सड़क किनारे लगने वाला एक सामान्य ठेला भी अगर स्वाद और अनुशासन के साथ संचालित किया जाए, तो वह बड़े मुनाफे वाले व्यापार में तब्दील हो सकता है। खानपान से जुड़े छोटे उद्यमों में कम लागत और सरल कार्यप्रणाली के बावजूद ग्राहकों का भरोसा जीतना सबसे अहम माना जाता है। गुणवत्ता, सही तकनीक और लगातार की गई मेहनत से सीमित संसाधनों में भी किस तरह बड़ा ग्राहक वर्ग तैयार किया जा सकता है, इसका उदाहरण छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में देखने को मिलता है।
कुटेला चौक पर रोज उमड़ती है ग्राहकों की भीड़
महासमुंद जिले के अंतर्गत आने वाले सरायपाली क्षेत्र के कुटेला चौक पर रमेश बेहरा पिछले 10 सालों से अपना ठेला संचालित कर रहे हैं। इलाके में उनकी पहचान समोसा किंग के रूप में स्थापित हो चुकी है। उनके ठेले पर सुबह से लेकर शाम तक लोगों का आना-जाना बना रहता है। स्थिति यह है कि रोजाना करीब 700 समोसे महज कुछ ही घंटों के भीतर बिक जाते हैं। नाश्ते की तलाश में आने वाले स्थानीय निवासियों के लिए यह ठेला एक भरोसेमंद ठिकाना बन चुका है।
धीमी आंच पर 20 मिनट तक तलने का अनोखा तरीका
रमेश बेहरा के अनुसार, उनके समोसों की लोकप्रियता किसी गोपनीय फार्मूले की बजाय पकाने की सही पद्धति पर टिकी है। उनका मानना है कि समोसा तैयार करना सरल दिख सकता है, लेकिन सही बनावट हासिल करना एक हुनर है। अत्यधिक गर्म तेल में डालने पर समोसा ऊपर से जल जाता है और भीतर से कच्चा रह जाता है। इस समस्या से बचने के लिए वे हर समोसे को मध्यम आंच पर लगभग 20 मिनट तक तलते हैं।
लंबे समय तक धीमी आंच पर पकने के कारण समोसे बाहर से बेहद खस्ता और अंदर से पूरी तरह पककर तैयार होते हैं। भरावन के लिए आलू के मिश्रण में अमचूर, हल्का गरम मसाला और धनिया पाउडर का संतुलित तड़का लगाया जाता है। यही स्वाद और निरंतरता ग्राहकों को बार-बार उनके पास खींच लाती है।
20 रुपए की प्लेट और पारिवारिक हुनर की विरासत
रमेश अपने ग्राहकों को 20 रुपए की प्लेट में तीन बड़े समोसे परोसते हैं। इस थाली में समोसों के साथ छोले, तीखी और मीठी चटनी के अलावा मिर्च और लहसुन से बनी विशेष झटपट चटनी भी शामिल होती है। ग्राहकों का मानना है कि इस स्वाद के पीछे मसालों के सही अनुपात के साथ-साथ ईमानदारी और अपनापन भी शामिल है।
समोसा बनाने का यह हुनर रमेश को अपने पिता से विरासत में मिला, जो पहले इसी जगह पर ठेला लगाते थे। पिता द्वारा शुरू किए गए इस काम को रमेश ने आधुनिक व्यावसायिक समझ और स्वच्छता के साथ आगे बढ़ाया है। एक दशक की निरंतरता के बाद आज उनका ठेला सिर्फ एक नाश्ते की दुकान न रहकर सरायपाली का एक लोकप्रिय स्थानीय ब्रांड बन चुका है।


















