा अथवा गुरुग्राम जैसे पहले से विकसित महानगरों में केंद्रित करने के बजाय ऐसे छोटे शहरों की तरफ मोड़ा जाएगा, जहां अब तक अचल संपत्ति के सौदे काफी सुस्त पड़े थे। इन उभरते शहरों, कस्बों और ग्रामीण हिस्सों में नई बस्तियां बसाने के लिए जमीन का बड़ा रकबा उपलब्ध है और आवश्यक नागरिक सुविधाएं तैयार करने के लिए पर्याप्त समय भी मौजूद है। इस व्यापक रूपरेखा की बदौलत करीब 3 करोड़ अतिरिक्त आबादी की रिहाइश और नागरिक जरूरतों का प्रबंध किया जा सकेगा, साथ ही राजधानी क्षेत्र में कई नए आर्थिक केंद्र भी अस्तित्व में आ सकेंगे।
शहरी मामलों के जानकारों का आकलन है कि अगर इस समग्र योजना को जमीनी स्तर पर पूरी मुस्तैदी से अमलीजामा पहनाया गया, तो यह पूरे उत्तर भारत में आम लोगों के रिहायश चुनने, कार्यस्थलों तक आने-जाने और धन लगाने के तौर-तरीकों को नई दिशा दे सकती है। इससे न केवल अचल संपत्ति के कारोबार को नया आयाम मिलेगा, बल्कि समग्र क्षेत्रीय विकास की प्राथमिकताओं में भी बड़ा फेरबदल दर्ज होगा।
पारंपरिक महानगरों का बोझ कम करने की विकेंद्रीकृत रणनीति
रीजनल प्लान 2041 की मुख्य सोच दिल्ली और उसके इर्द-गिर्द बसे घनी आबादी वाले महानगरों पर लगातार बढ़ते जनसंख्या के दबाव को नियंत्रित करना है। इसके साथ ही समूचे परिक्षेत्र में संतुलित विकास का दायरा फैलाना इस पहल की मूल प्राथमिकता है। कुछ गिने-चुने इलाकों में ऊंची इमारतें और बस्तियां खड़ी करने के बजाय नीति निर्माताओं ने तेज यातायात संपर्क वाले कई स्वायत्त शहरी क्लस्टर विकसित करने पर ध्यान लगाया है।
इस नीतिगत बदलाव का सीधा फायदा सोनीपत, पानीपत, भिवाड़ी, अलवर, मेरठ और जेवर जैसे उभरते केंद्रों को मिलना तय माना जा रहा है। इन सभी परिक्षेत्रों में पिछले कुछ समय के दौरान आधारभूत ढांचे और यातायात साधनों को तेजी से सुधारा गया है। दूसरी ओर, गुरुग्राम और नोएडा के पारंपरिक बाजारों में भूखंडों और मकानों के भाव आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं, जिसके चलते नया आशियाना तलाश रहे परिवारों और निर्माण कंपनियों के लिए ये उपनगरीय क्षेत्र ज्यादा किफायती और मुनाफेदार विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं।
एक्सप्रेसवे और हाई-स्पीड कनेक्टिविटी बनेगी विस्तार का आधार
किसी भी शहर की अचल संपत्ति की मांग काफी हद तक इस बात पर टिकी होती है कि वहां आवागमन के साधन कितने सुगम हैं। क्षेत्रीय योजना 2041 में शहरों के बीच तेज परिवहन संपर्कों को शीर्ष प्राथमिकता दी गई है। तेज गति वाली क्षेत्रीय परिवहन प्रणालियों, चौड़े राजमार्गों और अंतर-शहरी नेटवर्क को आपस में जोड़ने के ठोस प्रबंध किए जा रहे हैं। दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, जेवर में संचालित हो रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम और द्रुतगामी एक्सप्रेसवे के संजाल जैसे बड़े निर्माण कार्य नए औद्योगिक और रिहायशी गलियारों को गति प्रदान कर रहे हैं।
आवागमन की इन आधुनिक सुविधाओं के चलते कामकाजी लोगों के लिए मुख्य शहर से बाहर रहकर भी अपने दफ्तरों या रोजगार केंद्रों तक रोजाना पहुंचना बेहद आसान हो जाएगा। जब लंबी दूरी कम समय में तय होगी, तो दूरदराज के नए इलाकों में भी रिहायशी सोसायटियों और कारोबारी परिसरों का निर्माण तेजी पकड़ेगा, जिससे विकास की सीमाएं पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा चौड़ी हो जाएंगी।
आवासीय, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग में नए अवसर
निर्माण उद्योग के नजरिए से यह दीर्घकालिक खाका केवल नई सीमाओं को छूने तक सीमित नहीं है। इसमें मकान, दुकान, कारखाने और माल ढुलाई से जुड़े लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में रोजगार और कारोबार के बेशुमार अवसर छिपे हैं। जिन विकासशील इलाकों में फिलहाल जमीनों के भाव अपेक्षाकृत किफायती हैं, वहां बिल्डर समेकित टाउनशिप, भूखंड आधारित आवासीय योजनाएं और मिली-जुली गतिविधियों वाले आधुनिक रिहायशी परिसर तैयार करने पर भारी पूंजी लगा सकते हैं।
इसके समानांतर, आर्थिक गलियारों के सहारे फल-फूल रहे विनिर्माण केंद्रों के कारण औद्योगिक इकाइयों और विशाल वेयरहाउसिंग परिसरों की मांग में भी जोरदार इजाफा होने के पूरे आसार हैं। इन सभी गतिविधियों से निर्माण क्षेत्र को आने वाले दशकों के लिए लगातार काम और तरक्की का नया ईंधन मिलेगा।
उद्योग जगत के जानकारों की राय और निवेश का परिदृश्य
जिंदल रियल्टी के प्रेसिडेंट एवं सीईओ अभय मिश्रा के अनुसार, यह योजना चुनिंदा शहरों के जमावड़े को तोड़कर संतुलित फैलाव की दिशा में एक बड़ा कदम है। अभय मिश्रा ने कहा, "जैसे-जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांजिट आधारित कॉरिडोर का विस्तार दिल्ली और गुरुग्राम से आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे सोनीपत जैसे टियर-2 शहर प्रमुख निवेश केंद्र के रूप में उभर सकते हैं।" उनके मुताबिक सोनीपत में सस्ती जमीन, बड़ा भूभाग और सुगम रास्ते रिहायशी व व्यावसायिक दोनों तरह की मांग को बढ़ाएंगे, जिससे निवेशकों को बेहतर मुनाफा मिल सकेगा।
कार्यन ग्रुप के निदेशक वरून गर्ग का दृष्टिकोण है कि इस योजना में उत्तर भारत के अचल संपत्ति परिदृश्य को नए सांचे में ढालने की पूरी कुव्वत है। वरून गर्ग ने कहा, "बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बेहतर होने के साथ-साथ सोनीपत, पानीपत, मेरठ, भिवाड़ी और जेवर कॉरिडोर जैसे उभरते बाजारों में आवासीय और वाणिज्यिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।" उन्होंने रेखांकित किया कि विकेंद्रीकृत सोच लंबी अवधि के घर खरीदारों और निवेशकों को नई विकास बेल्ट में आकर्षक अवसर मुहैया कराएगी।
इसी क्रम में रॉयल ग्रीन रियल्टी के मैनेजिंग डायरेक्टर यशांक वासन का मानना है कि नाइट फ्रैंक का अध्ययन यह साबित करता है कि आगामी विकास यात्रा में टियर-2 श्रेणी के छोटे नगरों की भूमिका बेहद अहम होने वाली है, जहां आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बनने की पूरी क्षमता मौजूद है।
























