पूंजी बाजार में नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों के निपटारे की व्यवस्था को पूरी तरह नया रूप दे दिया गया है। जब किसी कंपनी या व्यक्ति पर प्रतिभूति कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगता है, तो वह एक निश्चित राशि का भुगतान करके और जरूरी शर्तें स्वीकार करके लंबी कानूनी कार्रवाई से बच सकता है। नियामक ने इस पूरी प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सरल और त्वरित बनाने के उद्देश्य से सेबी (प्रशासनिक और दीवानी कार्यवाही का निपटारा) विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है। इस नए ढांचे का प्राथमिक मकसद यह सुनिश्चित करना है कि समझौते की रकम तय करने में किसी प्रकार की मनमानी की गुंजाइश न रहे और पूरा तंत्र पहले से तय गणितीय सिद्धांतों पर काम करे।
समझौता राशि तय करने के लिए बना वैज्ञानिक फॉर्मूला
नए नियमों के तहत समझौते की राशि अब एक स्पष्ट फॉर्मूले के आधार पर निर्धारित की जाएगी। इस प्रक्रिया की शुरुआत एक आधार राशि यानी बेस अमाउंट से होती है, जो संबंधित नियम के उल्लंघन के लिए कानून में तय न्यूनतम जुर्माने से जुड़ी होती है। इसके बाद इस बेस अमाउंट को कई व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इनमें यह देखा जाता है कि कानूनी प्रक्रिया किस चरण तक पहुंच चुकी है, क्या संबंधित इकाई ने पहले भी कभी नियमों का उल्लंघन किया है और उस पर कोई कार्रवाई हुई है, वर्तमान उल्लंघन की गंभीरता कितनी है, तथा आवेदक के पक्ष या विपक्ष में कौन से ठोस कारक मौजूद हैं। अंत में, इस तय राशि में कानूनी लागत को भी अलग से जोड़ा जाता है।
पुरानी व्यवस्था में एक बड़ी तकनीकी खामी यह थी कि गलत तरीके से कमाए गए लाभ, टाले गए नुकसान और निवेशकों को हुए नुकसान को समझौते की मूल गणना के अंदर ही जोड़ दिया जाता था। इस वजह से कई बार एक ही रकम की दोहरी गिनती हो जाती थी। अब नई व्यवस्था में इन तीनों चीजों को बेस अमाउंट की गणना से पूरी तरह बाहर रखा गया है। नियामक ने स्पष्ट किया है कि जहां भी ऐसे अनुचित लाभ या निवेशकों के नुकसान का सटीक आकलन संभव होगा, वहां उनकी वसूली अलग से की जाएगी।
तीन हिस्सों में बंटा नया निपटारा ढांचा
इस बदलाव के बाद प्रत्येक निपटारे को स्पष्ट रूप से तीन अलग-अलग घटकों में विभाजित किया गया है। पहला घटक वास्तविक समझौते की राशि है जो तय फॉर्मूले से निकलेगी। दूसरा घटक अनुचित लाभ की वापसी का है, यदि मामले में ऐसा कोई लाभ कमाया गया हो। तीसरा घटक सुधारात्मक और विनियामक शर्तें हैं, जिन्हें पुराने नियमों में गैर-मौद्रिक शर्तों के नाम से जाना जाता था। इन तीन हिस्सों के स्पष्ट विभाजन से आवेदकों को यह समझने में आसानी होगी कि वे किस मद में कितना भुगतान कर रहे हैं और उन्हें किन नियमों का पालन करना है।
वित्तीय विवरणों में हेराफेरी या कंपनियों से फंड को दूसरी जगह ट्रांसफर करने जैसे गंभीर मामलों में भी निपटारे का विकल्प उपलब्ध कराया गया है। हालांकि, ऐसे मामलों में निपटारा तभी संभव होगा जब आवेदक उचित सुधारात्मक शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करे। इन शर्तों में सही वित्तीय खुलासे करना और बाहर भेजे गए पैसे को पूरी तरह वापस कंपनी के खजाने में लौटाना अनिवार्य रूप से शामिल है।
छोटे मामलों और प्रकटीकरण चूकों के लिए फास्ट ट्रैक रास्ते
मामलों के त्वरित समाधान के लिए दो अलग-अलग फास्ट ट्रैक रास्ते तैयार किए गए हैं। पहला रास्ता सीधे तौर पर धनराशि से जुड़ा हुआ है। यदि तय की गई निपटारा राशि 10 लाख रुपये या उससे कम बैठती है, तो मामला आंतरिक समिति से सीधे पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेज दिया जाता है। इस व्यवस्था से बीच का एक पूरा प्रशासनिक चरण समाप्त हो जाता है और मामले का निपटारा बहुत तेजी से हो जाता है।
दूसरा फास्ट ट्रैक विकल्प उल्लंघन के प्रकार पर आधारित है, जो मुख्य रूप से प्रकटीकरण यानी डिस्क्लोजर से जुड़ी चूकों को कवर करता है। ऐसे मामलों में नियामक सीधे एक नोटिस भेजता है जिसमें भुगतान की जाने वाली रकम दर्ज होती है। संबंधित इकाई उस राशि को स्वीकार कर उसका भुगतान कर सकती है। जैसे ही रकम जमा होती है, पूर्णकालिक सदस्यों का पैनल औपचारिक निपटारा आदेश जारी कर देता है, जिससे लंबी सुनवाई की जरूरत नहीं पड़ती।
आवेदन की प्रक्रिया, शुल्क और समय सीमा
कोई भी पात्र इकाई कानूनी प्रक्रिया के किसी भी चरण में निपटारे के लिए आवेदन दाखिल कर सकती है। इसके लिए निर्धारित प्रारूप में आवेदन करना होगा, जिसके साथ एक वचनपत्र और कानूनी अधिकारों को छोड़ने का दस्तावेज यानी वेवर संलग्न करना अनिवार्य है। आवेदक को वे सभी जरूरी विवरण भी देने होंगे जिनकी आवश्यकता राशि की गणना के लिए होती है। व्यक्तिगत आवेदकों सहित सभी प्रकार के आवेदकों के लिए आवेदन शुल्क 25,000 रुपये तय किया गया है, जो गैर-वापसी योग्य है और इसका भुगतान पेमेंट गेटवे के जरिए ही करना होगा। यदि आवेदक कोई कंपनी या अन्य संस्था है, तो उसके अधिकृत व्यक्ति को ही वचनपत्र और वेवर पर हस्ताक्षर करने होंगे। यदि किसी आवेदन में कोई कमी पाई जाती है और उसे वापस लौटाया जाता है, तो आवेदक के पास सही और पूर्ण आवेदन दोबारा भेजने के लिए 15 दिनों का समय होता है।
जो मामले पहले से लंबित हैं, उनके लिए सख्त समय सीमा निर्धारित की गई है। कारण बताओ नोटिस या पूरक नोटिस, जो भी बाद में जारी हुआ हो, उसके 45 दिनों के बाद आने वाले आवेदन पर आमतौर पर विचार नहीं किया जाएगा। हालांकि, यह 45 दिनों की सीमा उन मामलों पर लागू नहीं होती जो किसी न्यायाधिकरण या सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित हैं। इसके अलावा, संक्रमणकालीन प्रावधानों के तहत आने वाले कुछ लंबित मामलों के लिए 90 दिनों की एक अलग विशेष अवधि भी दी गई है।
कारण बताओ नोटिस से पहले चेतावनी की नई सुविधा
एक अहम सुधार यह किया गया है कि औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी करने से पहले ही संभावित आरोपों और होने वाली कार्रवाई के बारे में संबंधित इकाई को चेतावनी दी जा सकती है। इस प्रकार का सेटलमेंट नोटिस मिलने के बाद उस इकाई को निपटारे का आवेदन करने के लिए 60 दिनों का समय मिलता है। यह पूर्व-चेतावनी की सुविधा उन मामलों में लागू नहीं होगी जहां अंतरिम निर्देश या अभियोजन की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है, या जिन्हें नियमों में विशेष रूप से बाहर रखा गया है। साथ ही, नियामक के पास यह अधिकार भी सुरक्षित रहेगा कि वह मामले के तथ्यों को देखते हुए प्रस्तावित कार्रवाई के स्वरूप में बदलाव कर सके।



















